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बढ़ती उम्र का अहसास

बढ़ती उम्र का असर सभी पर होता है। फर्क इतना होता है कि किसी पर कम, किसी पर कुछ ज्यादा और किसी पर कुछ पहले तो किसी पर बाद में। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर कमजोर होता जाता है..

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बढ़ती उम्र का असर सभी पर होता है। फर्क इतना होता है कि किसी पर कम, किसी पर कुछ ज्यादा और किसी पर कुछ पहले तो किसी पर बाद में। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर कमजोर होता जाता है। चलने की गति धीमी होती जाती है और सभी कामों में पहले की अपेक्षा अधिक समय लगने लगता है। नजर भी कमजोर हो जाती है। इस मनोदशा को अंगरेजी के रोमांटिक कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी एक मशहूर कविता ‘टिंटर्न ऐबे में बाबूजी’ प्रस्तुत किया है। उनका मत है कि हर उम्र की अपनी खूबी और पहचान होती है। अगर जवानी दौड़-भाग से भरपूर होती है तो बुढ़ापा चिंतन-मनन और सोच-विचार का समय होता है, जिसमें हम जीवन का समग्र मूल्यांकन करने की स्थिति में होते हैं।

एक साहब थे जो बाद में आइएएस होकर रिटायर हुए। वे अपने विख्यात पिता को आदर्श मान कर हूबहू उन जैसा बनना चाहते थे और उन्होंने यह कोशिश तीस-पैंतीस साल की उम्र से ही शुरू कर दिया था। छड़ी लेकर चलना, पान सुपारी और तंबाकू का डिब्बा साथ रखना और धीमी गति से और कमर झुका कर चलना यह सब उनकी जीवन-शैली में ढल गया था। नतीजतन पचपन के होते-होते तो वे सत्तर साल के लगने लगे थे। आमतौर पर सत्तर साल तक पहुंचते लोग कहीं आने-जाने से परहेज करने लगते हैं और खुद को थका और चुका हुआ मानने लगते हैं। भले कम उम्र में वे सैलानी और लोगों से मिलने-जुलने के शौकीन रहे हों। इस उम्र में उन्हें लगने लगता है कि वे खुद अपने रोजमर्रा के काम कर लें, यही बहुत है।

कहा भी जाता है कि उम्र किसी को नहीं छोड़ती। यहां तक कि वे फिल्मी हीरो-हीरोइन और पहलवान, जो अपने आकर्षक शरीर और चेहरे-मोहरे के लिए ही जाने जाते थे, उम्र ढलने पर बीमार और दयनीय लगने लगते हैं। सारा मेकअप, खान-पान और पहनावा उन्हें चुस्त-दुरुस्त रख पाने में नाकाम रहता है। दूसरी ओर, एक साहब थे जो जिंदगी भर सूट-बूट में जीते रहे, लेकिन अस्सी पार होते ही उनकी सजने-धजने से अरुचि हो गई। वे बिस्तर पर जिन कपड़ों में लेटे रहते, उन्हें नहा-धोकर बदलते तो थे, पर घर से बाहर जाने वाले कपड़े पहनते ही नहीं थे। उनके पुत्र ने उन्हें रोज एक बार ‘ड्रेसअप’ होने और जूते-मोजे पहनने के लिए जैसे-तैसे राजी किया। दर्शनशास्त्र के एक प्राध्यापक नब्बे की उम्र में मोतियाबिंद का ऑपरेशन तक करवाने को तैयार नहीं थे और पूछते थे कि जो हो रहा है, क्या वह देखने लायक और जो लिखा जा रहा है, क्या वह पढ़ने लायक है! अधिक उम्र हो जाने पर ऐसे परस्पर विरोधी स्वभाव के अनेक उदाहरण हैं।

इसी तरह कम उम्र में बुजुर्गियत लाद देने वाले चिर बुजुर्ग भी कई हैं। हालांकि इस असामान्य स्थिति को अपवाद ही माना जाना चाहिए। परिवर्तन जीवन का नियम है। इसलिए बचपन के बाद जवानी और जवानी के बाद बुढ़ापा आना तो अवश्यंभावी है और इसे शालीनता और साहस के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। बुढ़ापे में कम दिखाई देना, दांत टूट जाना, छड़ी के सहारे चलना, चमड़ी मुरझा जाना और पहले की अपेक्षा शारीरिक रूप से कम सक्रिय होना, इन सभी को बुढ़ापे के शृंगार के रूप में स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी है।

यौवन बीत जाने का गिला-शिकवा करने के बजाय जरा बुढ़ापे की इस स्थिति पर भी गौर कीजिए कि अब सुकून से अतीत में गोते लगा कर आपने क्या किया और आप क्या नहीं कर पाए, उस सभी घटना-क्रम को एक फिल्म की तरह देख पा रहे हैं। मूल्यांकन की यह दृष्टि और व्याख्या करने की काबिलियत बढ़ी उम्र का ही नतीजा है। दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण लंबे अनुभव और भरपूर जीवन से ही मिलता है। युवावस्था में जब शारीरिक मुस्तैदी और दौड़-भाग ही आनंद का पर्याय था, तब सोचने-समझने का समय किसे था! भौतिक सौंदर्य और तात्कालिक लाभ के इर्द-गिर्द ही जीवन घूमता था। तब चमक-दमक के आर्कषण में यह तक खयाल नहीं रहता था कि इसके परे भी बहुत कुछ है।

जीवन को उसकी समग्रता में देखना उम्र के इस पड़ाव पर आ पाता है, जिसे बुढ़ापा कहा जाता है। केवल वर्तमान में जीना अगर स्वार्थी प्रवृत्ति है तो अतीतगामी होना रूमानी प्रवृत्ति। वर्तमान को अतीत से जोड़ कर आगे की ओर भी देख पाने में ही जीवन की सार्थकता है। इसलिए बुढ़ापे को सिर्फ बढ़ती उम्र के परिणाम के रूप में ही न देखें। उसका खुले दिल से स्वागत करें। हकीकत तो यही है कि चाहे आप असंतुष्ट होकर काटें या फिर संतुष्ट होकर उसका आनंद लें, बुढ़ापा एक शाश्वत सत्य है तो मुस्करा कर क्यों न जिए!

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