उपहार का आवरण

इस साल उत्सवों का यह मौसम फिलहाल पूरा हो गया माना जा रहा है, लेकिन इसकी प्रक्रिया की स्मृतियां साल भर बनी रहेंगी। त्योहारी मौसम में आमतौर पर उपहारों का आदान-प्रदान होता है।

सांकेतिक फोटो।

प्रभात कुमार

इस साल उत्सवों का यह मौसम फिलहाल पूरा हो गया माना जा रहा है, लेकिन इसकी प्रक्रिया की स्मृतियां साल भर बनी रहेंगी। त्योहारी मौसम में आमतौर पर उपहारों का आदान-प्रदान होता है। किसी को भी दिए जाने वाले उपहार का चुनाव सांसारिक या सामाजिक परंपरा के आधार पर कम, आपसी संबंधों और खासतौर पर व्यावसायिक संबंधों के मद्देनजर किया जाता है। यह बात दीगर है कि अगर सोने की अंगूठी भी दे दी जाए तो उसके डिजाइन के बारे में कह दिया जा सकता है कि ‘यह सादा-सा ही है’। अंगूठी का वजन भी हल्का लग सकता है। अंगूठी ढीली या टाइट तो रहेगी ही, नग भी नकली, बड़ा या छोटा माना जा सकता है।

ऐसा कहा जाता है कि किसी को भी उपहार दिया जाए तो वह उसके लिए उपयोगी और उपयुक्त होना चाहिए । विवाह में दिए जाने वाले उपहार के संदर्भ में कुछ लोग पहले पूछ लेते हैं। त्योहारों के दिनों में आमतौर पर मिठाई देने का प्रचलन रहा है, लेकिन अब क्योंकि लोग सेहत के प्रति जागरूक होते जा रहे हैं, आम दुकानों पर वांछित सफाई और गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता, इसलिए ऐसी मिठाई कम दी जा रही है।

कुछ दुकानों ने अभी भी अपनी गुणवत्ता की परंपरा को बरकरार रखा है। इधर ब्रांडेड मिठाई, मेवों, बेकरी का चलन बढ़ा है। पारंपरिक मिठाई में अब सोन पापड़ी यानी बतीसा उपहार में इतनी दी जाती है कि इसका डिब्बा खोला भी नहीं जाता, खाना तो दूर की बात। यह यहां से वहां की यात्राएं बहुत करती है। घर में आया डिब्बा न जाने किसका किसके यहां पहुंच जाता है। कई बार किसी और को अपना दिया हुआ डिब्बा कई गलियां और रास्ते तय कर अपने ही घर लौट आता है।

मिठाई के साथ कुछ उपहार देने की रिवायत भी चली आ रही है। बहुत लोग मानते हैं कि मिठाई के डिब्बे के साथ दिया जाने वाला कुछ भी ज्यादा मायने और महत्त्व रखता है। यह भी स्वीकृत सच है कि यह ‘कुछ’ बड़े से बड़े काम करवाने की हैसियत रखता था और आज भी रखता है। हां, उसका रूप जरूर बदल गया है। यों भी हमारे देश में सांस्कृतिक बदलाव इतनी जल्दी नहीं आते।

मिठाई के साथ आने वाले उपहार के मामले में कुछ घरों से आया बंद डिब्बा खोल कर देखा जाता है। पसंद न आने पर उसे तुरंत अपने घर से किसी और घर के लिए विदा कर दिया जाता है। कई बार वरिष्ठ जनों को ऐसा उपहार दे दिया जाता है जो उनके लिए उपयुक्त नहीं होता। जिस व्यक्ति या संस्था के साथ व्यावसायिक रिश्ते सुफल बना कर रखने होते हैं, उन्हें सोच-विचार कर बढ़िया और प्रभाव उगाऊ उपहार भेजे जाते हैं। सरकारें और कंपनियां ऐसा ही करती हैं। आम लोगों द्वारा अदला-बदली किए जाने वाले उपहारों की उनके सामने क्या बिसात!

कई बार लोग पुराना या बड़े आकार का उपहार भी दे देते हैं जो खुद के लिए अवांछित हो। वे यह भी जानते और समझते हैं कि जिन्हें उपहार दे रहे हैं, उनके लिए भी उपयोगी नहीं है। फिर भी दे देते हैं। यह भी देखा गया है कि मिठाई के साथ कुछ लोग खुले मन से अपने संबंधियों और परिचितों को बढ़िया उपयोगी चीजें, उपकरण या रसोई के बर्तन आदि देते हैं और दूसरा पक्ष बिना विचारे उनके यहां कहीं से इस साल या कभी आया हुआ कुछ भी दे देते हैं। स्वाभाविक है, बेहतर उपहार देने वाले को अच्छा नहीं लगता, तब यह विचार पनपने लगता है कि सिर्फ खाने-पीने की वस्तु ही उपहार स्वरूप दी जाए।

उपहार के मौसम में पैकिंग की भूमिका काफी सक्रिय रहती है। अब पैकिंग सामान के आकार से बड़ी और आकर्षक होती है। यह जानना दिलचस्प है कि चाकलेट बेचने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी अपने एक आकर्षक और जानदार पैक में दो सौ तैंतीस ग्राम चाकलेट तीन सौ पचास रुपए में बेचती है। यानी एक ग्राम चाकलेट चखना हो तो एक रुपया पचास पैसे भुगतान करिए। पैकिंग ज्यादा लाजवाब और जगह खास हो तो वही चाकलेट और महंगी होती जाती है। कई बार मिठाई बढ़िया नहीं होती, मगर चमकते कागज में पैक होती है। उसकी छवि बदलने के लिए पैकिंग दोबारा कर दी जाती है। कुछ लोगों की छवि ऐसी होती है कि अंदाजा लग जाता है कि बाहर से पैकिंग चाहे सामान्य हो, अंदर बढ़िया चीज होगी।

संयुक्त दीवार या पारिवारिक जिंदगी के किसी और मसले पर रोज का झगड़ा होता है, मगर खुशियों के दीप रोशन करवाने वाले त्योहार की शुभकामनाओं के दिखावे के लिए मिठाई के सामान्य डिब्बे भेज दिए जाते हैं और उन्हें झूठी व्यंग्यात्मक मुस्कराहट के साथ बिना धन्यवाद किए लिया या दिया जाता है। उपहार में बहुत कुछ चलता है। दरअसल, उपहारों के लेनदेन में विश्वास रखने वाले हममें से ज्यादातर लोग इस बारे सब जानते-समझते हैं और सब यही करते हैं, मगर सब मानते हैं कि उनका तोहफा और उसका डिब्बा सबसे बढ़िया है।

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