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विश्वास के संकेतक

स्कूल समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है। विद्यालयी पाठ्यचर्या की राष्ट्रीय रूपरेखा 2005 में यह कहा गया है कि गांव में स्कूल नहीं होना चाहिए, बल्कि स्कूल में गांव होना चाहिए। इसके अलावा, यह दस्तावेज स्कूल के दरवाजों को समुदाय के लिए खोल दिए जाने की वकालत भी करता है।

Author July 8, 2019 2:04 AM
प्रतीकात्मक फोटो फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

अनानास कुमार

सरकारी स्कूलों में शिक्षा से जुड़े काम के दौरान आजकल बहुत सारे उन शिक्षक साथियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिलना जुलना हो रहा है जो अपने प्रारंभिक विद्यालयों में सेवा भाव से स्कूली शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने में लगे हुए हैं। शिक्षकों के इन तमाम प्रयासों के बावजूद इनके स्कूलों में बच्चों की लगातार घट रही संख्या इनका न केवल मनोबल तोड़ रही है, बल्कि इनके धैर्य की परीक्षा लेने की भी कोशिश करती है।

सरकारी स्कूलों के लिए तो समाज अपने स्तर और तरीकों से बच्चों के द्वारा सीखे ज्ञान की जांच करता रहता है। मसलन, कई बार बच्चों से कुछ पढ़वा लेना, कुछ लिखने के लिए कह देना और किसी बातचीत में शामिल कर लेना आदि। एक स्कूल में प्रधान शिक्षक ने बताया कि एक बार जब उनके बच्चे स्कूल की छुट्टियों से घर जा रहे थे तो रास्ते मे पान की गुमटी पर कुछ लोग खड़े थे, जिनकी यह पूर्व धारणा थी कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। लोगों ने स्कूल से आ रहे एक बच्चे को रोक कर उससे कुछ पूछा और फिर एक विज्ञापन पढ़ने की चुनौती देते हुए यह कहा कि अगर तुम इसे पढ़ दोगे तो बदले में तीन पैकेट बिस्कुट और टॉफी मिलेगी। वे सभी इस बात से आश्वस्त थे कि सरकारी स्कूल का बच्चा यह विज्ञापन नहीं पढ़ पाएगा। बच्चे ने पूरे विज्ञापन को पढ़ डाला और बदले में बिस्कुट और टॉफियां प्राप्त कर ली। इस घटना से वहां के समाज में उस सरकारी स्कूल की छवि को बेहतर करने में काफी मदद मिली और लोगों का नजरिया बदला।

स्कूल समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है। विद्यालयी पाठ्यचर्या की राष्ट्रीय रूपरेखा 2005 में यह कहा गया है कि गांव में स्कूल नहीं होना चाहिए, बल्कि स्कूल में गांव होना चाहिए। इसके अलावा, यह दस्तावेज स्कूल के दरवाजों को समुदाय के लिए खोल दिए जाने की वकालत भी करता है। यानी यहां स्कूल और समुदाय के मजबूत जुड़ाव की बात कही गई है। स्कूल का समुदाय से जुड़ाव उसे कई मायने में मजबूती प्रदान करता है। दरअसल, जब समुदाय को वहां स्थापित स्कूल के ‘अपने’ होने का अहसास हो जाता है, तब वह अपने स्तर से वहां शिक्षकों को सहयोग, स्कूल की देखभाल और स्कूली गतिविधियों में शामिल होने जैसी प्रक्रिया को अपना लेता है। अपने अनुभव सुनाने के दौरान एक शिक्षक साथी ने बताया कि विद्यालय प्रबंधन समिति की मासिक बैठक में जब स्कूल को प्राप्त अनुदान को साझा करने जैसी कोशिश की तो शुरू में लोगों को विश्वास दिलाने में थोड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वे इस पूर्वाग्रह से ग्रसित थे कि सरकारी स्कूलों में काफी पैसा आता है और अध्यापक गोलमाल कर जाते हैं। लेकिन उस शिक्षक साथी की कोशिशों के बाद यह काम आसान हो गया और उन्हें समुदाय के साथ मिल कर निर्णय लेने में काफी सहजता होने लगी। समुदाय से जुड़ाव ने उनके लिए अच्छा काम किया और समुदाय आबंटित बजट में स्कूल के लिए बेहतर सुविधा जुटाने में मदद करने लगा।

स्कूल के विभिन्न घटकों और प्रमुख रूप से मानव संसाधनों के बीच का आपसी समन्वय न केवल विद्यालय को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि समाज को विश्वास का एक बेहतरीन संकेतक भी प्रदान करता है। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षक साथियों, अभिभावकों और भोजन माताओं के बीच बेहतर समन्वय हो, ताकि बच्चों का सीखना और गुणवत्ता युक्त भोजन सुचारु रूप से चलता रहे। दरअसल, स्कूल में शिक्षकों का आपसी समन्वय उन्हें मिल-जुल कर सीखने में मदद करता है और शिक्षा के सामाजिक परिप्रेक्ष्य को भी जोड़ता है। सीखने की चाह, संसाधनों के जुगाड़, संरक्षण और बुद्धिमता से उपयोग में काफी मदद करता है। इस बात को साझा करने के पीछे मुख्य बात यह है कि जब तक स्कूलों में संसाधन नहीं होंगे, सीखने की प्रक्रिया के भी सही तरीके से होने में संशय बना रहेगा। इन संसाधनों के संदर्भ में व्यावहारिक अनुभव यह रहे हैं कि कुछ संसाधन देने की प्रमुख जिम्मेदारी जहां सरकार की होती है, वहीं इसको संभालने की जिम्मेदारी समुदाय की होती है। मसलन, अगर सरकार ने स्कूल का भवन निर्माण करवा दिया है तो फिर उसके रखरखाव की जिम्मेदारी उस विद्यालय के समुदाय की होगी। अगर समुदाय इस कार्य में सहयोग नहीं करेगा तो आए दिन स्कूल से सामान चोरी होने या नुकसान की खबरें मिलती रहेंगी। जबकि जब समुदाय शामिल होता है तो कई बार वह अपनी तरफ से भी योगदान कर बेहतर संसाधनों की व्यवस्था कर देता है। दरअसल समाज से स्कूलों के दुराव ने अविश्वास की खाई बनाने और बनी खाई को गहरा करने का काम किया है। इन दोनों को पाटने वाली विभागीय स्थितियां भी कम ही क्रियाशील दिखती हैं। इसकी वजह से हुआ यह है कि समाज का विश्वास सरकारी स्कूलों पर से लगभग उठ चुका है। लेकिन अगर इन स्कूलों के साथी बच्चों के सीखने का सुदृढ़ प्रमाण ठोस रूप से समाज में रख पाएं तो समाज निश्चित रूप से विश्वास के अन्य संकेतकों को ध्यान में रखते हुए विद्यालय की खोती अस्मिता को बचाने के लिए न केवल आगे आएगा, बल्कि हर तरह से स्कूलों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।

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