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दुनिया मेरे आगे: गुम होती बतकही

ऐसा कौन शख्स होगा जो रोजमर्रे की ऊब तोड़ने और खुद की बोरियत मिटाने के लिए गपशप न करता हो। मन-बहलाव का सबसे सहज और सुलभ तरीका। इसे अनावश्यक समय नष्ट करने के दायरे में नहीं रखा जा सकता है। मन की भड़ास निकालने को एक सहारा चाहिए, जिसमें अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा और उपहास समाहित हो। इसमें वक्त भी कट जाता है और मन के गुबार भी निकल जाते हैं।

मोबाइल और सोशल मीडिया के आज के जमाने में बैठकर गप्पे लड़ाना पुरानी बातें हो गई हैं।

अशोक सण्ड
भले ही व्यस्तता एक प्रकार का आभूषण हो, लेकिन यही व्यस्तता जब बिना बात की होती है तो और रोचक और दिलचस्प होकर गपशप का रूप धारण कर लेती है। गप्प शब्द गल्प यानी कहानी का अपभ्रंश। समाज का एक दौर वह भी था, जब चौपालों पर पुरुषों और पनघटों पर स्त्रियों गप्प होती थी। विज्ञान कहता है कि कोई चीज कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदल लेती है। नई सभ्यता ने चौपाल को क्लब में समेटा तो जनता ने उसे जीवित रखने के लिए चायखाना, नुक्कड़, पान की दुकानें और अधिक प्रतिष्ठित रूप देने के लिए काफी हॉउस खोले, जहां विद्यार्थियों से लेकर नेता, अधिकारी, नए-पुराने वकील और खाली वक्त गुजारते साहित्यकारों का जमघट रहता। अजस्र धारा बहती गप्पों की।

कुछ मायनों में बौद्धिक केंद्र तो कुछ अर्थों में देश की राजनीति इन्हीं अड्डों पर तय होती। उधर पनघट के नेपथ्य और संज्ञाहीन होने से महिलाओं के बीच किटी पार्टियों का उदय हुआ। अकाल गति को प्राप्त हो गए गप्पों के अड्डे। फोन की स्क्रीन पर अवतरित ‘चैट’ की काल में लंतरानी युग गायब। चबूतरों के गायब होते ही गप्पबाजी का सुख जाता रहा। लंबवत खड़ी अट्टालिकाओं के फ्लैटों में भयानक अकेलापन मित्रहीन होता आभासी समाज। सारी नातेदारी-रिश्तेदारी फोन की स्क्रीन तक सीमित। स्वगत कथन में सांस लेने लगे पुरुष और महिलाएं। जाता रहा गपियाने का सुख। जो गपशप कानों को सुख देती दिलो-दिमाग पर उतरती थी, वह आंखों की गिरफ्त में आ चुकी है।

आमतौर पर गपशप को बकवास या फिर चुहलबाजी की हैसियत ही हासिल है। कहते हैं स्वस्थ और स्थिर मन से स्वस्थ चर्चा ही निकलती है। दुविधा से भरा और डरा हुआ मन बेकार की बातों की ओर झुकता है। अस्थिर मन में लालच, संशय परनिंदा तो समाई ही रहती है, बोरियत भी इन सबको आश्रय देने में अपना योगदान देती है। बोरियत से भरा मन जब कुछ कहेगा, बोलेगा तो उसका स्वरूप ‘गॉसिप’ ही होगा। होंठ तभी ज्यादा चलते हैं, जब मन अशांत रहता है। कबीर ने यों ही नहीं कहा था- ‘जब मन की खटपट मिटे, अधर भया ठहराय..!’

गपशप के भी तीन स्वरूप होते है। या तो वह विधायी भाव में सतह पर आती है या फिर नकारात्मक। तटस्थ भाव में किए गए तीसरे रूप में न तो चटकारे लिए जा सकते हैं, न ही आनंद मिलता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर मीगन रॉबिन्स के अनुसार अधिकतर गपशप तटस्थ ही होती है। जबकि कार्यस्थलों पर अध्ययन करने वाले शोधार्थी डॉक्टर एलेना माटीनेस्क्यू का कथन है ‘गॉसिपिंग’ नकारात्मक वार्तालाप में भी लाभप्रद भी हो सकती है। यह एक प्रकार का सामाजिक जुड़ाव होता है। सामाजिक प्रतिबद्धता, जिसमें विचारों की भागीदारी के जरिये किसी साथी के मतभेद तक को दूर किया जा सकता है।

कभी खालीपन में किस्सा और कहानी होती थी, इन दिनों कान में ‘इयर प्लग’ ठूंसे मोबाइल पर अंगुलियां थिरकती हैं। सोशल मीडिया के उदय के साथ ही बतकही में बदलाव आ गया। अब समूहों में लिखित पंचायत होती है या फिर अंग्रेजी भाषा की हड्डी-पसली तोड़ते हुए बातचीत होती है। चर्चा में रहते हैं बासी चुटकुले या फिर अदृश्य कोई अन्य व्यक्ति। इस बदलाव और तकनीकी क्रांति से पहले बतियाने वाला कहानी (गप्प) को कहने वाले के समांतर जीता सक्रिय साझीदार होता। अब किस्से-कहानियों में परनिंदा इतनी हावी रहती है कि अगर नया छंद शास्त्र लिखा जाए तो इसमें दसवां रस निंदा रस जुड़ जाएगा।

ऐसा कौन शख्स होगा जो रोजमर्रे की ऊब तोड़ने और खुद की बोरियत मिटाने के लिए गपशप न करता हो। मन-बहलाव का सबसे सहज और सुलभ तरीका। इसे अनावश्यक समय नष्ट करने के दायरे में नहीं रखा जा सकता है। मन की भड़ास निकालने को एक सहारा चाहिए, जिसमें अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा और उपहास समाहित हो। इसमें वक्त भी कट जाता है और मन के गुबार भी निकल जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि गपशप मित्रता को उपयोगी बनाने मे सहयोग ही करती है, लेकिन ऐसी गप्पबाजी को विमर्श या चर्चा के खांचे में नहीं फिट किया जा सकता। गप्पबाजी में जो अनिर्वचनीय सुख मिलता है, उसका अहसास कीबोर्ड पर थिरकती अंगुलियां नहीं दे सकतीं।

ऐसी धारणा है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में गपशप में कुछ अधिक ही रुचि लेती हैं। लेकिन इसके समाजशास्त्रीय संदर्भ समझने पर ऐसी धारणाओं का विश्लेषण करने में मदद मिलती है कि ऐसा क्यों होता है या लगता है। जब महिलाओं को मुख्यधारा के काम में बराबरी की भागीदारी करने का मौका नहीं मिलता है तो स्वाभाविक ही उनकी बातचीत के संदर्भ परिवार और आसपास की गतिविधियों में सीमित होंगे। हालांकि बिना काम के खाली बैठने वाली वह स्त्रियां हो या पुरुष, उनके बीच होने वाली बातचीत का बड़ा हिस्सा निरर्थक ही होता है।

आज जब मेट्रो, बस या फिर ट्रेन से इतर घर पर ही में हथेली में फोन और विनीत मुद्रा में सिर झुकाए खुद में ही अपनों से खोए लोगों पर नजर पड़ती है तो लगता है कि बहुत तेजी से हमारी सोच, जीवन-शैली और विश्वास में बदलाव आ गया है। संवादहीनता के इस दौर में बरबस कौंध रही है ये पंक्तियां- ‘हवा बदली है कुछ ऐसी जमाने की/ दुआएं मांगता हूं होश में आने की।’

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