ध्वनियों की धमाचौकड़ी

हमारी सामूहिक चेतना के अंग बन चुके कई वाक्यों में से एक यह है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।

सांकेतिक फोटो।

हमारी सामूहिक चेतना के अंग बन चुके कई वाक्यों में से एक यह है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। दर्पण बहुत मुंहफट होता है, सारे भेद खोल देता है। लोग अपनी शक्ल के बजाय भले उससे नाराज होने लगें, दर्पण को कोई फर्क नहीं पड़ता। साहित्य की प्रवृत्ति भी ऐसी ही होती है। जिस समाज में फटी जींस, रूमाल से छोटा बन जाने की प्रतिस्पर्धा करते वस्त्र और उलटी तरफ घुमा कर पहनी हुई टोपियां आधुनिक वेशभूषा का प्रतिमान बन चुके हों, उसमें साहित्य शुतुरमुर्ग की तरह अपनी आंखें रेत के अंदर घुसा कर अप्रिय की अनदेखी नहीं करता। तुम डाल-डाल हम पात-पात वाली चाल चल कर वह भी बेतकल्लुफी की दौड़ में शामिल हो जाता है। साहित्य शब्दों का खेल ही तो है। तो फिर आधुनिकता की रेस में साहित्य नए-नए शब्दों के स्पाइक्स यानी कांटेदार स्पोर्ट शूज पहन कर भागने से क्यों एतराज करे।

भारतीय समाज को आधुनिकता का जामा पहनाने में बालीवुड हमेशा से सक्रिय रहा है। वेश-भूषा और केश विन्यास के नए फार्मूले ईजाद करने में वह लंबे समय से अग्रणी रहा है। फिर साहित्य में नए प्रयोगों से वह कैसे दूर रहता। अपनी पुरानी विरासत त्याग कर जब कहानी ने अकहानी बन कर और कविता ने अकविता बन कर हिंदी साहित्य में आने का उद्यम किया, तभी उर्दू गजलों और नज्मों से सजे फिल्मी गीतों ने भी अपना पुराना चोला उतार फेंकना शुरू कर दिया। मजरूह सुल्तानपुरी जैसे संवेदनशील गजलकार जो ‘हम हैं मता-ए-कूचाओ बाजार की तरह’ के अशआर लिखते आए थे, आधुनिक यथार्थ का दामन थाम कर पूछ बैठे ‘सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली, आर ए टी रैट, रैट माने चूहा, दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ?’ शायद ऐसे गीत लिखने के बाद ही वे पशचात्ताप करते हुए यह लिखने को मजबूर हो गए होंगे ‘मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफा का नाम, हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।’

गीतों में पहले शब्दों को नए संदर्भों से जोड़ने का काम हुआ, फिर बालीवुड के गीतकारों ने शब्दों को अपने प्रयोगों के सिलबट्टे पर खूब कूट-पीस कर ऐसे रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया कि उनका संदर्भ और अर्थ से कुछ लेना-देना ही न बचा। भावों के संप्रेषण को भुला कर शब्दों को गीत की पंक्तियों में केवल मात्राओं का वजन बराबर करने के लिए घुसाया जाने लगा। तभी ‘ऐ सनम, हम दोनों साथ रहेंगे जनम जनम’ कहने के पहले नायक नायिका को कहना पड़ा- ‘गापुची गापुची गम गम’। अब आप गापुची और गमगम का अर्थ ढूंढ़ने की कोशिश करें तो यह आपकी नादानी है। फिल्म संगीत में इस तरह के वजन डालने वाले गीतों की भरमार है।

1955 की फिल्म आजाद के एक बेहद लोकप्रिय नृत्यगीत में ‘अपलम चपलम चपलाई रे’ कहना जरूरी हो गया, क्योंकि अगली पंक्ति में ‘मैं तेरे लिए आई रे’ कहने के लिए कवि की कलम को पैर रखने की जगह चाहिए थी। सिनेमा के गीतों में जड़ जमा कर बैठे ऐसे प्रयोग अब खूब फल फूल रहे हैं। पचास साल पहले ‘ईना मीना डीका डाय डामा नीका’ जैसे शब्दों ने ट्विस्ट जैसे पाश्चात्य नृत्य में जान डाल दी थी। आज के नायक का दीवाना दिल तृप्त होने के बाद हरी घास खाकर अघाए हुए गर्दभराज की नकल में गाना शुरू करता है ‘ओले ओले ओले’। बालीवुड से एक कदम आगे भागने वाला पंजाबी पाप संगीत भी अपनी जरूरत के मुताबिक शब्दों और ध्वनियों के इस्तेमाल में सिद्धहस्त है। धुन अच्छी है, लय जानदार है, गीत के साथ थिरकने के लिए पैर मचल उठते हैं, तो फिर और क्या चाहिए। खामखा के सवाल उठा कर रंग में भंग डालने का जिसे शौक हो वह दलेर मेहदी प्रा जी से पूछे कि ‘तूतक तूतक तूतक तूतियां’ का क्या अर्थ है।

शास्त्रीय संगीत भी शब्दों की अपेक्षा स्वर, लय, ताल की सुविधा को ही अहमियत देता है। तराना गाने वाला कौन शास्त्रीय संगीतकार ‘दीम त दीम त दीम तना देरे ना’ का शाब्दिक अर्थ समझने के लिए ठिठकता है। गुरु शिष्य परंपरा में तराना सीख रहा शिष्य यह पूछ बैठे तो गुरु जी उसे अपने यहां कितने क्षण और टिकने देंगे?

गीतों में ध्वनि शब्दों पर हावी हो जाए तो गद्य कब तक अछूता रहेगा। किसी विज्ञापन में यह सुन कर कि कुछ खरीदने से आपकी लाइफ ‘जिंगालाला’ हो जाएगी, क्या कोई इस नई खोज को किसी शब्दकोश में ढूंढ़ता है? बारंबार सुन कर श्रोतागण स्वयं अपनी शब्दावली में जिन ध्वनियों को शब्द मान कर शामिल कर लें, उन्हें साहित्यिक गद्य कब तक दहलीज के बाहर प्रतीक्षारत रख सकता है। अब शब्दों को भाषाविज्ञानियों के निमंत्रण की जरूरत नहीं रही। धमाचौकड़ी मचाते हुए, हर रूप, हर वेषभूषा में, बोलचाल की गलियों से साहित्य के प्रासाद में दरवाजा तोड़ प्रवेश करना उन्हें आ गया है।

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