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दुनिया मेरे आगेः किराए पर दोस्त

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी’। कुछ समय पहले एक खबर सुनी और इसके साथ ही आज के आदमी और उसकी तन्हाई का बयान करती निदा फाजली की गजल कानों में गूंजने लगी।

Author July 16, 2016 3:14 AM

‘चैतन्य कुमार

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी’। कुछ समय पहले एक खबर सुनी और इसके साथ ही आज के आदमी और उसकी तन्हाई का बयान करती निदा फाजली की गजल कानों में गूंजने लगी। 1990 के दशक तक जब हम यह सुनते थे कि पश्चिम में बेटे और मां-बाप को एक दूसरे से मिलने से पहले वक्त लेना पड़ता है, तो आश्चर्य होता था और अजीब भी लगता था। अब हमारे देश में भी ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं। अकेलेपन का दर्द बड़े-बुजुर्गों को भी है, युवाओं को भी। ‘मिड लाइफ क्राइसिस’ (अधेड़ उम्र से जुड़ी भावनात्मक दिक्कतें) तो सामान्य बात है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि अगर सही समय पर व्यक्त न हों तो पैंतालीस-पचास के आसपास किशोरावस्था की दबी हुई ख्वाहिशें फिर से जागने लगती हैं। यह भी संभव है कि बढ़ती उम्र में वे बिल्कुल ही अलग और विकृत रूप से व्यक्त होने लगें।
लेकिन जितना हम समझते हैं, अकेलापन उससे कहीं ज्यादा गहरा है।

पढ़ाई-लिखाई का तनाव, नौकरी की तलाश, साथ ही भावनात्मक क्लेशों का चौतरफा हमला, विवाह या नौकरी के बाद अक्सर परिवार का टूट जाना, नौकरी में आगे बढ़ने की महत्त्वाकांक्षा और फिर चीजें बटोरने की होड़ में शामिल होना- ये सभी मिल कर जीवन को तनावपूर्ण बना दे रहे हैं। लगातार बढ़ते तनाव का कारण और परिणाम दोनों ही है आपसी संबंधों में आत्मीयता का खत्म होना। संबंध समय, अवधान और स्नेहपूर्ण ऊर्जा की मांग करते हैं। संबंधों में आत्मीयता धीरे-धीरे गहराती है। समय तो अब किसी के पास है ही नहीं, और अवधान का दायरा और विस्तार दोनों सिकुड़ते जा रहे हैं। रिश्ते बनाना और उन्हें कायम रखना एक चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया पर गुमनाम रहते हुए, अपरिचित लोगों के साथ जिस आभासी आत्मीयता का अनुभव होता है, उसके झूठे स्वाद ने ही वास्तविक, गहरी, गुनगुनी आत्मीयता की जगह ले ली है।

दरअसल, एक वेबसाइट है ‘रेंटअफ्रेंड डॉट कॉम’। बड़े शहरों में किसी भी अकेले युवक और युवती या बुजुर्ग को दिन भर की थकान, चिक-चिक के बाद किसी के साथ शाम को बैठ कर कॉफी पीने और अपने सुख-दुख शेयर करने का दिल कर सकता है। ऐसे में इस वेबसाइट के जरिए अब ‘किराए’ पर किसी दोस्त को बुला कर उसके साथ किसी रेस्त्रां या पार्क में समय बिताया जा सकता है। यह संबंध कुछ घंटों के लिए ही होगा और सिर्फ भावनाएं साझा करने तक सीमित रहेगा। अगर यह स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ता है, तो यह दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करेगा। कुछ और वेबसाइट हैं, जो शुल्क लेकर लोगों को अपने ही शहर या इलाके के दोस्तों से मिलवाने का वादा करती हैं। कई लोगों को यह अजीबोगरीब तरीका लग सकता है, पर जरूरी नहीं कि इसमें हमेशा कोई अप्रिय घटना होने की ही संभावना हो। कुछ वेबसाइटों का कहना है कि वे सिर्फ प्लेटोनिक संबंधों और दोस्ती को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं। फेसबुक पर भी ऐसे कई पन्ने हैं जो ऐसे दोस्ताना रिश्तों को शुरू करने में मदद करते हैं। मित्र बनने या होने से ज्यादा जरूरी हो गया है, मित्र खोजना और पाना।

कहते हैं, मित्र पाने का सबसे आसान तरीका है कि आप खुद मित्र बन जाइए। पर इस तरह की बातों को अब ज्ञान बघारना कहा जाता है। मित्र बनाने की होड़-सी लगी हुई है। फेसबुक पर आप पांच हजारिया हो जाएं तो आपकी गर्दन सारस की तरह अकड़ जाती है। लेकिन यह सिर्फ एक आवरण है, जिसके पीछे बैठा व्यक्ति अपने अकेलेपन के साथ घुटता हुआ भी देखा जा सकता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अकेलापन एक मूलभूत भावना है, जो क्रोध, उदासी, अवसाद, व्यर्थता के भाव, खालीपन और निराशा को जन्म देती है। अकेले लोग अक्सर सोचते हैं कि उन्हें कोई पसंद नहीं करता। वे खुद के बारे में लगातार चिंतित रहते हैं और खुद को लोगों से दूर ही रखने लगते हैं। इस तरह की सभी आदतें और आचरण अकेलेपन के लिए और अधिक खाद-पानी का काम करते हैं।

बहरहाल, अब ऐसी एजेंसियां भी सामने आ रही हैं जो लोगों के अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था करती हैं। अलग-अलग संप्रदाय के लोगों के लिए तरह-तरह के पैकेज हैं। लंबे समय तक बाहर रहने वालों का भारत में अपने नाते रिश्तेदारों के साथ संपर्क टूट जाता है और ऐसे में हर छोटी-बड़ी चीज का बंदोबस्त करना उनके वश की बात नहीं रह जाती। ऐसी एजेंसी उनकी सहायता करती है। भविष्य में और लोग भी इससे मिलते-जुलते ‘व्यापार’ में उतर सकते हैं। अभी तो हमें इन खबरों को पढ़ कर थोड़ा अजीब लग सकता है, पर धीरे-धीरे अन्य बातों के साथ इनकी भी आदत पड़ जानी है। हो सकता है, मानवीय संबंधों की देख-रेख का समूचा काम विशेषज्ञ और पेशेवर एजेंसियां ही संभाल लें। लेकिन यह भी हो सकता है कि अकेलापन और उससे जुड़ा अवसाद भी साथ-साथ बढ़ता चला जाए।

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