girls do not want to carry the burden of socialization now - दुनिया मेरे आगेः डर के आगे जीत - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः डर के आगे जीत

लड़कियों के साथ आए दिन छेड़खानी और बलात्कार जैसी घटनाओं से परिवार भी डरा हुआ होता है। लेकिन परिवार अपनी बेटी को यह हिम्मत नहीं देता कि लड़ना सीखो।

Author August 8, 2018 3:19 AM
अब कोई कुछ नहीं कहे तो भी लड़कियां पुरानी नियमावली को पीछे छोड़ कर आगे निकलने लगी हैं। अब उन्हें इसकी परवाह नहीं है कि उन पर किस-किस तरह के ठप्पे लगाए जाएंगे।

आरती मंगल

इस समाज में लड़की होने का मतलब है कि आप पर सबकी इज्जत को ढोने का बोझ आपकी जानकारी के बिना लाद दिया जाता है। अपने सहित परिवार, बिरादरी, देश और अगर एलियन मिल गए तो इस पृथ्वी का भी। यह बोझ एक ऐसे दानव की तरह होता है जो लड़कियों के सपने, उनकी इच्छाएं, हंसी सबको निगल जाता है। निस्संदेह यह बोझ पुरुष अपने पाले में नहीं लेना चाहेंगे, इसीलिए जब भी लड़कियां इस बोझ से मुक्त होने की कोशिश करती हैं, तब उन्हें इज्जत का हवाला देकर अपमानित किया जाता है। अगर वे तब भी न मानें तो उनके लिए तरह-तरह की सजाएं सुनिश्चित की जाती हैं। जैसे कि उन्हें घर से निकाल देना, उनसे कोई संबंध नहीं रखना, उनकी मार-पिटाई, बलात्कार और हत्या आदि।

अक्सर लड़कियां कब खुद इस बोझ की पैरोकार बन जाती हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता। यह समाजीकरण है ही ऐसी चीज। लेकिन एक सीमा के बाद समाजीकरण की आड़ लेकर अपनी सोच और कृत्यों का बचाव करना वैसा ही है, जैसा किसी को धक्का देकर कीचड़ में उतार देना और यह कहना कि ऐसा ही सिखाया गया है बचपन से। समाजीकरण एक तरह से सोचने का ढर्रा प्रदान करता है। लेकिन बौद्धिक विकास होने के बाद व्यक्ति अपनी सोचने की क्षमता को पूर्ण रूप से निर्धारित नहीं करता। अगर करता होता तो फिर दिमाग की कोई क्षमता ही नहीं होती, न इतने आविष्कार और सामाजिक बदलाव हुए होते। पुरुषों को भी इस समाजीकरण की वजह से बहुत से नुकसान होते हैं। लेकिन समाजीकरण के चलते महिलाओं पर बहुत तरह के अत्याचार होते हैं, जिनसे उनकी स्थिति समाज में बदतर बनी रहती है।

यों समाजीकरण बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है, लेकिन इसके चलते लड़की पर प्रत्यक्ष रूप से बंधन उसके किशोरावस्था में पहुंचने के साथ लगने लगते हैं। इस अवस्था में आने के साथ-साथ लड़कियों को उनके आचरण को लेकर एक नियमावली सौंपी जाती है। जाने-माने मनोविश्लेषक सुधीर कक्कड़ का कहना है कि लड़कियां इस तरह की नियमावली का पालन ईनाम और दंड के बल पर करती हैं। इसके साथ-साथ घर के भीतरी और बाहरी परिवेश में कुछ वैसी लड़कियों और औरतों को प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो इन तय मापदंडों पर खरी उतरी हों। मसलन, कोई रिश्तेदार, धर्म ग्रंथ का कोई चरित्र, कोई टीवी कार्यक्रम या फिल्म आदि। यह सब ग्रहण करते-करते लड़कियां खुद को, अपने शरीर और अपने व्यक्तित्व को लेकर इतनी असहज हो जाती हैं कि वे बहुत जल्दी अपराधबोध से ग्रसित हो जाती हैं। उन्हें हर वक्त यही डर रहता है कि कहीं कोई चूक न हो जाए और वे अपने परिवार की दोषी न बन जाएं।

यह डर होता है वैसा न बन पाने का, जैसा उन्हें सिखाया गया है। और इसी डर की आहुति उनका जीवन, उनकी इच्छाएं और सपने चढ़ते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे व्यवसाय में मत जाओ, जिसमें घर से बाहर बहुत ज्यादा रहना पड़े, जो तुम्हारी सुंदरता को बिगाड़ दे, जिसमें लड़के बहुत ज्यादा हों, जिसकी कुछ नियमित समय-सारणी न हो। इसके अलावा उन्हें कहा जाता है कि बाहर भले ही काम करो, लेकिन घर को तो तुम्हें ही देखना है, कैसी मां हो जो बच्चे को इतनी देर के लिए छोड़ के चली जाती हो… देखो उस औरत को, अपने घर की परवाह नहीं, बस घूमती रहती है और पार्टी करती है वगैरह। इसके गंभीर आर्थिक नुकसान होते हैं, जिनका लड़कियों की सामाजिक स्थिति पर भी प्रभाव पड़ता है। यों ये सब डर और ताने मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग में ज्यादा होते हैं। मजदूर वर्ग की औरतों के पास विकल्प नहीं होते और जहां तक इज्जत का सवाल है, यह किसी से छिपा नहीं है कि एक इंसान के तौर पर उनकी इज्जत नहीं की जाती।

लड़कियों के साथ आए दिन छेड़खानी और बलात्कार जैसी घटनाओं से परिवार भी डरा हुआ होता है। लेकिन परिवार अपनी बेटी को यह हिम्मत नहीं देता कि लड़ना सीखो। परिवार यह नहीं कहता कि अगर तुम्हारे खिलाफ कोई अपराध हुआ या कुछ अनहोनी हुई तो उसका तुम्हारी हमारी इज्जत से कोई लेना-देना नहीं, हम तुम्हारे साथ खड़े हैं। एक कहानी में पढ़ा था कि एक विदेशी महिला अपनी घुमक्कड़ बेटी को बेफिक्र घूमने के लिए हौसला बढ़ाती है, अपने खिलाफ अप्रिय स्थिति या अपराध होने पर बिना संकोच के उससे निकलने के तरीके बताती है। लेकिन क्या हमारे यहां माता या पिता ने बेटी से कभी इतना भी कहा होगा कि तुम घूमो और किसी से डरना नहीं? तुम लड़की हो, सिर्फ इस वजह से तुम्हें अपनी इच्छाओं को त्यागना नहीं पड़ेगा? या फिर राज्य या समाज के लोग ही कहें कि हमारी व्यवस्था में लड़कियां सुरक्षित हैं?

बहरहाल, अब कोई कुछ नहीं कहे तो भी लड़कियां पुरानी नियमावली को पीछे छोड़ कर आगे निकलने लगी हैं। अब उन्हें इसकी परवाह नहीं है कि उन पर किस-किस तरह के ठप्पे लगाए जाएंगे। ये लड़कियां अभी कम हैं, लेकिन हैं। डर खत्म नहीं हुआ है, लेकिन मजबूत हौसले के साथ सफर में हर अगला कदम डर को खत्म करता है।

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