ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बुजुर्गों का कोना

बच्चों की छोटी-छोटी बीमारियों में दादी मां के नुस्खे ही काम आते हैं। इसीलिए बच्चों के लिए पहले तो दादा-दादी होते हैं, मम्मी-पापा बाद में।

बच्चों का सामना अपने दादा-दादी से होता है, तो वे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं।

महेश परिमल

कुछ महीने जब महामारी का संकट नहीं गहराया था, यह तब की बात है। कक्षा में जब शिक्षक ने पूछा कि कौन-कौन अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ रहता है, तो केवल एक छात्र ने हाथ उठाया। सभी अपने उस साथी को आश्चर्य से देखने लगे। जब उस छात्र से कहा गया कि दादा-दादी के साथ रहने का अनुभव सुनाए, तो बच्चे ने उनके साथ रहने के कई किस्से सुनाए। सभी खुश हो गए। जब छात्र अपनी सीट पर बैठा, तो उसके बगल में बैठने वाले एक साथी ने पूछा- ‘दादा जी कैसे होते हैं?’ उसने जवाब दिया- ‘दादा जी बिल्कुल पापा की तरह ही होते हैं, पर उनसे भी अच्छे होते हैं। मुझे बहुत प्यार करते हैं। हां, तब बुरा लगता है, जब वे पापा को भी कभी-कभी डांट देते हैं।’ यह सुन कर साथी को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि क्या पापा भी गलती करते हैं? उन्हें भी कोई डांट सकता है?

यह एक छोटा-सा किस्सा है हमारी सिमटती हुई जिंदगी का। पहले जिंदगी दोनों हाथों के दायरे से भी बड़ी हुआ करती थी। उसमें विस्तार था, जिसमें पूरा परिवार समा जाता था। एक ही घर में सारे रिश्ते-नाते जुड़े होते थे। धीरे-धीरे जिंदगी सिमटती गई। लोग सिकुड़ते गए। परिवार के सदस्यों की संख्या कम होने लगी। अधिकतम दो संतानों वाले परिवार बढ़ते चले गए। किसी-किसी घर में एक ही संतान होने लगी। इधर लोग कम होने लगे, उधर लोगों की जरूरतें बढ़ने लगीं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा टूटने लगी। सारे रिश्ते अंकल-आंटी तक सिमट गए। गांव से अगर बाबूजी अपने बेटे के पास कुछ दिनों के लिए आ गए, तो बेटे को बताना पड़ता है कि ‘रिश्तेदार’ आए हुए हैं। पिता को पिता कहने में शर्म आने लगी।

पर जब बच्चों का सामना अपने दादा-दादी से होता है, तो वे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं। उनका दुलारना बच्चों को खूब भाता है। जब अपने पोपले मुंह से वे बच्चों से प्यार से बातें करते, तो बच्चों को अच्छा लगता है। उनकी बातें भी बहुत प्यारी और भली होती हैं। वात्सल्य उनकी बातों में झलकता है। डांटना तो उनके शब्दकोश में होता ही नहीं था। बड़ी से बड़ी शरारतों के बाद भी उसे अनदेखा करते हुए कुछ ऐसा कहते कि बच्चों को अपनी शरारतों पर शर्म आती, जिसे बाद में वे न दोहराने का संकल्प ले लेते थे। दादा-दादी कुछ दिनों के लिए ही आते, तब बच्चों के दिन बहुत ही अच्छे से गुजरते। उनके जाने के बाद फिर वही उदासी। पापा-मां की नौकरी। दोनों शाम को थके-हारे लौटते, तब उनमें इतनी भी ऊर्जा नहीं होती कि बच्चों से प्यार से बातें करते हुए उनके साथ खेलें। बच्चों का समय भी अपने होमवर्क, ट्यूशन और कोचिंग में कट जाता।

इन हालात में वे बच्चे दूसरे बच्चों के लिए विशेष होते हैं, जो अपने दादा-दादी के साथ रहते हैं। इन बच्चों में एक अनदेखा अनुशासन होता है, जिसे वे अपने बुजुर्गों से अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। ये बच्चे पूरी कक्षा में कुछ अलग ही रुचियों के साथ सामने आते हैं। चूंकि इन बच्चों का काफी वक्त अपने बुजुर्गों के साथ गुजरता है, इसलिए कुछ बेबाक भी होते हैं। उनकी कई फरमाइश जो पिता पूरी नहीं करते, वे दादा-दादी से पूरी हो जाती है। ये बच्चे सभी के साथ रहते हुए कुछ विशेष बातों में अपना अलग ही प्रभाव छोड़ते हैं। इसलिए अपने दादा-दादी से वंचित बच्चे का यह पूछना स्वाभाविक है कि दादाजी कैसे होते हैं!

बच्चे द्वारा पूछे गए इस सवाल का जवाब बहुत कठिन इसलिए है कि यह सहजता से पूछा गया है। वास्तव में सरल होना ही बहुत कठिन काम है। आज अगर घर में दादा-दादी हैं, तो समझिए घर का हृदय धड़क रहा है। सभी की सांसों का स्पंदन बड़े-बुजुर्गों में समा जाता है। उनका होना ही घर को बहुत बड़ी राहत देता है। बच्चों के जन्म दिन पर बुजुर्ग ही सबसे बड़े सलाहकार होते हैं। किस बच्चे को क्या पसंद है, यह बच्चों की मां से ज्यादा दादी को पता होता है। बच्चों की छोटी-छोटी बीमारियों में दादी मां के नुस्खे ही काम आते हैं। इसीलिए बच्चों के लिए पहले तो दादा-दादी होते हैं, मम्मी-पापा बाद में। कई बच्चों के लिए उनके दादा-दादी या तो गांवों में हैं, या फिर तस्वीरों में। रही-सही कसर वृद्धाश्रमों ने निकाल दी है।

मगर अब यह सुन कर अच्छा लगा कि दो अनाथ युवक-युवती शादी के बाद वृद्धाश्रम जाकर वहां से अपने लिए माता-पिता ले आए। एक अच्छी परंपरा की शुरुआत हुई। इधर दो अनाथ, उधर दो बेसहारा, ये सभी मिल कर बने एक परिवार का हिस्सा। जहां सभी अपने बन जाते हैं, एक-दूसरे का सहारा। इन सभी के अपने छोटे-छोटे दुख, जो आगे जाकर सभी की खुशियों में तब्दील हो गए। बेसहारों को मिला सहारा। पराए बन गए अपने। बस गया छोटा-सा आशियाना। जहां खुशियां एक-दूसरे का इंतजार करती रहती हैं। इस एकाकी होते काल में हमने जान लिया कि क्या होता है घर में बुजुर्गों का होना। घर में बार-बार याद किया जाता रहा दादा-दादी, नाना-नानी को। कई बार उन सबकी कमी बेहद खली।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: गोधूली-सी उम्मीद
2 दुनिया मेरे आगे: समानता के सपने
3 दुनिया मेरे आगे: चुप्पी का शोर
यह पढ़ा क्या?
X