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दुनिया मेरे आगेः जो हम बोलते हैं

सम्मानसूचक शब्दो और वाक्यो का बहुत महत्त्व होता है। जरा-सी गलती हमारे व्यक्तित्व पर तो प्रश्नचिह्न लगाती है, वहीं सामने वाले की भावनाओं को आहत भी कर सकती है। कुछ ऐसे जटिल शब्द भी होते हैं, जिनके उच्चारण में हम अक्सर हंसी का पात्र बन जाते हैं।

Author Published on: May 23, 2020 2:13 AM
सार्थक और सटीक अभिव्यक्ति के लिए एक सही भाषा का होना बहुत जरूरी माना गया है।

एकता कानूनगो बक्षी

जन्म के बाद सबसे पहला शब्द जो हमने बोला होगा, वह हम नहीं जानते हैं। लेकिन यकीनन हमारे बड़ों की स्मृति में वह जरूर होगा, जिनकी खुशी उस वक्त हमारी पहली बुदबुदाहट या चहक से दोगुनी हो गई होगी। तब उनका आह्लाद देखने लायक रहा होगा। हमारे मुंह से निकली अस्पष्ट-सी ध्वनि से उन्होंने कुछ मिलते-जुलते शब्दों की कल्पना की होगी। किसी को ‘मम्मा’, किसी को ‘मां’ किसी को ‘दादा’, ‘बाबा’, ‘पापा’ जैसा ही कुछ सुनाई दिया होगा।

हमारे जीवन मे भाषा का आगमन उत्सव की तरह खुशियां बिखेरता है। जैसे-जैसे हम जीवन यात्रा में आगे बढ़ते हैं, हमारे साथ हमारी भाषा भी एक लंबी यात्रा तय करती जाती है। अबोध बच्चे से परिपक्व होते-होते हमारी भाषा काफी हद तक हमारे व्यक्तित्व और आचरण का आईना-सी बनती जाती है। बोलचाल की भाषा में शब्दों के चयन और लहजे से ही परिवार, हमारे देश, क्षेत्र, यहां तक कि हमारी शिक्षा और समझ का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

शुरूआत में भले ही हम एक अर्थहीन ध्वनि के साथ भाषा में प्रवेश करते हैं, पर उसी क्षण से बोलने में सीखने, समझने का यह रोमांचकारी सफर शुरू हो जाता है। जैसे भोजन, वायु और जल मनुष्य के लिए बेहद जरूरी है, उसी तरह खुद को सही तरह से अभिव्यक्त करना भी उतना ही आवश्यक है। बिना इसके संवाद मुश्किल है। हालांकि यह भी सही है कि कई बार हमें संकेतों में भी या देह भाषा से भी अपनी बात कहनी या संप्रेषित करनी होती है, लेकिन वह किसी विशेष कारण या विवशता में किया जाना जरूरी होता है।

सार्थक और सटीक अभिव्यक्ति के लिए एक सही भाषा का होना बहुत जरूरी माना गया है। इस प्रयोजन से छात्र जीवन से ही इसके उपाय भी किए जाते हैं। शिक्षा के दौरान ही भाषा को एक विषय की तरह पाठ्यक्रम में शामिल करके उसका व्यवस्थित अध्ययन करवाया जाता है। बारहखड़ी से लेकर शब्दों, वाक्यों के निर्माण की प्रक्रिया समझाई जाती है। व्याकरण में हमें अक्षरों को मिला कर शब्द बनाना सिखाया जाता है। फिर शब्दो को जोड़ कर वाक्य। फिर वाक्यों में शब्दों का चमत्कार, उससे निकलने वाले अर्थ और व्यंजनाएं। शब्दों के प्रयोग मात्र को बदल कर उसके विभिन्न अर्थ निकलने का ऐसा जादू कि कहें कुछ और सामने वाला सुने कुछ, समझे कुछ। भाषा का शृंगार, उसकी अलंकारिकता, यही सब सीखते-सीखते व्यक्ति भाषा के प्रयोग में समृद्ध और बोलने के मामले में प्रभावी होता जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम हमेशा इस सीखे हुए का सही और विवेकपूर्ण उपयोग करने के प्रति जागरूक रह पाते हैं? जिससे हम संबोधित होते हैं, क्या उस समय सामने वाले की मन:स्थिति और उसके सम्मान का ध्यान रख कर उचित शब्दों का चयन कर बोल पाते हैं?

सम्मानसूचक शब्दो और वाक्यो का बहुत महत्त्व होता है। जरा-सी गलती हमारे व्यक्तित्व पर तो प्रश्नचिह्न लगाती है, वहीं सामने वाले की भावनाओं को आहत भी कर सकती है। कुछ ऐसे जटिल शब्द भी होते हैं, जिनके उच्चारण में हम अक्सर हंसी का पात्र बन जाते हैं। हमारे बोलने में हमारे शब्द भंडार का बहुत महत्त्व होता है। किसी शब्दकोश की तरह हमारे ज्ञान में बहुत सारे शब्दों को अपनी याद में बनाए रखने का प्रयास हमेशा फायदेमंद सिद्ध होता है। हम शब्दों के सही अर्थ तो सीखते ही हैं, अन्य स्थानीय भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल भी हमें सीखते जाना चाहिए। जैसे-जैसे हमारी जान-पहचान का दायरा विस्तृत होता है या हम दूसरे क्षेत्र में जाते हैं, वहां की क्षेत्रीय भाषा का असर भी हम पर होने लगता है। भाषा के ज्ञान में और गहरे उतर कर यह समझ भी विकसित होती है कि अपनेपन की भाषा अलग है जो क्षेत्र विशेष से जुड़े आम बोलचाल के शब्दों के प्रयोग और उनके अनूठे उच्चारण के प्रयोग से आती है। जबकि कार्यालयीन या औपचारिक भाषा का तौर-तरीका पूरी तरह भिन्न होता है।

बोलचाल में व्यक्तिगत विकल्प भी संभव है। हम किन शब्दों का उपयोग करना पसंद करते हैं और किस तरह का लहजा प्रयोग कर बोलते हैं, यह व्यक्ति विशेष पर भी थोड़ा बहुत निर्भर करता है। यही कारण है कि किसी देहात में जहां शिक्षा का अभाव होने पर भी लोगों से मधुर, गरिमापूर्ण आत्मीय भाषा सुनने को मिल जाती है, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त और शिष्टाचार के सभी गुर सीखे व्यक्ति से ओछे और निम्नतर शब्दों से युक्त अप्रिय वाक्य सुन कर मन क्षोभ से भर उठता है। जरूरी नहीं कि अच्छी तालीम से ही किसी की भाषा बेहतर हो जाती है।

इस बात की परवाह किसी को नहीं कि कभी-कभी हम निदेर्शात्मक वाक्यों का इस्तेमाल हास्यपूर्ण तरीके से करके घबराहट पैदा करने की कोशिश कर देते हैं। जहां संवेदनात्मक वाक्यों की आवश्यकता होती है, वहां कठोर शब्दों से बने वाक्यों का प्रयोग करते हैं। अवसर और परिस्थिति की गंभीरता को समझे बिना मजाक करते हैं। बोलचाल में भाषा का पतन इसी तरह शुरू होता है।

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