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जड़ता की रिवायत

गांव का माहौल एक सामंती परिवेश में जैसा था।
Author नई दिल्ली | April 20, 2016 01:30 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पिछले दिनों न्योता मिलने पर एक विवाह समारोह में शामिल होने बिहार जाना हुआ। वर पक्ष के एक परिजन मुझे गया स्टेशन पर लेने आए। रास्ते में उन्होंने सलाह दी कि बोधगया जरूर देखें, जहां महात्मा बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। दो घंटे के सफर के बाद हम लोग गांव पहुंचे जहां एक हवेलीनुमा घर में हमने प्रवेश किया। वहां शादी की खूब चहल-पहल थी। रिश्तेदारों से मेरा परिचय कराया गया। वहां का माहौल ऐसा था कि मैंने वर्षों बाद खुद को एक सामंती परिवेश में पाया। शाम को पूरे बैंड-बाजा-बारात के साथ हम लोग लड़की वालों के घर पहुंचे। पटाखेबाजी और नाच-गाने के बाद जयमाला वगैरह की औपचारिकता पूरी की गई। अगले दिन सुबह डोली लेकर हम लोग वापस आए। दूल्हा अपनी संगिनी के साथ एक सजी-संवरी गाड़ी में सवार था।

गांव पहुंच कर हम सब वाहनों से उतर गए। दूल्हा भी कार से बाहर आ गया, लेकिन दुल्हन कार के अंदर ही बैठी रही। मुझे बताया गया कि उसे अभी दो घंटे कार में ही बैठना पड़ेगा, क्योंकि घर की दहलीज पर उसके उतरने के मुहूर्त का समय ठीक ग्यारह बजे है। मैं घर के बड़े-से आंगन में कुर्सी पर बैठा ही था कि उस परिवार के एक युवक ने सलाह दी- ‘आप आराम कर लें, थक गए होंगे।’ मुझे थोड़ी दूरी पर एक कमरे में ले जाया गया, जहां टेलीविजन पर क्रिकेट मैच चल रहा था।

युवक ने आगे कहा- ‘आंगन में दुल्हन के गृह प्रवेश की एक रस्म होनी है, आपकी उसमें कहां दिलचस्पी होगी, इसलिए आप तब तक यहीं आराम फरमाएं।’ अगर यह सलाह न दी जाती तो शायद मैं चुपचाप टीवी पर मैच देखता रहता, लेकिन कुछ देर बाद यह सोच कर कि ऐसा क्या है इस रस्म में जो मुझे उससे दूर रखा जा रहा है। मैंने आंगन की तरफ रुख किया। वहां मैंने देखा कि बड़ी संख्या में बच्चे, औरतें और घर के लगभग सभी मर्द आंगन में चारों तरफ खड़े हैं। दूल्हा-दुल्हन भी अपनी शादी की वेशभूषा में आंगन के बीच एक तरफ खड़े थे।

मुझे हैरानी हुई यह देख कर कि आंगन के बीच में एक बकरा खड़ा है, जिसकी गर्दन रस्सी से बंधी थी। इससे पहले कि कुछ समझ पाऊं, मैंने देखा कि दूल्हे के एक नजदीकी रिश्तेदार ने बकरे की गर्दन पर तलवार से तेज वार किया और बकरा वहीं ढेर हो गया। एक मेज पर चढ़ कर मैंने देखा कि जहां उसकी बलि दी गई, वह जगह खून से तर हो गई थी। लेकिन दूसरी ओर वहां मौजूद लोगों के बीच हंसी-मजाक चल रहा था। इस बीच रिश्तेदारों ने दुल्हन को उस खून वाली जगह को लांघने के लिए कहा। दुल्हन ने जैसे ही उस खून से तर जमीन को लांघा, सभी ने तालियां और बच्चों ने सीटियां बजा कर उसका अभिनंदन किया। इस तरह दुल्हन के गृह-प्रवेश की रस्म पूरी हुई।

मेरे लिए यह किसी हादसे से कम नहीं था। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे नाजुक और हसीन मौके पर मेरी बेटी के जैसी एक नई नवेली दुल्हन को ऐसे मंजर से गुजरना पड़ेगा। पता चला कि जब से शादी के कार्यक्रम शुरू हुए हैं, तीन बकरे अलग-अलग मुहूर्तों पर अपनी जान गंवा चुके हैं। दुख हुआ कि किसी ने इसका विरोध नहीं किया और मैं भी कुछ न कर सका। दोपहर को भोजन के वक्त उसी बकरे का मांस मेहमानों को ‘प्रसाद’ कह कर परोसा गया। मांसाहारी होते हुए भी वहां मुझसे कुछ खाते न बना। मेरे मना करने पर वहीं एक युवक ने यह कह कर मेरी आलोचना की कि ‘दिल्ली वाले गांव की परंपरा की कद्र कहां करते हैं!’ इसे परंपरा कहें तो कैसी परंपरा है यह!

खैर, इस बीच मेरा मन इतना उचट गया था कि इन बातों में उलझे बिना मैंने विदा लेनी चाही। जिनके बेटे की शादी थी, उन्होंने अपनी मजबूरी का इजहार किया। गांव की इस परंपरा को चुनौती देने का दम उनमें नहीं था। मैंने उन्हें याद दिलाया कि इतिहास में किसी समय विवाह के मौके पर ऐसी ही बलि की परंपरा रही है और बरात में दूल्हा आज भी कमर में जो तलवार लटकाए घोड़े पर बैठता है, वह शायद उसी परंपरा का प्रतीक है! उन्होंने इस मामले में कोई दखल देने में खुद के असमर्थ होने पर अफसोस प्रकट किया। लौटते हुए मेरी नजर शहर की सीमा पर बने निकास द्वार पर पड़ी। ऊपर लिखा था- ‘ज्ञान और मोक्ष की भूमि गया में पधारने के लिए धन्यवाद!’

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