भरोसे के पायदान

वर्षों से मनुष्य ने हथियारों की होड़ को भय की बुनियाद माना है।

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सांकेतिक फोटो।

मीनाक्षी सोलंकी

वर्षों से मनुष्य ने हथियारों की होड़ को भय की बुनियाद माना है। यों तो हथियार भय उत्पन्न करते हैं और इसी भय के कारण हम अधिक से अधिक संख्या में हथियार विकसित करते चले जा रहे हैं, लेकिन हथियारों का दोषी होना केवल हमारी-आपकी दृष्टि में है। अगर हम हथियारों की दृष्टि से देखें तो वे अपने मालिक की आज्ञा का पालन करने के लिए विवश हैं और वह मालिक यानी मनुष्य खुद ही मनुष्य के भय का मूल कारण है। अब मुखौटा चाहे कुछ भी लगा लें, लेकिन सच्चाई यही है कि लगभग हर मनुष्य एक दौड़ में शामिल होकर बस भागता जा रहा है। धन की दौड़, यश की दौड़, भूमि की दौड़, दूसरे को अपना गुलाम बनाने की दौड़…। अक्सर इस चक्रवाती दौड़ में मनुष्य का मनुष्य से टकराव भी होता रहा है।

ऐसे में वह एक नई दौड़ में शामिल हो जाता है- हथियारों की दौड़। अब हथियारों को सोचने, बोलने और निर्णय लेने की शक्ति कहां! वे क्या किसी को भ्रष्ट करेंगे! वे तो केवल मनुष्य के भीतर छिपे भ्रष्टाचार और बर्बरता को प्रकट कर देते हैं। मनुष्य खुद अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए तमाम हथकंडे तैयार करता है और हथियारों का दुरुपयोग करता चला जाता है। लेकिन इस भ्रष्ट बल के आधार पर करोड़ों लोगों पर कब्जा भी उसे तृप्ति नहीं दे पाती और न उसकी दौड़ कभी पूरी हो पाती। अंत में वह थक कर विफलता, एकाकीपन और यहां तक की मृत्यु की गोद में भी गिर जाता है।

अब एक दूसरे आयाम में देखें। हमारा देश पचहत्तरवां स्वतंत्रता दिवस मनाने की राह पर है। लेकिन यह स्वतंत्रता किस कीमत पर आई? जहां संघर्ष के किस्से-कहानियां अनेक वीरों के वीरतापूर्ण कार्यों से भरे पड़े हैं, वहीं पर्दे के पीछे, घर-गृहस्थी के कामों की देख-रेख करने वाली महिलाओं के संघर्ष और वीरतापूर्ण कार्यकलापों के प्रति सोचने की प्रक्रिया का अभाव ही रहा है। न उनके किस्से किताबों के पन्नों पर, न नाम स्मारकों पर। लेकिन आज भी कई घरों में पीढ़ियों से संरक्षित शस्त्र एक साक्ष्य के रूप में खड़े हैं। उन महिलाओं के साहस, गर्व और निस्वार्थ के चिह्न के रूप में देखे जाते हैं और संघर्ष की एक अत्यंत दुखदायी घटना बताते हैं।

जब आजादी की उत्सुकता समय के साथ महज एक सत्ता और शक्ति की दौड़ बन गई थी, आदमी से आदमी का यह टकराव विद्वेष और बिखराव का बीज बोता चला गया। जहां स्वतंत्रता नई उम्मीद और उमंग का प्रतीक बन कर आई, वहीं विभाजन अव्यवस्था और अशांति का। एक ओर हवाओं में ‘जय हिंद’ और ‘जय भारत’ के नारे गूंज रहे थे, तो दूसरी ओर लूट-पाट, धोखाधड़ी, खून-खराबा, अपहरण, उत्पीड़न और धार्मिक उन्माद का बाढ़ आ गया था। देखते ही देखते महिलाओं की हालत दयनीय हो चुकी थी। दंगाइयों ने चारों ओर भयावह माहौल पैदा कर रखा था और महिलाओं का शोषण गहन चिंता का विषय बन गया था।

बहरहाल, सीमा पार करना आवश्यक था। महिलाओं का कोठियों से निकलना अनिवार्य था। लेकिन घर के पुरुषों पर बोझ नहीं ताना जा सकता था। हर महिला के लिए अपनी जान की रक्षा करना खुद उसके ही हाथों में था। ऐसे में दो ही विकल्प थे। कई महिलाएं अपने साथ गोलियां लेकर चलीं कि अगर मार्ग पर कुछ हुआ तो वे उनका सेवन कर जीवन समाप्त कर लेंगी। वहीं कई ऐसी भी थीं जो अपने साथ पिस्तौल, चाकू, छुरी, तलवार और अन्य आत्मरक्षार्थ शस्त्र ले चलीं। उन्होंने दंगाइयों का सामना करने की हठ ठान ली थी। भय के बावजूद उनमें आत्मसाहस जागृत हो चुका था। वे पर्दे के पीछे की महिलाएं न होकर युद्ध स्थल की वीरांगनाएं बन चुकी थीं। कई अपने परिवार सहित सीमा पार करने में सक्षम रहीं, लेकिन कई कुछ नहीं कर पाईं और आदमी के भ्रष्ट मानस की लहरें उन्हें निगल गईं।

महिला और पुरुष सृष्टि की ऐसी दो रेखाएं हैं, जिनके आपसी सहयोग से ही एक राज्य का विकास और परिचालन होता है। लेकिन स्त्री का इतिहास यह बताता है कि वह हमेशा से शोषित रही है। दीर्घकाल से पुरुष की तनातनी का परिणाम उसी ने भोगा है। पुरुष-प्रधान समाज ने उसके स्वतंत्र अस्तित्व को दबा कर उसे महज एक भोग की वस्तु बना कर रख छोड़ा है। आज के समाज की भी यही देन है। स्त्री अपने घर की चारदिवारी में पराधीनता का अभिशाप भोगने के लिए विवश है। उसकी स्वतंत्रता में बाधा डालने वाला कोई कानून नहीं है। बस वह पुरुष के एकाधिकार में एक न खत्म होने वाली घुटन का शिकार है।

लेकिन हम यह न भूलें कि घुटन से अक्सर विद्रोह भी जन्म लेता है और स्त्री के विद्रोह का लंबा इतिहास रहा है। तो स्त्रियों को यह सोचने की जरूरत है कि उनकी स्वतंत्रता की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। उन्हें देर किए बिना हर तरह की हिंसा का प्रतिकार करना होगा। भरोसे को अपनी शक्ति और शिक्षा को अपना हथियार बना कर। शरीर और बुद्धि का साम्राज्य पर उसे अब खुद अपने भरोसे कब्जा करना होगा, अपने नए स्वरूप के साथ।

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