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दुनिया मेरे आगे: दोस्त एक आईना

रिश्तों में सबसे अच्छा रिश्ता कौन-सा? पूछिए किसी से भी, वह कहेगा दोस्ती का। दोस्ती का ही क्यों? क्योंकि दोस्तों में किसी तरह की स्पर्धा नहीं होती, किसी तरह का मान-मनौवल नहीं होता।

Author Updated: February 12, 2021 5:38 AM
Realएक दोस्‍त ही दूसरे दोस्‍त की भावनाओं को समझ सकता है। फाइल फोटो।

स्वरांगी साने

मिल गए तो बैठ लिए, बैठ गए तो बात हो गई। नहीं मिले तो कोई बात नहीं। कोई बात नहीं, तब भी कोई शिकायत नहीं। लेकिन बाकी के तमाम रिश्तों में कई मापदंड होते हैं।

कुछ करने की जबर्दस्ती होती है। मतलब हर दिन फोन किया ही जाए या हर हफ्ते बात हो ही। या वार-त्योहार शुभकामनाएं दी जाएं… गमी में रोया जाए, खुशी में जताया जाए। दोस्ती में ऐसा कोई बंधन नहीं होता। निभ गया तो निभा लिया… न निभ सका तो भी ठीक। फिर कभी मुलाकात हो गई तो फिर बातों का दौर शुरू हो गया। लेकिन रिश्तेदारी में समाज, बिरादरी, कुनबा जुड़ा होता है। रिश्ते आपस में उलझे होते हैं। हर रिश्ते के साथ कुछ रस्मो-रिवाज और हिदायतें-नसीहतें होती हैं। इन रिश्तों को निभाना किसी दस्तूर की तरह होता है। दोस्तों में ऐसा नहीं होता। समाज को इससे कोई लेना-देना नहीं होता कि आपके असली दोस्त कौन हैं, नकली कौन।

असली दोस्ती और नकली दोस्ती की बात इसलिए कि कई बार निजी स्वार्थ या हित के लिए दोस्ती की जाती है। मतलब कोई किसी पद पर हो, किसी से कोई लाभ जुड़ा हो तो उससे मुंह देखे बात होती है। मतलब पूरा हुआ तो दोस्ती भी पूरी हो जाती है। तो क्या इसे दोस्ती मानेंगे? मानने वाले तो इसे भी दोस्ती मानते हैं। दोनों पक्षों को पता होता है कि यह जबरन की मुंहदिखाई है।

दोनों तटस्थता से गलबहियां मिलते हैं और काम निकल जाने पर ‘राम-राम’ बोल देते हैं। असली दोस्ती वह होती है जिसमें कहा जाता है कि भई गले नहीं लग सकते, तो हाथ भी क्यों मिलाते हो? इसमें कोई मान-सम्मान, अपमान नहीं होता, केवल अपनापन होता है। दोस्त मिलते हैं, जुदा होते हैं, फिर मिलते हैं, फिर जुदा होते हैं, लेकिन कोई तकरार नहीं होती। मीठी शिकायत हो सकती है, लेकिन किसी तरह का कसैलापन नहीं होता।

यह ऐसी मित्रता है, जो कभी किताबों से हुआ करती थी। किताबें या आज के युग में ज्ञान और सूचनाओं के बारे में कह सकते हैं कि उनके पास गए तो वे आपको कुछ जानकारी दे देंगी। अगर उनसे दो हाथ दूरी रखी तो वे आपको कोई जानकारी नहीं देंगी। इसी तरह दोस्तों के पास गए तो उनसे आपके जीवन में कुछ मूल्य जुड़ जाएंगे और नहीं गए तो वे कुछ नहीं कहेंगे।

जिस तरह आप इंटरनेट के सूचना जाल से अच्छी-बुरी दोनों तरह की जानकारी ले सकते हैं, वैसे ही अच्छे-बुरे दोस्त आपको अच्छी या बुरी राय, संगत और विवेचना देंगे। सोशल मीडिया के खुले मंच से आपको क्या हासिल करना है, इसका विवेक आपके पास होना चाहिए। वैसे ही अच्छे या बुरे दोस्तों को चुनने का विवेक होना चाहिए।

कोई रिश्ता उलझाव लिए हो तो उसे रिश्ते की हद में ही रहने दें, लेकिन जहां आपको लगता है कि आप खुल कर बात कर सकते हैं और आपके बारे में बिना किसी पूर्वाग्रह के आपकी बात को सुना जा सकेगा, तो हर उस रिश्ते को आप दोस्ती के दायरे में ला सकते हैं। वैसे देखा जाए तो दोस्ती का कोई दायरा, कोई परिसीमा नहीं होती। दोस्ती में अधिकार होता है और खुली आलोचना का अवसर भी यहां मिलता है।

कभी आपको लगे कि आप बहुत शानदार तरीके से तैयार हुए हैं और आपका पक्का दोस्त आपको बकवास कह देता है। आप उस पर यकीन करते हैं, क्योंकि वह पक्का दोस्त है। वह आपका मन रखने के लिए आपको अच्छा नहीं कह रहा। वह आपके भले के लिए जो सच है, वह आपको बता रहा है। दोस्त इस लिहाज से एक आईना है।

आप अगर बेतरतीब तरीके से आईने के सामने जाकर खड़े हो जाएंगे तो वह आपको बिना किसी दुराव-छिपाव के उसी रूप में दिखाएगा। अगर ऐसा आईना आपके पास है तो दुनिया में कभी आपकी आलोचना नहीं होगी, क्योंकि आपके आईने ने आपको पहले ही आपकी असलियत बता दी होगी और आप जब बाहर निकलेंगे तो अपने में सुधार कर बाहर निकलेंगे।

दोस्त वह आईना है, जिसने आपको जंचने का अवसर दिया और यह अपेक्षा भी नहीं की कि आप उसे धन्यवाद कहें। वैसे ही जैसे कोई आपको कहता है कि आज तो बड़े बन-ठन कर निकले हो, तो आप आईने को धन्यवाद नहीं देते कि आईने ने आपको दिखाया था कि कुछ देर पहले तक आप कैसे थे। दोस्त आपसे वह मेहनत करवाता है और उसके बदले में कुछ नहीं चाहता। आप जिस भी मिजाज में उसके सामने खड़े हो जाएं, वह आपको उसी मिजाज में मिलता है। रो देंगे तो आपकी रोनी सूरत दिखा देगा, हंस देंगे तो आपका हंसता हुआ चेहरा दिखा देगा। आप खुद को कैसे देखना चाहते हैं? हंसता हुआ न! तो दोस्तों से हंस कर मिलिए, क्योंकि उनके होने से ही आपका होना है। वे हैं, तभी आप, आप हैं।

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