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दुनिया मेरे आगेः अपनेपन की जमीन

देश के अलग-अलग हिस्सों में कई वजहों से लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ रहे हैं। कहीं गरीबी से तंग आकर, कहीं बढ़ती आपराधिक घटनाओं से त्रस्त होकर तो कहीं बेहतर जीवन की तलाश में।

Author August 22, 2018 5:33 AM
सी जमीन, ऐसे गांव और ऐसी जन्मभूमि का मोह कोई कब तक पाले, जहां इज्जत के साथ दो जून की रोटी तक न नसीब होती हो।

अमरेंद्र कुमार राय

यों मैं काफी समय से गांव से बाहर ही रह रहा हूं, लेकिन वहां आना-जाना लगा रहता है। माता-पिता थे तो ज्यादा आता-जाता था। लेकिन अब काफी कम हो गया है। शादी-विवाह या खास मौकों पर या किसी काम से ही आना-जाना होता है। गांव की याद तो आती है, पर ऐसा भी नहीं कि जीवन में उसकी कमी महसूस होती है। लेकिन एक दिन चाचा ने जब जन्मभूमि की बात उठाई तो सोच में डूब गया। जन्मभूमि में ऐसा क्या है, जिसके लिए इतना मोह होना चाहिए! अपने आसपास नजर दौड़ाई तो देखा अपने परिवार के ही कई लोग घर छोड़ कर शहर में जा बसे हैं। कोई पणजी में तो कोई अमदाबाद में। कोई इलाहाबाद पहुंच गया है तो कोई बनारस। किसी के घर में कोई भाई रहता है तो किसी के घर में ताला लग गया है। चाचा के बच्चे भी बनारस और देहरादून में रहने लगे हैं। अब जब चाचा गांव जाते हैं, तभी घर का ताला खुलता है। अंतर बस इतना है कि सबने अपनी जमीन नहीं बेची है। हालांकि मेरे बड़े भाई पिछले करीब तीन दशक से शहर में रह रहे हैं और अब उन्होंने अपना मकान भी वहीं बना लिया है, इसलिए अपने हिस्से की जमीन बेच दी। चाचा उनके सामने चुप रह गए, लेकिन मुझसे कहा कि उन्हें क्या पता कि पुरखों ने कितनी मेहनत से जमीन बनाई थी और कितना कष्ट सह कर उसे बचाया था। आए और बेच कर चल दिए। आखिर जन्मभूमि भी कोई चीज होती है। ऐसे कोई थोड़े ही छोड़ देता है!

एक जमाना था, जब गांव में जमीन हैसियत की पहचान होती थी। पहले जमीन के सहारे ही पूरे परिवार का गुजर-बसर होता था। लेकिन परिवार बढ़ने के साथ ही जमीन का बंटवारा होता गया और अब कई लोगों के हिस्से जितनी जमीन है, उससे भरण-पोषण नहीं होता। लोग रोजगार की तलाश में शहरों में जाने लगे और वहीं बसने लगे। उनके लिए गांव की जमीन बेकार लगने लगी। उस जमीन से जितना साल भर में मिलता है, उसे लेने जाने में ही करीब उतनी रकम खर्च हो जाएगी। ऐसे में निरी भावुकता किसी को कब तक जमीन बेचने से रोके रख सकती है। मुझे लगता है कि यह किसी एक इलाके में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में हो रहा है। लोग गांव छोड़ कर शहरों का रुख कर रहे हैं। जिसके पास गांव में दस बीघा पक्की जमीन है, पंद्रह हजार रुपया महीना कमाने वाला मामूली मजदूर भी उससे अच्छा जीवन शहर में जी रहा है। कम से कम वह आत्महत्या तो नहीं कर रहा! यहां तो आए दिन बेइज्जत होना और मौत को गले लगाने को मजबूर होना पड़ा रहा है। फिर ऐसी जमीन, ऐसे गांव और ऐसी जन्मभूमि का मोह कोई कब तक पाले, जहां इज्जत के साथ दो जून की रोटी तक न नसीब होती हो।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कई वजहों से लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ रहे हैं। कहीं गरीबी से तंग आकर, कहीं बढ़ती आपराधिक घटनाओं से त्रस्त होकर तो कहीं बेहतर जीवन की तलाश में। कुछ साल पहले सुना था कि उत्तराखंड में सौ से ज्यादा गांवों का पता नहीं चल रहा। बाद में एक सरकारी रपट में बताया गया कि असुविधाओं के चलते लोगों ने उन गांवों को छोड़ दिया और अब वे गांव नष्ट हो गए हैं। गरीब और परेशान लोगों की तो बात ही छोड़िए। वे तो अभाव और जरूरत की वजह से देश के इलाके से दूसरे इलाके में गुजारे या बेहतर जीवन की तलाश में चले जाते हैं। लेकिन बड़े-बड़े धन्ना सेठ दूसरी वजहों से अपनी जन्मभूमि छोड़ने में नहीं झिझकते। पिछले कुछ सालों में हजारों अरबपति और खरबपति अपना देश छोड़कर विदेशों में जा बसे हैं। उन्होंने अपनी जन्मभूमि तो छोड़ी ही, देश तक छोड़ दिया। ऐसे खरबपतियों की तो देशभक्ति पर भी सवाल है कि क्या वे अपने देश से प्यार करते थे! क्या वे देशभक्त थे भी! उन्हें किसी चीज ने विचलित नहीं किया।

पहले कहा जाता था और अभी भी कुछ लोग कहते नहीं थकते कि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि..! यानी स्वर्ग भी मिले तो अपनी जन्मभूमि कभी नहीं छोड़नी चाहिए… जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है। मेरे पुरखे कहीं और से आकर अपने मौजूदा गांव में बसे थे। जितने बड़े उद्योगपति या कारोबारी हैं, सबकी जन्मभूमि कहीं और कर्मभूमि कहीं और है। आजकल यह बहस भी चल रही है कि पूरा आर्य समुदाय कहीं और से आकर भारत में बसा है। आस्था के लिहाज से देखें तो खुद भगवान कृष्ण पैदा हुए मथुरा में, लालन-पालन हुआ गोकुल में, लेकिन वे जा बसे द्वारका में। इसलिए अपना मन भी यही कहता है कि यह जीवन-चक्र है। समय की धारा है, रुकेगी नहीं, आगे बढ़ेगी। कोरी भावुकता से काम नहीं चलेगा।

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