ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः यह तपिश

डाक बंगले के ओसारे यानी बरामदे में बैठे-बैठे, अखबार पढ़ते हुए और चाय पीते-पीते अचानक लोहियाजी ने खुले आसमान की तरफ नजर दौड़ाई और चिंतित स्वर में बोले- ‘भागवती, मेरा मन कहता है, इस साल भीषण अकाल पड़ेगा, बड़ी संख्या में लोग भूखों मरेंगे।

Author February 8, 2018 05:36 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

जाबिर हुसैन

डाक बंगले के ओसारे यानी बरामदे में बैठे-बैठे, अखबार पढ़ते हुए और चाय पीते-पीते अचानक लोहियाजी ने खुले आसमान की तरफ नजर दौड़ाई और चिंतित स्वर में बोले- ‘भागवती, मेरा मन कहता है, इस साल भीषण अकाल पड़ेगा, बड़ी संख्या में लोग भूखों मरेंगे। बड़ी चुनौती होगी, दिन-रात मेहनत करनी होगी, तभी गरीब बच पाएंगे।’ ‘लेकिन आप ऐसा कैसे कह रहे हैं?’- भागवतीजी ने साहस करके लोहियाजी से पूछा। ‘इधर आओ, आसमान की तरफ देखो।’- कहते हुए लोहियाजी ओसारे से नीचे डाक बंगले के आगे मैदान में उतर आए। मैदान में उतरते वक्त उन्होंने जमीन से सूखी घास के कुछ तिनके उठा लिए। घास को अपनी नाक के करीब ले गए और बोले- ‘भागवती, देखो, घास का रंग और इस मिट्टी की तरफ भी देखो। इस मिट्टी की भाषा समझो! यह चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अबकी साल अकाल पड़ेगा…! भीषण अकाल… लोग भूखों मरेंगे। मेरे पास वक्त नहीं है भागवती, चलो मुझे बाराचट्टी के दूरदराज इलाकों के गांवों में ले चलो। मैं अंदाजा लगा रहा हूं कि पानी के लिए हाहाकार मचेगा। मुझे तुरंत अपने लोगों से बात करनी पड़ेगी।

सरकार को यह चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। यह सरकार की परीक्षा की घड़ी है।’ मुझे यह सब बताते हुए भागवतीजी की आवाज रुआंसी हो गई। उनकी सफेद, बड़े दायरे वाली आंखों से पानी की बूंदें छलछला उठीं और वे बड़े, दूर तक फैले लोहे की जालियों से घिरे बरामदे में रखी बेंच की तकलीफदेह कुर्सी में धंस-सी गर्इं।‘वे दूसरे किस्म के दिन थे भागवतीजी… दूसरे किस्म के। लोहियाजी मिट्टी से बातें करते थे, मिट्टी की पीड़ा समझते थे, क्योंकि वे मिट्टी से कभी दूर नहीं हुए। उसकी उदासी, उसका सन्नाटा, उसका अकेलापन, सब कुछ वे अपने मन में संभाल कर रखते थे। सड़क पर हों या फिर संसद में, वे मिट्टी से अपना रिश्ता कभी नहीं तोड़ते थे। तभी तो उनके विचारों में इतनी ताजगी थी और वक्त की धड़कनें भी। अब कहां वह बात!’

भागवतीजी चाय पीकर अपने क्षेत्र बाराचट्टी के लिए निकलने वाली थीं। मैं उन्हें बाहर पोर्टिको में उनकी जीप तक छोड़ आया। मेरी नजरें पोर्टिको के सामने वाले लॉन पर चली गर्इं, जहां साल में दो बार तामझाम के साथ आजादी का झंडा फहराया जाता है। लॉन की घास जल-जल कर बदरंग हो गई है। दूर-दूर तक उसमें हरियाली का नाम नहीं रह गया है।
मुझे लॉन में घास के रेजे समेटते देख कर गमलों में पानी दे रहा माली तेज कदमों से मेरे पास आ गया। मैंने उसे देखा और कहा- ‘अभी यह हाल है तो भरी गरमी में, जेठ में क्या दशा होगी? कितने दिनों से घास पर पानी नहीं डाला?’ माली ने जवाब दिया- ‘रोज डालते हैं सर! मगर घास जलती ही जाती है। उस पर हरियाली नहीं आती। पता नहीं क्यों..! पहले ऐसा नहीं होता था। अभी सुबह के नौ भी नहीं बजे, मगर माहौल में भट्ठी जैसी गरमी पैदा हो गई है। सुबह-शाम पानी डालेंगे, आज से!’

शायद सब कुछ समझते हुए मैंने माली से एक नरम शिकायत तो कर दी थी, लेकिन महसूस किया कि माली ठीक कह रहा है। अभी दोपहर दूर है और सूरज बीच आसमान नहीं पहुंचा, फिर भी माहौल में तपिश पैदा हो गई है। माली कहता है कि वह हर रोज घास पर पानी डालता है और घास को हरा-भरा रखने की कोशिश करता है, मगर जमीन की मिट्टी जैसे घास की जड़ों से रूठ गई है। वह सूखी घास के होठों को सैराब नहीं कर पाती। इसीलिए घास की जड़ें जल-जल कर जमीन पर बिखरती जा रही हैं। मैंने लॉन में खड़े-खड़े आसमान की तरफ नजरें दौड़ार्इं। पता नहीं क्यों, आज का आसमान मुझे अजनबी-सा दिखाई दिया। मेरे पैरों के नीचे जो जमीन है, वह सूखी और जली घास से भरी हुई है। और मेरे ऊपर जो आसमान है, वह अजनबी है। मुझे जमीन की, मिट्टी की भाषा नहीं आती। मैं मिट्टी से बातें नहीं कर सकता। मैं उसकी उदासी, उसका सन्नाटा और उसका अकेलापन नहीं समझ सकता। मेरे अपने मन के सन्नाटे में मिट्टी के दर्द के लिए कोई जगह कहां रह गई है! अपने लॉन की बदरंग घास पर खड़े-खड़े मुझे यह जरूर महसूस होने लगा है कि वक्त से पहले माहौल में आने वाली यह तपिश अपनी नई जिंदगी के लिए किसी का ताजा लहू चाहती है!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App