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दुनिया मेरे आगेः श्रद्धा का दोहन

नित्य की तरह उस दिन घर से कॉलेज जाते समय लाल बत्ती पर आॅटो रुकते ही नौ-दस वर्ष का लड़का छोटी डोलची में सार्इं बाबा की तस्वीर रखे मेरे सम्मुख आ खड़ा हुआ और बाबा के नाम पर कुछ दे देने की गुहार करने लगा।

Author October 13, 2017 2:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कविता भाटिया

नित्य की तरह उस दिन घर से कॉलेज जाते समय लाल बत्ती पर आॅटो रुकते ही नौ-दस वर्ष का लड़का छोटी डोलची में सार्इं बाबा की तस्वीर रखे मेरे सम्मुख आ खड़ा हुआ और बाबा के नाम पर कुछ दे देने की गुहार करने लगा। मेरे बार-बार मना करने पर भी वह दुआओं के रटे-रटाए वाक्यांश दोहराता रहा। यही नहीं, एक बारगी तो उसने मेरे पांव भी पकड़ लिए। बत्ती के हरी होते ही मैंने चैन की सांस ली। इंद्रलोक से आगे बढ़ने पर अगले चौक की लाल बत्ती पर पूरे साजोसिंगार में लिपी-पुती एक किन्नर इठलाती- मुस्कुराती हाथ पसारे मेरे सामने थी। ‘ईश्वर खुश रखे’, ‘बच्चा तरक्की करे’, ‘तेरा काम बन जाए’ आदि वाक्य बोलते हुए उसने मेरे सिर पर आशीर्वाद देते हुए चाहे-अनचाहे मेरे पर्स से दस रुपए निकलवा ही लिए। मेरा मनोमस्तिष्क ईश्वर के इस मायाजाल को समझने की चेष्टा कर ही रहा था कि कमला नगर चौराहे पर हरी चादर फैलाए दो नवयुवक आ खड़े हुए। मेरा मस्तिष्क पहले से ही भन्ना रहा था। अब तो क्रोधित स्वर में मैंने उन्हें कुछ काम करने की सीख दे डाली।

यह सुनकर वे दोनों युवक भुनभुनाते हुए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए शायद कुछ बद्दुआ-सी देते हुए आंखें तरेरने लगे। आॅटोचालक के बीच-बचाव करने पर वे आगे बढ़ गए। आॅटोचालक ने मेरी मनोव्यथा को समझते हुए समाज में बढ़ती इस समस्या कि ‘बैठे-ठाले कुछ मिल जाए’ पर अपने विचार रखते हुए देश की लचर कानून व्यवस्था, धर्म के विकृत स्वरूप, पंडों-पुरोहितों और तथाकथित आपराधिक प्रवृत्ति के संतों को खरी-खोटी सुनाई। उसने इसी संदर्भ में अपनी किसी दुखती रग को साझा करते हुए बताया कि उसकी अपनी शादीशुदा बहन भी अपनी बीमार सास और घर परिवार के अन्य दायित्वों को छोड़ किसी ‘महात्मा ’ के कीर्तन और धर्मोपदेशों को सुनने जाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानती है, जिस कारण अब उसकी गृहस्थी टूटने की कगार पर है।

मैं धर्म के इस बदलते स्वरूप पर विचार करने लगी कि ये तथाकथित संत, महात्मा तथा पंडा पुरोहित मनुष्य के भोले मन और मस्तिष्क को अपने सम्मोहन जाल में फंसा उसकी आस्तिकता और श्रद्धा का कैसे दोहन करते हैं और फिर उसे विकृत कर देते हैं? वास्तव में सच्चा धर्म रूप तो वह है जिसे लोग आस्था के रूप में व्यक्तिगत श्रद्धा के अंग के रूप में अपनाते हैं, लेकिन आज धर्म, स्वार्थ और व्यक्तिगत हित साधने का माध्यम बन गया है। संतों, पुरोहितों ने ही नहीं राजनीतिक पार्टियों ने भी आज अपना हित साधने के लिए धर्म को अपना अचूक शस्त्र बना लिया है, जिसके जरिए उनका छल- कपट, लूट-खसोट और स्वार्थ सिद्धि का कारोबार खूब फल फूल रहा है। सामान्य जन की धार्मिक आस्था को अंधश्रद्धा और अंधविश्वास में बदलने में इन कारकों का पूरा- पूरा हाथ है। ऐसे में फिरकापरस्त ताकतें सांप्रदायिक विचारों को भी फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं, तभी तो धार्मिक अस्मिता के सिद्धांतवाद के रूप में मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन मानते हुए तलवारें और कटारें खिंच जाती हैं और फिर वह सांप्रदायिकता खुली बर्बरता की शक्ल अख्तियार कर लेती है। जब-जब धर्म वर्चस्ववादिता का शिकार हो कट्टरता, बर्बरता और परस्पर घृणा जैसी दूषित प्रवृत्तियों का जनक बनता है, तब-तब मानव समाज खतरे में पड़ जाता है। आश्चर्य नहीं तभी तो आज का मनुष्य धर्म और ईश्वर को नकार कर स्वयं के नास्तिक होने की घोषणा कर रहा है। यह नकार धर्म के नाम पर हो रहे अधार्मिक, अमानवीय कृत्यों और बढ़ते पाखंड के कारण ही है।

आज धर्म, वर्ण और जाति की जटिलताएं अपना इतना अधिक विस्तार कर चुकी हैं कि व्यक्ति इनके बीच अपने को असुरक्षित और असहाय पाता है। कवि देवी प्रसाद मिश्र ऐसे त्रासदपूर्ण समय की बात करते हुए कहते है कि-‘इस तंत्र में सिर्फ आपका नाम/ आपकी हत्या का सबब हो सकता है।’ धर्म की आड़ में ही वर्ण व्यवस्था पनपती और पलती है जिस कारण एक वर्ण अपने शक्ति-तंत्र का इस्तेमाल कर समाज में स्वतंत्रता और समानता को नकार कर धार्मिक रूढ़ियों को प्रश्रय देते हुए दूसरे वर्ण का शोषण करता है और धर्मग्रंथों की भी मनचाही व्याख्या रच कर उनमें कमजोर और हीन होने की भावना जगाता है। जबकि धर्म के व्यापक अर्थ में सदाचरण एवं सद्गुण समाहित है। किसी व्यक्ति द्वारा जो धारण किया जाता है, वह धर्म है न कि किसी विशेष संप्रदाय का रूप। नैतिक मूल्यों का आचरण तथा चेतना का शुद्धीकरण ही धर्म है जो मनुष्य में मानवीय गुणों का विकास करता है। धर्म और धार्मिक संस्कार हमें कभी भी स्वार्थी और आत्मकेंद्रित नहीं बनाते, वह एकता और समभाव का संदेश देते हुए हमें सार्वभौम से जोड़ते हैं। गुरुनानक, पैगंबर मुहम्मद, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद और संत कवि आदि सभी की वाणी यही संदेश देती है। पर आज हम उनके संदेशों को विस्मृत कर ढोंग, पाखंड, दिखावा और खोखले रीति रिवाजों की जकड़बंदी में फंस निश्चित ही अंधविश्वासी और अंधश्रद्धालु हो चले हैं, जो धर्म के विकृत स्वरूप में हमारे सम्मुख है।

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