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दुनिया मेरे आगे: सुनने की संवेदना

कई साल हो गए स्कूल छोड़े। जब पीछे मुड़ कर देखती हूं तो आज भी स्कूल का वह पहला दिन याद हो आता है कि कैसे एक सरकारी स्कूल की बंद और कम रोशनी के आगोश में बनी कक्षाएं और उसकी दीवारें बच्चों के लिए अपने महत्त्व का बयान कर रही थीं।

Author October 3, 2018 2:23 AM
प्रतीकात्मक चित्र

कई साल हो गए स्कूल छोड़े। जब पीछे मुड़ कर देखती हूं तो आज भी स्कूल का वह पहला दिन याद हो आता है कि कैसे एक सरकारी स्कूल की बंद और कम रोशनी के आगोश में बनी कक्षाएं और उसकी दीवारें बच्चों के लिए अपने महत्त्व का बयान कर रही थीं। पहली नौकरी का पहला दिन था और मुझे कौन-सी कक्षा पढ़ाने के लिए दी जाएंगी, इसका निर्णय अभी बाकी था। तभी कुछ बच्चियां स्टाफ रूम के दरवाजे पर खड़ी मेरी ओर देखने लगीं। मैंने एक हल्की-सी मुस्कराहट उनकी ओर भेजी। मेरी मुस्कराहट का जवाब उन्होंने जरा शर्मीले ढंग से आंखों को घुमा कर हंसते हुए दिया।

कुछ देर बाद दो बच्चियां मेरे पास आर्इं और पूछने लगीं कि ‘मैडम, आप हमारी क्लास में पढ़ाने के लिए आई हैं?’ मैंने थोड़ा अनिश्चित भाव से कहा कि ‘शायद! लेकिन अभी मुझे बताया नहीं गया है। वैसे कौन-सी क्लास है आपकी?’ उन्होंने कहा- ‘छठी बी’। सीता इसी कक्षा की छात्रा थी। सांवली, दुबली-पतली देह, सिर पर दो चोटियां, चेहरे पर लंबी-सी उन्मुक्त हंसी, निडर, बातों में बचपन की चंचलता और सवालों में गंभीरता थी। एक शिक्षिका के रूप में कक्षा में मैं हमेशा विद्यार्थियों को सुनने में बहुत विश्वास रखती हूं। मेरा यह विश्वास और भी पक्का होता है जब छोटे-छोटे बच्चों और बच्चियों को रोजमर्रा के अपने जीवन की उलझनों से जूझते और उन्हें सुलझाने के तर्कों पर चर्चा करते देखती हूं।

बच्चों के लिए बेहद संवेदनहीन बनती दुनिया में, जहां अक्सर बच्चों को सुना ही नहीं जाता, उन्हें समझने का स्तर तो बहुत दूर की कौड़ी है। ऐसे परिवेश में आमतौर पर बच्चे अपने आपसी संसार में अपना एक समाज रचते हैं। जहां वे मित्रों के बीच अपनी स्वायत्तता का व्यावहारिक प्रयोग करते हैं जो हम वयस्कों की दुनिया में नाहक कुचल दी जाती है। यह कक्षा कई मायनों में मेरे लिए एक जैसी होते हुए भी विविध अनुभवों से भरी एक बहुआयामी संसार को प्रस्तुत करती थी। इसकी बच्चियां विद्यालय के नजदीक की बस्ती में ही रहती थीं। वे रोजाना मुझसे बस्ती में होने वाली घटनाओं पर चर्चा करती थीं और अपनी राय भी देती थीं। कुछ ही समय में ये बच्चियां मेरे साथ बहुत सहज हो गई थीं। इसलिए वे मुझे बस्ती में होने वाली हिंसा के ऐसे किस्से सुनाती थीं, जिनका एक जातिगत आधार होता था। वे कभी बिजली-पानी के न होने से हुई परेशानी का ब्योरा देतीं तो कभी अपने घर में होने वाली झड़प और कक्षा में एक दूसरे के साथ हाथापाई की बातें।

रोज स्कूल में जाना मुझे कई तरह के रोमांच और विस्मय से भर देता था। मुझे लगता था, जैसे रोज कितनी ही जिंदगियों का अहसास अपने भीतर समेट कर लाती हूं। स्कूल में उस साल की गरमी की छुट्टियां मेरे लिए आखिरी ही थीं, क्योंकि किन्हीं कारणों से मुझे स्कूल की वह नौकरी छोड़नी थी। उस दौरान एक दिन सीता मेरे पास आई। वह रोज की तरह खिली हुई और चंचल नहीं लग रही थी, बल्कि उदास थी। मैंने कारण पूछा तो उसने बताया कि इन छुट्टियों में उसका पूरा परिवार वापस गांव लौट जाएगा, क्योंकि अब उसके पिताजी नहीं चाहते हैं कि वे लोग दिल्ली में रहें। यहां अब उसके पिताजी को काम नहीं मिल रहा है। उन्होंने जो दुकान खोली, वह भी ठीक से नहीं चल रही है। लेकिन सीता वापस गांव नहीं जाना चाहती और स्कूल नहीं छोड़ना चाहती। वह बेहद चिंता में थी। मैंने उसे थोड़ी हिम्मत बंधाते हुए कहा कि ‘कल तुम अपने पिताजी को बुला कर लाना। मैं उनसे बात करती हूं और समझाने की कोशिश करती हूं।’ उसके बाद सीता कई दिनों तक नहीं आई। कक्षा की अन्य बच्चियों से पूछने पर भी कुछ खास पता नहीं लग पाया।

फिर स्कूल बंद हो गया और मैं भी अपने आगे के कामों में लग गई। कई बार खयाल आया कि पता नहीं सीता का क्या हुआ होगा, वह कहां होगी। लेकिन संस्थागत व्यस्तताओं के चलते यह खयाल क्षणिक ही रहा। कुछ समय पहले शिक्षक दिवस के दिन एक अनजान फोन आया। उठाने पर एक थिरकती-सी आवाज आई- ‘रजनी मैम! मैं सीता! हैप्पी टीचर्स डे मैम। आपका फोन नंबर याद था। लगा कि कहीं आपने अपना नंबर बदल न लिया हो!’ पता चला कि गांव जाने के कुछ समय बाद उसका परिवार फिर दिल्ली लौट आया था और उसने स्कूल में भी वापसी कर ली थी। अब वह दसवीं कक्षा में है और चाहती है कि उसकी शिक्षिका को कोई काम हो तो वे उसे जरूर बताएं और स्कूल में उससे मिलने आएं। इस वाकये के बाद सोचती हूं कि आखिर मैंने ऐसा क्या किया था उसके लिए, जो इतने साल बाद उसने मुझसे संपर्क कर मुझे शिक्षक दिवस की बधाई दी! क्या केवल उन बच्चों को उनके दुख और परेशानी में सुन लेना भर ही मुझे उन बच्चियों के इतने करीब ले आया था? शायद यह एक कारण रहा होगा! इसीलिए मेरे कानों में अभी भी उसकी बधाई के स्वर गूंज रहे हैं।

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