ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः घुटती सांसे

सेहत के बारे में पूछना सही भी है, क्योंकि देश, समाज और अपने-पराए के बीच कार्य करने का जो माध्यम है, वह अपना शरीर ही है। अगर ये ठीक रहेगा तभी सब काम ठीक तरह से संपन्न हो सकते हैं।
Author January 31, 2018 02:54 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

ललित कौशिक

एक कहावत है कि व्यक्ति के पास सबसे महत्त्वपूर्ण कुछ है तो वह है उसका स्वास्थ्य! अगर वह नहीं है तो कुछ भी नहीं। हम भारतीयों की एक मानवीय प्रवृत्ति है कि जब भी घर में कोई परिचित या सगा संबंधी आता है तो सबसे पहले एक-दूसरे से मिलने पर स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ होती है। सेहत के बारे में पूछना सही भी है, क्योंकि देश, समाज और अपने-पराए के बीच कार्य करने का जो माध्यम है, वह अपना शरीर ही है। अगर ये ठीक रहेगा तभी सब काम ठीक तरह से संपन्न हो सकते हैं।

जब हम छोटे थे, तब माता-पिता कहते थे कि सुबह जल्दी उठ कर भ्रमण करने या टहलने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। लेकिन वर्तमान समय में व्यक्ति सुबह-सुबह भ्रमण के लिए जाएगा तो ज्यादा संभावना यही है कि वह रोगों से घिर जाएगा, क्योंकि हवा जहरीली होती जा रही है। यह सब जानते हैं कि पिछले कई वर्षों से दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा इतनी ज्यादा प्रदूषित हो चुकी है कि सुबह की सैर करने जाने वाले लोगों की संख्या में काफी कमी आई है। उसका एकमात्र कारण है हवा में घुलता जा रहा जहर। घर हो या रास्ते में बस, सब जगह प्रदूषण का सामना। स्कूल या कॉलेजों और कार्यालयों में भी वही हाल। लेकिन सबसे क्षुब्ध करने वाले हैं हमारे राजनेताओं के सुर। सवाल है कि शुद्ध हवा से जरूरी कुछ हो सकता है क्या? इतना भी हमें ये दे नहीं सकते। लेकिन बड़ी-बड़ी डींगें हांकने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होता। सपने दिखाने से काम नहीं चलता। सपना जीने के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए। शुद्ध हवा के बिना शरीर स्वस्थ हो ही नहीं सकता है। बहाने के लिए कभी किसानों पर पराली जलाने का आरोप लगाया जाता है, कभी आॅड-इवन को आॅक्सीजन मास्क की तरह पेश किया जाता है। ट्रकों की आवाजाही पर रोक लगी। लेकिन इस तरह के किसी फैसले से कोई सुधार आया क्या?

गौरतलब है कि वायु प्रदूषण के साथ सांस प्रणाली, दिल और दिमाग का दौरा जैसी बीमारियों का सीधा संबंध है। इस बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के डॉक्टरों का कहना है कि हाल के एक शोध के अनुसार थोड़े समय के लिए कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रोजन डायआॅक्साइड और सल्फर डायआॅक्साइड जैसे प्रदूषण कारकों के संपर्क में रहने से दिल के दौरे का खतरा बढ़ जाता है। दिल्ली की आबादी सबसे ज्यादा है, इसलिए वायु प्रदूषण के खतरों के बारे में जागरूक करना और सेहतमंद रहने के लिए उचित कदम उठाना बेहद आवश्यक है। जीवनशैली से जुड़े रोग वाले मरीज, बच्चे और उम्रदराज लोग ज्यादा जोखिम में आते हैं। ऐसे लोगों को अत्यधिक प्रदूषित माहौल में ज्यादा समय नहीं रहना चाहिए। इसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग, मौसम में बदलाव और मानव सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहे हैं। रेफ्रीजरेटर से निकलने वाली क्लोरो-फ्लोरोकार्बन गैस पर्यावरण में मौजूद ओजोन की सतह को नुकसान पहुंचा रही है, जिससे त्वचा का कैंसर और मैलानोमा बढ़ रहा है।

सच यह है कि लोगों का स्वास्थ्य रोज गिरता जा रहा है, वे बीमारियों की चपेट आते जा रहे हैं। अगर सरकार चाहे तो इसके अलावा कुछ दूरगामी फैसले हो सकते हैं। पेड़ लगाने को क्यों नहीं अनिवार्य किया जा सकता है और पेड़ काटने को कानूनी जुर्म। जहां भी खाली जमीन बची है, वहां बहुत सारे पेड़ लगाए जा सकते हैं। ऐसा नहीं हो पा रहा है। हालांकि पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सोनीपत में पेड़ लगाने की मुहिम शुरू भी हुई। लेकिन हुआ क्या? सरकार की पेड़ लगाने की मुहिम शुरू हुई और खजूर के काफी सारे पेड़ लगाए गए, लेकिन वे पेड़ आज कुछ खत्म हो चुके हैं और कुछ खत्म होने के कगार पर हैं।

हमें यह समझना होगा कि कुछ फैसले लंबे समय के लिए होंगे और कुछ तात्कालिक राहत के लिए। लंबे समय के कई फैसले इस तरह हो सकते हैं कि सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, निर्माण कार्यों को पर्यावरण के अनुकूल बनाना, आसपास के किसानों को इस बात के लिए राजी करना कि वे अपने खेतों में पराली न जलाएं। इस तरह के कुछ समाधान हैं, जिन्हें तत्परता से अमल में लाने की जरूरत है। साथ ही इसका एक इलाज हरित इमारत जैसी कोई अवधारणा भी है। इसको अगर प्रोत्साहन दिया जाता तो सब कुछ तेजी से बदल सकता है। इस तरह की तकनीक बहुत महंगी भी नहीं है। इसका इस्तेमाल बढ़ेगा, तो लोगों में जागरूकता भी बढ़ेगी। लेकिन इस तरह की सोच फिलहाल कहीं नहीं दिखती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.