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दिखावे का दंश

टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के बीच थोड़ी-थोड़ी देर पर होते ‘ब्रेक’ यानी मध्यांतर पर कौन ध्यान देता है!

Author October 24, 2015 10:56 AM

टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के बीच थोड़ी-थोड़ी देर पर होते ‘ब्रेक’ यानी मध्यांतर पर कौन ध्यान देता है! लेकिन कुछ रोज पहले एक ‘ब्रेक’ में सोना-चांदी छोड़ कर प्लेटिनम से बने आभूषणों के प्रचार पर मेरा ध्यान गया। एक तरह से यह सही है। समय के साथ जब बहुत कुछ बदल रहा है तो आभूषण भी बदलने चाहिए।

रही बात पैसों की तो बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो आभूषणों के नाम पैसे खर्च करने से हिचकते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि इस तरह के विज्ञापन समाज में चल रही दहेज जैसी कुप्रथाओं को और बढ़ावा दे रहे हैं। मेरी राय ऐसे विज्ञापनों पर बंदिश लगा देने के पक्ष में है। जहां एक गरीब आदमी अपनी रोजी-रोटी की फिक्र में पिस रहा है, कर्ज के बोझ तले दब कर आत्महत्या कर रहा है, उसके लिए अपनी बेटी का विवाह एक मुश्किल सपना है।

दूसरी ओर, एक आदमी अपनी दौलत दिखा कर अपने घर की महिलाओं के लिए बहुमूल्य आभूषण बनवाता है, विवाह समारोह पर पानी की तरह पैसा बहाता है तो यह एक गरीब इंसान का मजाक उड़ाने जैसा है। कम से कम मुझे ऐसा लगता है।

मैं यह नहीं कहती कि अगर किसी के पास पैसा है तो उसे खर्च नहीं किया जाए। लेकिन बस इतनी गुजारिश है कि दिखावा मत कीजिए। मैं जानती हूं दहेज प्रथा जैसी बीमारी का खत्म होना मुश्किल है। लेकिन समय बदल रहा है। आज की पीढ़ी के लड़के और लड़कियों ने इसके खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया है। मगर आज भी इस जहरीले सांप की जड़ें हमारे समाज में गहरी हैं।

इतना आसान नहीं है इस कुप्रथा को मिटाना। इसलिए अगर कोई माता-पिता अपनी बेटी को उपहार में कुछ देना चाहते हैं, तो उसके लिए बाकी लोगों को दिखाना जरूरी नहीं है कि देखो मैंने अपनी बेटी को हीरे का सेट दिया है या प्लेटिनम के आभूषण दिए हैं। किसी का भी यों अपने पैसे का दिखावा करना एक आम आदमी या परिवारों के लिए कैसे और कब परेशानी का सबब बन जाता है, यह किसी को पता भी नहीं चलता।

यही नहीं, एक-दूसरे पर हावी होने की प्रतियोगिता में फंसे और दिखावे के चक्कर में पड़ा लालची इंसान और लोभी समाज फिर दहेज की ऐसी ही मांग करने लगता है। एक गरीब परिवार के लिए कई बार इस तरह की मांग पूरी करना मुश्किल होता है या संभव नहीं होता। ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, जिसमें ठीक विवाह संस्कार के वक्त लड़के वाले बेतुकी मांग रख देते हैं और इसका खमियाजा हमारी मासूम बेटियों को भुगतना पड़ता है।

अनेक लड़कियों के सभी गुणों से संपन्न होने बावजूद उनका विवाह केवल दहेज न दे पाने के कारण नहीं हो पाता। ऐसा हो जाने पर कई बार समाज में बदनामी के डर से उसके अभिभावक आत्महत्या कर लेते हैं। अगर किसी तरह विवाह संपन्न हो भी जाए, तब बात इतनी ज्यादा बढ़ चुकी होती है कि हालात बेकाबू हो जाते हैं। दहेज के लोभ में बाद में भी लड़की को जला कर या जहर देकर मारने की कोशिश की जाती है। विवाह जैसा बंधन एक बाजार बन जाता है, जहां लड़के-लड़कियों की बोली-सी लगाई जाने लगती है।

इसके अलावा, अब लोग न सिर्फ विवाह, बल्कि जन्मदिन की दावत भी ऐसी देते हैं कि कई बार उस दावत में शामिल हुए माता-पिता को अपने आप में शर्मिंदगी-सी होने लगती है। हर कोई इतना अमीर नहीं होता कि अपने बच्चों के जन्मदिन की हर दावत हर बार किसी बड़े आलीशान होटल में दे पाए। नतीजतन बच्चों में एक दूसरे की देखा-देखी प्रतियोगिता की भावना पैदा हो जाती है। न चाहते हुए भी मां-बाप के सिर पर एक अनचाहा बोझ आ पड़ता है। ऐसे में वे भी अपने बच्चे का जन्मदिन ऐसे मानना चाहते हैं, जैसे किसी ने न मनाया हो। जबकि यह सिलसिला कभी खत्म नहीं हो सकता।

अफसोस यह कि दिखावे का नाटक बंद होने का नाम नहीं लेता। इस दिखावे से तो अच्छा है कि पैसे वाले लोग अपने बच्चों को किसी अनाथालय में ले जाकर वास्तविक दुनिया से उनका परिचय कराएं, ताकि उसे अपने आसपास के लोगों के बीच समान भाव बनाए रखने की शिक्षा मिल सके।

शादी के मौके पर कोई अमीर अभिभावक भी अपनी लड़की को ऐसे विदा करे जैसे एक आम इंसान करता है। मैं मानती हूं कि यह इस समस्या का स्थायी हल नहीं है। लेकिन यह भी हो सकता है कि शायद इससे दिखावे की होड़ कुछ कम हो। शान बघारने के लिए बिना मतलब की बातों में पैसा खर्च करने से अच्छा यह है कि लोग वही पैसा किसी की मदद करने और दूसरे अच्छे कामों में लगाएं।

पल्लवि सक्सेना
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