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दुनिया मेरे आगे: समग्र विकास के वाहक

दरअसल, विकास का आधुनिक मॉडल मनुष्य और प्रकृति, दोनों के शोषण पर आश्रित है। विकास आज विनाश की अवधारणा में तब्दील हो चुका है। गांधी अपने समय में भी विकास की इन आधुनिक नीतियों से वाकिफ थे, इसीलिए उन्होंने ‘मास प्रोडक्शन’ के स्थान पर ‘मासेज प्रोडक्शन’ द्वारा विकास की बात कही और ग्रामीण जीवन और स्वरोजगार को अधिक महत्त्व दिया, जिस पर आज पूरे विश्व में चर्चा और बहस हो रही है।

सेवाग्राम आश्रम के निकट गिरे पड़े कटे हुए पेड़। विकास के नाम पर कुछ दिन पहले प्रशासन ने इन्हें कटवा दिया था।

भावना मासीवाल

अपनी सालाना जयंती से इतर महात्मा गांधी एक व्यक्ति से अधिक विचार के रूप में हमारे बीच उपस्थित हैं। यह वर्ष उनकी एक सौ इक्यावनवीं जयंती के रूप में मनाया जा रहा है, जिसके तहत गांधीजी पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श हो रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद गांधी और उनके विचार आज भी हमारे व्यवहार का हिस्सा नहीं बन सके हैं। गांधी ने मनुष्य को अपने उपभोग के नियमन और इच्छाओं के नियंत्रण का संदेश दिया, मगर मनुष्य अपने उपभोग की लालसाओं का बढ़ाता चला गया और प्रकृति का दोहन करने लगा। उसकी विकास की सुविधाभोगी नीतियों ने प्रकृति और मनुष्य के मध्य के सामंजस्य को खंडित कर दिया।

गांधीजी ने कहा था- ‘मुझे अपने देशवासियों की पीड़ा से भी ज्यादा चिंता मानव प्रकृति के बर्बरीकरण को रोकने की है।’ लेकिन उनके यह विचार आज केवल बहसों और विमर्श का हिस्सा बन कर रह गए हैं। आज गांधी की कर्मभूमि सेवाग्राम आश्रम जो उनके आजादी के आंदोलन का केंद्र था, जिसके प्रकृतिजन्य वातावरण से प्रभावित होकर उन्होंने साबरमती आश्रम से वर्धा आकर रहने का निर्णय लिया था, प्रकृति की यह गोद आज भी वर्धा में सेवाग्राम आश्रम को सबसे अलग बनाती है।

कुछ समय पहले उसी आश्रम की ओर जाने वाली सड़कों पर लगे वृक्षों को सेवाग्राम आश्रम के विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर काट दिया गया। यानी गांधी आजीवन विकास की जिन नीतियों का विरोध करते रहे और प्रकृति को बचाने के लिए मनुष्य को उसके साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने का मंत्र देते रहे, आज उन्हीं के अनुयायी उन्हीं के नाम पर पेड़ों को काट रहे हैं।

इस संबंध में महात्मा गांधी के पोते अरुण गांधी ने बताया कि ‘ये पेड़ खुद महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ने लगाए थे। वे जब सेवाग्राम आश्रम आए थे तो यहां की जमीन बिल्कुल बंजर थी। बापू और बा ने मिल कर अपना जीवन इन पेड़ों को दिया। इसीलिए इन वृक्षों का पर्यटन के हिसाब से भी अपना महत्त्व है’।

दरअसल, विकास का आधुनिक मॉडल मनुष्य और प्रकृति, दोनों के शोषण पर आश्रित है। विकास आज विनाश की अवधारणा में तब्दील हो चुका है। गांधी अपने समय में भी विकास की इन आधुनिक नीतियों से वाकिफ थे, इसीलिए उन्होंने ‘मास प्रोडक्शन’ के स्थान पर ‘मासेज प्रोडक्शन’ द्वारा विकास की बात कही और ग्रामीण जीवन और स्वरोजगार को अधिक महत्त्व दिया, जिस पर आज पूरे विश्व में चर्चा और बहस हो रही है।

गांधी के विचारों से विकास केवल उद्योगों को स्थापित करने और बड़े-बड़े औद्योगिक संयंत्र लगाने, अधिक से अधिक परियोजनाओं को लागू करने से संभव नहीं था, उनकी विकास योजनाओं में शहरों का निर्माण और विकास भर नहीं था, न ही भौतिक समृद्धि मात्र थी, उनके विकास की योजनाओं में गांव भी सम्मिलित थे और पर्यावरण का सहयोग अनिवार्य था। आज इसे ‘सस्टेनेबल डेवलेपमेंट’ यानी टिकाऊ विकास के अंतर्गत पढ़ा और पढ़ाया जाता है, क्योंकि पूरा विश्व ही पर्यावरण में आ रहे बदलाव के कारण चिंतित है।

महात्मा गांधी विकास और पर्यावरण पर अपने समय में ही दोनों को साथ लेकर चलने की बात कर रहे थे। उनके लिए विकास केवल एक ढांचा भर नहीं था, बल्कि उसमें मनुष्य का भी विकास था। उन्हें अपने समय के औद्योगिक विकास और आधुनिक सभ्यता की इन आधुनिक और नवीन तकनीकों का अंदेशा रहा होगा, तभी उन्होंने गांवों को महत्त्व देते हुए स्थानीयता की बात कही, क्योंकि पूंजीवाद ने सबसे पहले यूरोप और फिर उपनिवेशों में गांवों को तबाह किया।

उसकी सभी आर्थिक नीतियां शहरीकरण और औद्योगिक विकास या कहें कि ‘पूंजी’ को केंद्र में रख कर बनाई गई थी, जिसने बेरोजगारी और शक्ति के केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया था। आज भारत विश्व में युवाओं और उनकी श्रम शक्ति का सबसे बड़ा देश है, लेकिन आज के युवाओं की श्रम शक्ति का दोहन हो रहा है। बढ़ती बेरोजगारी और स्थानीय स्तर पर ससम्मान रोजगार के अभाव ने युवाओं के पलायन को बढ़ाया और उन्हें भी सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया।

अपने समय में भी गांधीजी समझ रहे थे कि शहर केंद्रित आधुनिक सभ्यता गांवों को उखाड़ कर ही आगे बढ़ सकती है। इसीलिए वे गांवों पर विशेष ध्यान देने की बात कर रहे थे। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन स्थानीयता की नीति के अभाव से उपजा है। वर्तमान समय में बुनियादी सुविधाओं और रोजगार का अभाव पलायन का मुख्य कारण बन कर उभरा है।

शिक्षित युवा गांवों की उपेक्षा, रोजगार का अभाव और महानगरीय चकचौंध के कारण गांव छोड़ रहा है और गांव का पुरानी पीढ़ी का किसान या तो आत्महत्या कर रहा है या मजदूर बन रहा है। खेत बंजर भूमि में तब्दील हो रहे हैं। अन्नदाता किसान आज अन्न के लिए तरस रहा है और सड़कों पर अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए आंदोलन कर रहा है। दूसरी ओर व्यापारी उसी के श्रम बल पर पूंजी का उपभोग कर विकास का कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

ऐसे में जब हम वर्तमान को देखते हैं तो गांधी के विचार हमें मौजूदा स्थितियों से बाहर आने का का रास्ता देते हैं, उनके विचार अपने समय, काल और परिवेश में भी उतने उपयोगी थे, जितने आज हैं। आज भी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर गांधी अपने विचारों के साथ अधिक मजबूत दिखाई देते हैं।

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