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दुनिया मेरे आगे : ढलती सांझ का दुख

मेरी नजरें लगातार उन्हें ढूंढ़ रही थीं। अपनी बात रखते हुए अंत में मैंने सभी वृद्धों का अभिवादन किया। मेरी बातें शायद कुछ ज्यादा भावुक हो गई थीं, क्योंकि वहां बैठे लगभग सभी बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे।

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वहां अचानक उन पर मेरी नजर पड़ी और वे मुझे देखते ही सकपका गए। मैंने कहा- ‘अंकल आप यहां…!’ उन्होंने शायद मुझसे नजरें बचाने की कोशिश की। इसीलिए मुझसे बचते हुए वे वृद्धाश्रम के आंगन में ओझल हो गए। दरअसल, वहां मैं एक कार्यक्रम के सिलसिले में गई थी। थोड़ी देर बाद कार्यक्रम शुरू हो गया, लेकिन मेरी नजरें लगातार उन्हें ढूंढ़ रही थीं। अपनी बात रखते हुए अंत में मैंने सभी वृद्धों का अभिवादन किया। मेरी बातें शायद कुछ ज्यादा भावुक हो गई थीं, क्योंकि वहां बैठे लगभग सभी बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे। उनके दिलों के भाव उनके चेहरे पर साफ पढ़े जा सकते थे। कार्यक्रम के बाद मैंने खोजा तब वे अंकल मुझे मिले। मैंने उनके पांव छुए, उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरे हाथ पकड़ लिए। वे अभी बहुत खुश दिख रहे थे। मुझे नहीं पता कि वे उस वक्त सचमुच खुश थे या मेरे सामने उन्होंने खुशी ओढ़ ली थी। मुझे उनके ममत्व में मां-पिता का वात्सल्य नजर आया। अंकल दस साल पहले हमारे पड़ोस में ही रहते थे। इनके दो लड़के, पुत्रवधुएं और चार पोते-पोतियां हैं। बच्चों की अच्छी-खासी आमदनी है। मेरी उत्सुकता को अंकल शायद भांप गए। इसलिए उन्होंने मुझे सारा हाल खुद सुना दिया कि वृद्ध हो जाने के बाद कैसे वे अपने बच्चों के लिए बोझ बन गए। उनकी आपबीती सुन कर विश्वास नहीं हो रहा था। वे पूरी तरह टूटे हुए थे और बची हुई जिंदगी को बुरी तरह कोसते हुए उनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

अब मेरे मन में पीड़ा जाग रही थी। ऐसी घटना अंकल के साथ तो क्या, किसी के साथ भी घट सकती है। लगा कि आज समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट इतनी तेजी से हो रही है कि रिश्ते-नातों का लिहाज भी दम तोड़ रहा है। यह चिंताजनक बात है कि जिन मां-बाप ने हमें पाल-पोस इतना बड़ा किया, जिन कंधों पर हम बचपन में झूले, आज उनके वृद्ध होने पर हम उनका सहारा बनने के बजाय उन्हें अकेला मुश्किलों के बीच जीने के छोड़ देते हैं।

आज यह समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। युवा पीढ़ी के लिए अपने मां-बाप के लिए भी समय नहीं है। बचपन में जिस मां ने नौ महीने की प्रसव पीड़ा सही, सारी रात जाग-जाग कर बच्चे को संभालने में कभी उफ तक न किया हो, जिस पिता ने सारा पैसा बच्चों की पढ़ाई और उनका कॅरियर बनाने में लगा दिया हो और उनके चेहरे पर कभी शिकन तक नहीं आई हो, सिर्फ उम्र की वजह से असहाय होने पर उन्हें अकेला जीने के लिए छोड़ दिया जाए या वृद्धाश्रम में छोड़ कर अपने कर्तव्य को पूरा मान लिया जाए तो यह उनके साथ नाइंसाफी है।

कायदे से देखें तो जितना उन्होंने अपने बच्चों के लिए किया होता है, वृद्धावस्था में अपनी देखभाल कराना बुजुर्गों का हक है। यह किसी भी व्यक्ति के संवेदनशील होने का मानक तो होगा ही, सामाजिक तौर पर भी अनिवार्य है। शायद यही वजह है कि बुजुर्गों की उपेक्षा को कानूनन भी गलत माना गया है।

एक समस्या यह भी है कि आमतौर पर परिवारों में वृद्ध लोगों की सेवा का जिम्मा घर की महिलाओं पर छोड़ दिया जाता है। जबकि वहां मौजूद सभी लोगों की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए, चाहे वे महिला हों या पुरुष। मां-बाप अपने बच्चों के पालन-पोषण में शायद ही भेदभाव करते हैं। बल्कि उलटे होता यह है कि सामाजिक पूर्वग्रहों की वजह से कई बार बेटों के मुकाबले बेटियों को ही कम महत्त्व और देखभाल मिल पाता है। फिर भी आमतौर पर बेटियां या महिलाएं ही परिवार के बुजुर्गों की देखभाल में ज्यादा भूमिका निभाती हैं।

हम सुनते आए हैं कि चोट बच्चे को लगती है और दर्द मां को होता है। यह संवेदना से जुड़ी बात है, लेकिन इसके अर्थ का अपना महत्त्व है। मां-बाप सारी जिंदगी अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए कवच का काम करते हैं। तो उनके वृद्ध होने के बाद अगर उन्हें हमारी जरूरत पड़ती है, तो क्या यह कुछ ज्यादा की अपेक्षा है? बचपन में हम जिस हालत में होते हैं, उसमें अगर मां-पिता का संरक्षण और देखरेख न मिले तो क्या हो? क्या वृद्धावस्था में व्यक्ति की स्थिति उसी तरह नहीं हो जाती है? बचपन में जैसी देखभाल हमें अपने मां-पिता से मिली होती है, वृद्ध होने पर अगर वे हमसे कुछ उम्मीद करते हैं तो इससे परेशान होने के बजाय हमें खुश होना चाहिए। बस इतना याद करना चाहिए कि हम अपने बच्चों की देखभाल के लिए क्या करते हैं, उम्र से लाचार होने की स्थिति में हम किस हालत में हो सकते हैं और हमें किस तरह की देखभाल या संवेदनाओं की जरूरत पड़ सकती है।

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