मृत्यु का उत्सव

अभी कुछ देर पहले बाजे-गाजे के साथ कुछ लोग घर के बाहर से गुजरे।

सांकेतिक फोटो।

गिरीश पंकज

अभी कुछ देर पहले बाजे-गाजे के साथ कुछ लोग घर के बाहर से गुजरे। उत्सुकतावश मैंने झांक कर देखा, शव-यात्रा जा रही थी। पता किया तो किसी ने बताया, एक बुजुर्ग की शव-यात्रा है। बाजे-गाजे के साथ शव-यात्रा निकलने का एक मतलब यह भी है कि हमने अगर जीवन को उत्सव की तरह ग्रहण किया, तो मृत्यु का भी उसी उत्साह के साथ स्वागत किया। सनातन परंपरा में तो यही मान्यता है कि केवल शरीर नष्ट होता है, आत्मा नहीं। और मृत्यु तो शाश्वत सत्य है। जो आया है, उसका जाना तय है।

सामने से गुजरने वाली अंतिम यात्रा को देख कर मुझे गरुड़ पुराण की याद आ गई। यह ग्रंथ मनुष्य को वैज्ञानिक दृष्टि देता है। उसे भावुक नहीं, विवेक संपन्न बनाता है। निराशा में आशा का संचार करता है। जीवन और मृत्यु के दर्शन को समझाने के लिए गरुड़ पुराण जैसा और कोई दूसरा ग्रंथ मुझे नजर नहीं आता। यह ग्रंथ हमें बताता है कि मनुष्य के पास अगर सत्संग और विवेक नामक दो नेत्र हैं, तो वह कभी कुमार्ग पर नहीं जाएगा। किसी की मृत्यु पर अधिक शोक नहीं करेगा और आत्मा की शांति के लिए जो निर्धारित कर्मों का पालन करेगा।

सामने ढोल-बाजे के साथ जब शव-यात्रा निकली, तो मेरे मित्र ने बाद में मुझसे मुलाकात की और कहा, ‘मेरी समझ में यह बात अब तक नहीं आई कि घर का बुजुर्ग मर गया और ये लोग खुशी मनाते हुए निकल गए। यह नैतिक दृष्टि से ठीक नहीं।’ मैंने कहा, ‘यही तो हमारा भारतीय दर्शन है, जिसे समझने की जरूरत है। गीता में इसी को स्थितप्रज्ञता भी कहा गया है; जहां हर्ष और शोक दोनों में हम समान स्थिति में रहें। मृत्यु को भी हम एक जीवंत उत्सव की तरह देखें और जो चला गया, उस पर शोक न करें।

शांत रह कर जो घटित हुआ है, उसको स्वीकार करें, क्योंकि सच बात तो यही है कि काया मरी है, आत्मा तो नए परिधान पहनेगी।’ मेरी बात को मित्र कुछ-कुछ समझा और सहमति में सिर हिला कर आगे बढ़ गया। मगर जब भी मिलता, इसी बात को लेकर बेचैन भी रहता कि कोरोना वायरस न जाने कितने लोग चल बसे। और अभी न जाने कितने लोग इसके शिकार होंगे।

मैंने उसे हर बार समझाने की कोशिश की कि जीवन और मृत्यु मनुष्य के हाथ में नहीं है। हमारे हाथ में सिर्फ अपना कर्म करना है, इसलिए मृत्यु की चिंता न करके हमें जीवन की चिंता करनी है। हमें यह सोचना होगा कि क्या सिर्फ भोग-विलास के लिए, केवल धन-संग्रह या केवल यशार्जन के लिए किसी के आगे-पीछे भागने की प्रक्रिया का नाम जीवन है? मेरे खयाल से यह जीवन की आधी-अधूरी परिभाषा होगी। सही परिभाषा तो यह है कि जीवन का एक-एक क्षण लोक-मंगल और लोक-परिमार्जन के लिए लग जाए। अगर हम लेखक हैं तो अच्छी रचना करें, जो समाज को दिशा दे सके।

अगर समाज सेवक हैं, तो ऐसे काम करें, जिससे दूसरों को प्रेरणा मिल सके। अगर धनपति हैं, तो अपने धन का निरंतर दान करके अपनी आत्मा को शुद्ध करते रहें। हम शिक्षक हैं तो ईमानदारी के साथ शिक्षकीय कर्म करें। यह नहीं कि पूरा वेतन आधा काम और उसके बाद कहें, रघुपति राघव राजा राम!

मित्र ने इस बार भी मेरी बात से सहमति जाहिर की, लेकिन चिंतित रहा कि ‘अभी तो हम मनुष्य योनि में हैं, मगर मरने के बाद पता नहीं किस योनि में जाएंगे?’ मैंने उसकी चिंता पर मुस्कुराते हुए कहा, ‘मृत्यु के बाद क्या होगा, हम किस योनि में जाएंगे या ब्रह्मांड में ही कहीं भटकते रहेंगे, इसकी चिंता बेमानी है। मृत्यु के बाद लोग हमें याद करेंगे या नहीं करेंगे, यह भी सोचना फिजूल है। हमें तो बस यही सोचना है कि जीवन को हम कैसे उपयोगी बनाएं। तो कल की चिंता छोड़ कर हमारे सामने जो आज है, उसको ही कैसे बेहतर ढंग से उपयोगी बना सकें, इस पर चर्चा करनी चाहिए।

जहां तक मृत्यु का सवाल है, वह कोरोना से भी हो सकती है। सड़क दुर्घटना से हो सकती है। किसी लंबी बीमारी से ग्रस्त होकर भी हो सकती है। अचानक हृदयाघात भी हो सकता है। मस्तिष्क की नसें फट सकती हैं। शरीर के अंदर अचानक ऐसा कुछ घटित हो जाए कि पल भर में ही प्राणांत हो सकता है। इसलिए मृत्यु का आनंद भाव से स्वागत करना ही श्रेयस्कर होगा। यही कारण है कि जब किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है, तो उसकी शव-यात्रा में लोग बाजे-गाजे के साथ निकलते हैं, ताकि दूसरों को भी यह संदेश दिया जा सके कि जीवन को पूर्णता में जीएं और इस संसार से जब भी जाएं, तो प्रसन्नता के साथ जाएं।’मित्र कुछ संतुष्ट होकर चला गया।

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