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भेदभाव का पाठ

नब्बे साल की बुजुर्ग महिला ने कहा- ‘मैं अगला जन्म लूंगी तो ये मोटी-मोटी बड़ी किताबें पढूंगी।’ उनके मन की कसक मुझे कहीं अंदर तक कचोट गई।

symbolicसांकेतिक फोटो।

मेरे इस प्रश्न के उत्तर में कि ‘आपके समय में क्या स्कूल नहीं थे? आप पढ़ने क्यों नहीं गर्इं,’ जो उत्तर मुझे मिला, वह झकझोरने वाला था। उन्होंने बताया कि वे स्कूल गई थीं, बहुत ही थोड़े समय के लिए और उन्होंने वर्णमाला की पुस्तक में यहां तक पढ़ा था- ‘चल अब घर चल।’ उसके बाद? उन्होंने बताया- ‘फिर परिवार और बिरादरी के बड़े-बूढों ने एतराज किया कि हमारे परिवार की लड़कियां न जाने किन जाति की लड़कियों के साथ पढ़ेंगीं।

इस वजह से उनकी शादी नहीं होगी। फिर पढ़ जाएंगी तो चिट्ठी लिख कर पतियों को शिकायतें करेंगी और घर तुड़वाएंगी।’ समाज की रूढ़िवादी सोच स्त्रियों की जागरूकता को लेकर आशंका से जुड़ी रही है। भारत में स्त्री शिक्षा का प्रश्न निरंतर विचित्र प्रकार के भयों, मिथकों और आशंकाओं से व्याप्त रहा। प्रारंभ में अगर पढ़ने से घर तुड़वाने, विधवा होने जैसी आशंकाएं थीं तो बाद में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के बाद लड़कियों को केवल और उतना ही पढ़ाया जाता था, जिससे उन्हें अच्छा वर मिल सके। आज भी देखा जा सकता है कि बहुत-सी लड़कियों के स्नातक के बाद शिक्षा ग्रहण करने का उद्देश्य उच्च शिक्षा लेना नहीं, बल्कि विवाह होने के इंतजार के बीच का समय गुजारना रहता है।

भारत में मिशनरियों और समाज सुधारकों से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक स्त्री शिक्षा का लक्ष्य और उद्देश्य बहस का विषय रहे। इसका कारण स्त्री और पुरुष के भिन्न परिभाषित रूढ़िवादी कार्यक्षेत्र थे। पढ़ने का उद्देश्य स्त्री के व्यक्तिगत विकास से अधिक उसे गृहिणी मां की भूमिका में दक्ष बनाना रहा। स्त्री की शिक्षा का उद्देश्य खुद को सुधारने से अधिक समाज सुधार माना गया।

शिक्षा के क्षेत्र में अक्सर कुछ सामान्यीकृत सहज प्रश्नों पर विचार किया जाता रहा। लड़कियों की शिक्षा पर जब भी बात की जाती है, सामान्य रूप से समाज और स्थितियों की ऊपरी सतहों को देखा जाता है। लेकिन क्या शिक्षा का क्षेत्र लड़कियों के लिए भी उतना ही सहज है जितना लड़कों के लिए? मसलन, घर, आस-पड़ोस या खेल का मैदान लड़कों के लिए जो मायने रखता है, लड़कियों के लिए वही मायने नहीं रखता, क्योंकि समाज में जो लिंगभेद व्याप्त है, वह दोनों को दो अलग तरह के अनुभव देता है। मसलन सड़क पर चलती एक लड़की का अनुभव वह नहीं होता जो एक लड़के के लिए होता है। यही बात शिक्षा के साधन और साध्य की भी है, जो ऊपरी तौर पर एक लगते हुए भी सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से दोनों के लिए भिन्न है।

स्त्री शिक्षा के प्रश्न से जूझते हिंदी साहित्य के कई शुरुआती उपन्यास बताते हैं कि स्त्री शिक्षा को लेकर समाज में यही सोच बरकरार थी कि लड़कियों को केवल घर सुधारने के लिए ही पढ़ना चाहिए। जैनेंद्र की कहानी ‘पढ़ाई’ इस समस्या को मनोवैज्ञानिक ढंग से सामने रखती है। यह स्त्री और पुरुष के बीच समाज में पनपने वाले गहन विभेद की ओर इशारा करती है। कहानी में छह बरस की नूनी यानी सुलोचना को लेकर उसकी मां बहुत परेशान रहती है, क्योंकि वह पढ़ने से अधिक खेलकूद में दिलचस्पी लेती है। मां नितांत सांसारिक ढंग से सोचती है कि लड़की पढ़ जाए, ताकि उसका विवाह अच्छी जगह हो जाए।

नन्हीं बच्ची की पढ़ाई यहां केवल पढ़ाई नहीं है, बल्कि पूरे समाज, समाज के बीच स्त्री की स्थिति और लड़कियों के लिए बचपन की उस अवधारणा का निषेध है, जहां बेफिक्री को बचपन का पर्याय माना गया है। कहानी की शुरुआत में ही बच्ची के लिए कहा जाता है- ‘वह छह बरस से भी ऊपर की हो गई है। अब पुराना वह सब-कुछ नहीं निभ सकेगा।

उमर आ गई है कि अब अदब सीखे, कहना माने और शऊर से रहे। और, वह शऊर जानती नहीं’। छह बरस की नूनी का यह कह कर विश्लेषण किया जाना कि ‘उमर आ गई है’ या उसे ‘शऊर सिखाने’ की बात करना समाज की उस सोच की तरफ इशारा करती है जहां लड़कियों से असमय ही प्रौढ़ व्यवहार की मांग की जाने लगती है। नूनी के नन्हें से जीवन में पढ़ाई एक प्रतीक भूमि है जिसके द्वारा उसे पारंपरिक संस्कारों में ढाला जा रहा है।

शिक्षा सिद्धांतों के अनुसार बच्चे समाज में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और वयस्कों से अंत:क्रिया करते हुए खुद ही ज्ञान का सृजन करते हैं। लेकिन इस अंत:क्रिया द्वारा अर्जित इस ज्ञान का सृजन उन्हें और भी बहुत कुछ सिखाता है। खासकर लड़के और लड़की का विभेद इसी दौरान पनपने लगता है। समाज में यह समस्या इस कदर व्याप्त है कि हाल ही में महामारी के दौरान आॅनलाइन कक्षाओं में भी यह देखने को मिला।

अगर घर में कक्षा लेने के लिए एक ही उपकरण है और भाई-बहन दोनों पढ़ने वाले हैं तो भाई को अधिक वरीयता दी गई। लिंग भेद से पढ़ाई का साध्य भी किस तरह बदल जाता है, इसे देखा जा सकता है। भले ही अब कुछ पढ़े-लिखे घरों में स्थिति बदली है, लेकिन कमोबेश समस्या वहीं है, जहां काफी साल पहले थी।

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