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बच्चों की दुनिया में बड़े

दिल्ली में दूध का छोटा कारोबार करने वाले सत्ताईस साल के पिता ने घर में घुसते ही अपने पांच साल के बच्चे को पढ़ाई के बजाय मोबाइल पर खेलते देखा और पीटने लगा।

सांकेतिक फोटो।

दिल्ली में दूध का छोटा कारोबार करने वाले सत्ताईस साल के पिता ने घर में घुसते ही अपने पांच साल के बच्चे को पढ़ाई के बजाय मोबाइल पर खेलते देखा और पीटने लगा। बेहोशी की हालत में बच्चे को अस्पताल पहुंचा गया, पर उसे बचाया नहीं जा सका। यह दुखद घटना कई अभिभावकों के लिए एक चेतावनी है। कोरोना काल में एक तरफ अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है, तो घरों में बंद बच्चों को मोबाइल-टीवी का सहारा है। पढ़ाई के जरिए अपने बच्चों को सफल होते देखने की अभिभावकों की हसरत स्वाभाविक है, लेकिन उनकी अतिमहत्त्वाकांक्षा का एक अव्यावहारिक और दुखद अंत भी हो सकता है।

अनेक घरों में हमने देखा है कि बच्चे मोबाइल लिए बिना खाना नहीं खाते हैं। कामकाजी अभिभावकों के लिए भी यह सहूलियत का मामला होता है कि बच्चे टीवी-मोबाइल देखते-देखते खाना खा लें या व्यस्त रहें। स्कूल बंद होने से बच्चे घरों में हैं और आठ-दस घंटे उनका स्क्रीन टाइम एक सामान्य बात हो गई है। यह एक चिंताजनक संकेत है। मोबाइल बच्चे को व्यसनी बना रहा है। मगर जो अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे मोबाइल छोड़ दें, क्या वे खुद एक दिन बिना मोबाइल के रह सकते हैं? हकीकत यह है कि बच्चे घरों में हैं, मगर अभिभावकों के पास बच्चों के लिए कोई योजना नहीं है कि उनका कैसे रचनात्मक और सकरात्मक उपयोग हो सकता है।

स्कूल बंद जरूर हुए हैं, लेकिन घरों में बच्चों को ध्यान में रखते हुए कितने अभिभावकों ने अपनी दिनचर्या बदली है? जब स्कूल भी बच्चों को मोबाइल पर पढ़ाएगा और होमवर्क देगा, तो क्या बच्चा सिर्फ स्कूल के काम पर केंद्रित रहेगा? ऐसा माना जाता है कि बच्चा अगर एक घंटा फोन इस्तेमाल करता है, तो उसकी नींद सोलह मिनट कम हो जाती है। उसकी एकाग्रता नहीं बन पाती है। पढ़ने के बजाय देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उनमें शरीरिक श्रम से पलायन का भाव दिख रहा है। समस्याओं से जूझने का साहस कम होता जा रहा है।

यह एक बदलती दुनिया का संकेत भी है। अब अभिभावक चाह कर भी बच्चों को इंटनेट और मोबाइल से दूर नहीं रख सकते। यह कोई 1980-1990 का दौर नहीं है जब दूरदर्शन पर आठ बजे पूरा परिवार सप्ताह में दो दिन चित्रहार देखता था और रविवार को रामायण-महाभारत के बाद टीवी बंद हो जाता था। इस तरह टीवी देखने का समय और क्या देखना है, दोनों नियंत्रित किए जाते थे। अब अगर अभिभावक कंटेंट को नियंत्रित करने की कोशिश करें भी, तो उन्हें बदले वक्त के साथ निराशा हाथ लगेगी। अभिभावकों को बच्चो के कहने पर आज इच्छा के विरुद्ध भी बहुत कुछ स्वीकार करना होगा। बच्चे आज सूचनाओं की बाढ़ में हैं। एक क्लिक से वे दुनिया के किसी कोने से जुड़ जाते हैं। आज के किशोर एक ऐसी आभासी दुनिया के दरवाजे पर खड़े हैं, जिसकी शब्दावली-भाषा अभिभावकों के लिए अनजान है। उनके नायक अब देशी के साथ-साथ विदेशी शख्सियत भी हैं।

मगर जो अभिभावक छोटी उम्र से बच्चों की जिद पर मोबाइल देकर उनको चुप कराने का आसान तरीका निकालते हैं, बाद में उनके लिए यह एक गंभीर समस्या भी बन सकती है। अभिभावकों के पास अगर बच्चों को बाहर घुमाने, साथ टहलने और कोई शारीरिक श्रम वाला खेल या संगीत की तरफ प्रेरित करने, उनके साथ तर्कपूर्ण संवाद के लिए समय नहीं है, तो इसका असर बच्चों पर बाद के वर्षों में दिखेगा।

मोबाइल-इंटरनेट की दुनिया पैसा कमाने के आसान तरीकों की तरफ भी बच्चों को आकर्षित करती है। इसी महीने कुछ युवा नफरत फैलाने वाले सुल्ली, बुल्ली एप्प के मामले में जेल भेजे जा चुके हैं। अपने देश में सूचना तकनीक संबंधी कानून, बच्चों और किशोर वय से संबंधित प्रावधानों, भारतीय दंड संहिता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की जानकारी का अभाव है, जो अनजाने में बच्चों को अपराधी बना सकता है। मोबाइल-इंटरनेट को नजरअंदाज करने के बजाय उसका रचनात्मक उपयोग कैसे हो, यह अभिभावकों की पहली जिम्मेदारी है।

तकनीकी विकास को रोका नहीं जा सकता। दुनिया में मोबाइल का विस्तार तेजी से हो रहा है और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लाखों की तादाद में बढ़ रहे हैं और साथ ही इनसे जुड़े अपराधों में भी इजाफा हो रहा है। ऐसी स्थिति में तकनीक के साथ सामंजस्य बैठाना ही होगा। बच्चों की परवरिश से लेकर सामाजिक ताना-बाना, आपसी संबंध और संवाद इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि व्यक्ति ही नहीं, परिवार भी एकाकी होने लगे हैं। अभिभावकों को इन सीमाओं को पहचाना और इसका विकल्प तलाशना होगा। अभिभावकों को बच्चों को लेकर अतिमहत्त्वाकांक्षी होने और मानसिक तनाव से बचना होगा। बच्चों के लिए अगर अभिभावकों के पास समय और संयम है तो बच्चे भविष्य में जैसी दुनिया बनेगी, उसमें अपनी जगह बना लेंगे। बस उनको यह एहसास होने दीजिए कि आप उनके साथ खड़े हैं और उनको समझते हैं।

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