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हाशिये पर हंसी

इन दिनों लगता है, हंसी को हाशिये पर धकेला जा रहा है। अब यह जानबूझ कर हो रहा है या सहज भाव से हमारे जीवन के तनावों और व्यस्तता के चलते, यह कहना कठिन है!

Author नई दिल्ली | January 2, 2016 12:02 AM

इन दिनों लगता है, हंसी को हाशिये पर धकेला जा रहा है। अब यह जानबूझ कर हो रहा है या सहज भाव से हमारे जीवन के तनावों और व्यस्तता के चलते, यह कहना कठिन है! अगर कोई व्यक्ति हंसमुख स्वभाव का है तो उसे अगंभीर मान लिया जाता है या उसकी उपेक्षा हंसोड़ समझ कर की जाती है। हालत यह है कि हंसी हमारे समाज में दुर्लभ-सी हो गई है। उसे तलाशने के लिए कुछ लोग सुबह-सुबह पार्कों में जाते हैं, हास्य योग करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि पार्कों की यह हंसी जबरन हंसी है, सहज नहीं। इसमें खिलखिलाहट नहीं है, कृत्रिम अट्टहास जरूर है। क्या एक स्वस्थ और विकसित समाज में हंसी को खोजने के लिए इस कदर बनावटी हंसी हंसना पड़ेगा? क्या अब असली हंसी का यही मूल्य रह गया है? क्या हमने स्वाभाविक हंसी को ग्राम्य समाज और कम पढ़े-लिखे लोगों की पहचान बना कर छोड़ दिया है? ऐसा लगता है कि शहरों-महानगरों की व्यस्तताओं में हंसी को बहिष्कृत कर दिया गया है!

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सच यह है कि हंसी ऐसी मूल्यवान कुदरती देन है, जिससे हम न केवल स्वस्थ महसूस करते हैं, बल्कि इससे कई मांसपेशियों का व्यायाम भी होता है। आज अवसाद और तनावजनित रोग बढ़ते जा रहे हैं। इसका एक कारण हमारे हास्यबोध का कम होते जाना भी है। हालांकि हास्य को लेकर हमारे साहित्य में भी कोई बहुत पुष्ट परंपरा नहीं मिलती है। संस्कृत के कुछ ग्रंथों को छोड़ कर। कुछ व्यंग्यकारों और कवियों ने जरूर कलम चलाई है। भगवतीचरण वर्मा, बरसानेलाल चतुर्वेदी, काका हाथरसी, शैल चतुर्वेदी, ज्ञान चतुर्वेदी, अशोक चक्रधर, अशोक चक्रधर, सुभाष चंदर आदि ने। लेकिन ये नाम गिनती भर के हैं। हास्य को लेकर मंचों पर अधिकतर राजनीति, पत्नी, साली और पुलिस वाले ही निशाने पर रहे हैं। चैनलों पर ‘ये जो है जिंदगी’,

‘लापतागंज’, ‘चिड़िया घर’, तारक मेहता का ‘उल्टा चश्मा’ जैसे कुछ ही स्वस्थ सीरियल रहे हैं। आजकल ‘सुमित संभाल लेगा’, ‘भाभीजी घर पर हैं’ जैसे धारावाहिक द्विअर्थ संवादों से भरे होते हैं, जिन्हें निर्मल हास्य नहीं कहा जा सकता। यों तो हम दैनिक जीवन में दूसरों की कमियों, बेवकूफियों, चुटकुलों पर खूब हंसते हैं, लेकिन यह हंसी विकृतियों में ही वृद्धि अधिक करती है, विरेचन कम। हमारे अधिकतर सीरियल या तो फूहड़ हास्य परोसते नजर आते हैं या विदेशी सीरियलों की भौंडी नकल करते। तो क्या इसका कारण भारत के बंद समाज में छिपा है या फिर हमारे धारावाहिक लेखकों में मौलिक हास्य बोध का ही अभाव है? या फिर क्या वे गंभीर न समझे जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे समाज में सहज आनंद की लय टूट चुकी है और हम सनसनीखेज खबरें पढ़ने के आदी हो गए हैं, गंभीरता का परदा ओढ़ना हमें अच्छा लगने लगा है! या फिर क्या भौतिकता की चकाचौंध में हमारा समाज अपनी नैसर्गिक पहचान खो चुका है? हास्य कलाकारों के प्रति बॉलीवुड भी बहुत उदार नहीं रहा है। स्वस्थ हास्य प्रधान फिल्मों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘मालामाल वीकली’, ‘शौकीन’, ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ आदि। इसमें से कुछ तो रीमेक या विदेशी फिल्मों की नकल भर हैं, मौलिकता और स्वस्थ मनोरंजन का आज की फिल्मों अभाव दिखता है। असल में सभ्य और गंभीर होने का बाना हम दिन-रात ओढ़े रहते हैं। किसी सभा में अचानक हंस देना किसी का उपहास है तो कक्षा में हंस देना अध्यापक का अनादर और अनुशासनहीनता। बच्चों की हंसी पढ़ाई और बस्ते के बोझ दले दब गई है और नौजवानों की हंसी को कॅरियर की चिंताएं लील गई हैं। जब से चौपालें बंद हुई हैं, शहरों में कॉफी हाउस ठप्प हुए हैं, हमारे संवाद की निरंतरता बाधित हुई है। हमें ठहाके लगाए बरसों हो गए, पेट पकड़ कर हंसे युगों बीत गए।

हमारे मनोभावों के वाहक ‘स्माइली’ यानी मुस्करहाट या हंसी के संकेतक रह गए हैं। भावों को लिपिबद्ध करने या व्यक्त करने की जगह हम ‘स्माइली’ से काम चला रहे हैं। ऐसा लगातार होता रहा तो कहीं कल हम भावहीन रोबोट में न तब्दील न हो जाएं! कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि कहीं ये ‘स्माइली’ हम पर ही तो नहीं हंस रहे कि यह मनुष्य कितना लाचार है- बेचारा ढंग से हंस भी नहीं सकता… इसे हंसने के लिए भी बैसाखियों की जरूरत पड़ने लगी है!

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