ताज़ा खबर
 

तरु की छाया में

कई संस्थाओं ने समारोहों में स्वागत-सम्मान के अवसर पर भेंट दिए जाने वाले फूलों के गुच्छे की जगह पौधे उपहार में देने की सुंदर नीति अपनाई है। इस देश के भूगोल, उसकी जलवायु और उसकी ग्रीष्म-ऋतु की मांग भी यही है कि उसके पौधों और वृक्षों की संख्या में बढ़ोतरी हो।

Author May 27, 2019 2:35 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

गरमी का मौसम आते ही तपती दोपहरियों में सभी किसी न किसी छाया की तलाश करते हैं- राही-बटोही, पशु-पक्षी, किसान-मयूर, रेहड़ी वाले। वे भी जो किसी साइकिल या मोटर साइकिल पर सवार हों और थोड़ी देर का विश्राम चाहते हों। जो एयरकंडीशन गाड़ी में सवार हों और किसी वजह से वाहन खराब हो जाए, वे भी चाहते हैं कि किसी तरु की छाया मिल जाए थोड़ी देर के लिए। अक्सर यह छाया-तलाश किसी तरु-छाया की ही होती है। पत्तों से आच्छादित किसी घने, छायादार पेड़ की।

यह दृश्य भी आम है कि किसी हाइवे में दिख जाने वाले गांव-कस्बे-छोटे शहर का, जहां खुद उस गांव-शहर-कस्बे के लोग, दुकानदार हमें चारपाइयां डाले किसी घने तरु के नीचे दोपहरी बिता रहे होते हैं। पास ही पानी का एक घड़ा रखा होता है, अपने लिए भी और किसी परिचित-अपरिचित की प्यास बुझाने के लिए। गरमी का मौसम ही वह मौसम है, जो देश-भर में कमोबेश हर जगह अपना रंग दिखाता है। सर्दियों में अधिक ठंड पड़ने वाली जगहों से कुछ लोग उत्तर से दक्षिण की ओर चले जाते हैं। लेकिन गरमी तो उत्तर से भी अधिक दक्षिण को गरमा देती है- आंध्र और तमिलनाडु को। सभी तपते हैं, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़। कुछ पहाड़ी जगहें जरूर ताप से बच जाती हैं। अब तो फिर भी यातायात के साधन बढ़े हैं और लोग बस, टेंपो, आॅटो-रिक्शा आदि से अपने गंतव्य तक जल्दी पहुंच जाते हैं, लेकिन एक जमाना था हमारे बचपन का जब पैदल या बैलगाड़ियों से दस-बीस मील की यात्रा भी लंबी हुआ करती थी। पर जाना तो कई जगह दस-बीस मील से भी अधिक बैलगाड़ियों से ही होता था। हम गरमी की छुट्टियों में कलकत्ता (अब कोलकता) से अपने गांव आते, पुरखों के गांव, उत्तर प्रदेश में और ननिहाल भी जाते जो हमारे गांव से कोई बीस किलोमीटर तो होगा ही। जाना बैलगाड़ी से होता था। वह रास्ता लंबा लगता। हम पानी पीने के लिए किसी कुएं के पास रुकते। किसी पेड़ की छाया में विश्राम करते। घने पेड़ों की छाया मिल जाती तो बैलगाड़ी वहीं खड़ी कर देते। बैलों को भी विश्राम मिलता।

पेड़ों की ओर ध्यान हम सबका यों भी जाता है, पर जब सघन छाया की तलाश हो, तब तो हम मानो उन्हें परखने भी लगते हैं। यानी यह नहीं, वह वाला। उसकी छाया अधिक घनी मालूम पड़ रही है… आदि। ‘तरु छाया’ की इस ‘माया’ और मनोहरता का कितना सुंदर चित्र खींचा है त्रिलोचन जी ने अपनी कविता ‘कठफोड़े ने मार मार कर’ में- ‘आने वाले ग्रीष्म दिवस तरु की छाया में बीतेंगे, हर खोज, वहां मेला उमड़ेगा, नर-नारी आबाल वृद्ध चल कर आएंगे हरियाली में आप, ठहर कर इस माया में रमे रहेंगे और सीस पर से उखड़ेगा चिंता का संसार, विहग दल में गाएंगे।’ यह कविता 1962 में लिखी गई थी। तब से अब तक बिहग-दल कम हुए हैं। पेड़ भी बहुत कटे हैं। हमारे तरु-सम्मान में कुछ कमी आई है। बहुमंजिला फ्लैटों की कतारें, शहरों से बाहर निकल कर पेड़ों की छाया को दूर और दूर करती गई हैं। लेकिन नहीं, लोग चेते भी हैं। वृक्षारोपण का सिलसिला कई जगहों पर बना है। पद्मश्री से सम्मानित हुई एक सौ सात साल की कन्नड़ की वृक्ष-माता थिमक्का के बारे में लोगों ने जाना है, जिन्होंने कोई आठ हजार पेड़ अकेले दम पर लगाए हैं।

कई संस्थाओं ने समारोहों में स्वागत-सम्मान के अवसर पर भेंट दिए जाने वाले फूलों के गुच्छे की जगह पौधे उपहार में देने की सुंदर नीति अपनाई है। इस देश के भूगोल, उसकी जलवायु और उसकी ग्रीष्म-ऋतु की मांग भी यही है कि उसके पौधों और वृक्षों की संख्या में बढ़ोतरी हो। कई तरह का ‘ताप’ झेल रहे किसानों को आज भी हर हालत में चाहिए तरु-छाया। खेतों के निकट… राह में…। त्रिलोचन जी ने ही एक सुंदर चित्र रचा है खेतिहर-किसानों, मजदूरों का तरु-छाया के प्रसंग से अपनी चर्चित कविता ‘मिल कर वे दोनों प्रानी दे रहे खेत में पानी’ में। यह बहुतों को बहुत प्रिय है। इसका अंतिम पद है- ‘विश्राम जरा करने को/ आराम जरा करने को/ नव कर्म-शक्ति भरने को/ आए हैं तरु-छाया में/ अपनी थकान हरने को/ मिल कर वे दोनों प्रानी/ दे रहे खेत में पानी।’ कल्पना की गई है, रचा भी गया है राहों को इस तरह कि उनके किनारे पेड़ हों और जरूरत पड़ने पर लोग उनकी छाया का लाभ उठा सकें। भला कौन नहीं चाहता अपनी किसी बस या ट्रेन यात्रा में या अपनी कार-बाइक-साइकिल यात्रा में कि यात्रा समाप्त होने तक दिखते रहें पेड़, खासकर ग्रीष्म ऋतु में। वे दूर से भी आंखों को ठंडक पहुंचाते। और न भूलें कि पशु ग्रीष्म में तरु-छाया को एक बड़ा आश्रय-स्थल मानते हैं। उसके नीचे बैठे-खड़े वे भी मानो असीस रहे होते हों तरु-छाया को। तो बनी रहे तरु छाया। मिले इस ग्रीष्म में उन सबको, कहीं न कहीं जब वे तलाश रहे हों उसे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X