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दुनिया मेरे आगेः अंधविश्वास का रोग

सचमुच सब कुछ बदल गया। लेकिन नहीं बदला तो अफवाहों और अंधविश्वासों का बाजार। तमाम अंधविश्वास इतिहास से वर्तमान तक यों ही जड़ हैं। जब सारा देश महामारी की दहशत में जी रहा था, तब अचानक एक दिन शाम ढले घर-घर में बालाजी भगवान प्रकट हुए थे।

Author Published on: July 11, 2020 2:29 AM
सचमुच सब कुछ बदल गया। लेकिन नहीं बदला तो अफवाहों और अंधविश्वासों का बाजार।

मधु

इतिहास वर्तमान में जीने की नवीन दृष्टि प्रदान करता है, जिससे जुड़े रहकर हम वर्तमान को जीने की नई कला सीखते हैं। इस कला में बहुत कुछ मौलिक होता है, बहुत कुछ तमाम प्रगति के बावजूद जड़ रहता है। विश्वास का खेल इतिहास की इसी जड़ता के साथ जुड़ा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज हर काल कुछ नई परिस्थितियों को लेकर विशेष होता है। हर काल मनुष्य को कुछ न कुछ सिखा कर जाता है। मौजूदा महामारी का काल अपने आप में इतिहास के सभी कालों से भिन्न है। इस काल में हमने जैसा समय देखा, वह हमसे पहले की चार पीढ़ियों ने भी कभी नहीं देखा था। मरती मानवता, गरीबी की नग्न तस्वीरों में असली भारत को देखा है। डर के माहौल को स्याह रंग देते देखा है। हाथ में रखे पैसे को खर्च करने का इंतजार देखा है। सड़क पर नवजीवन और जीवन को सड़क पर खत्म होते देखा है। दहशत की सांसों में जीना देखा है। न लोग देख कर हाथ मिलाते हैं, न गले मिलते हैं। बड़ों के पैर भी बस झुक जाने भर से छू जाते है, मुंह पर मास्क लगाए करीबी भी अजनबी लगते हैं । कभी पंछियों को पिंजरों में रखा जाता था और हम आजाद होते थे। अब हमने तमाम सुविधाओं के साथ पिंजरे का जीवन जी के देखा है। पंछी पहले से स्वतंत्र हैं, खुश हैं। शायद प्रकृति के दोषियों को पिंजरे में देख कर!

सचमुच सब कुछ बदल गया। लेकिन नहीं बदला तो अफवाहों और अंधविश्वासों का बाजार। तमाम अंधविश्वास इतिहास से वर्तमान तक यों ही जड़ हैं। जब सारा देश महामारी की दहशत में जी रहा था, तब अचानक एक दिन शाम ढले घर-घर में बालाजी भगवान प्रकट हुए थे। एक संबंधी से फोन के जरिए सूचना मिली कि रोटी बेलने वाले बेलन को चकले पर दीया जला कर चावल रख कर खड़ा करो तो वह बालाजी की शक्ति से खड़ा हो जाएगा और अपनी मन्नत मांगो तो पूरी हो जाएगी। तत्काल आंखों के सामने विराट बिंब बनने शुरू हो गए। जीवन-साथी को सुनाया और हम जोर से हंस पड़े। हम रसोई में गए और बेलन को बिना पूजा-पाठ के खड़ा करने का प्रयास किया। बिना किसी विशेष प्रयत्न के वह खड़ा हो गया। तब बात उठी कि ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ! लेकिन इससे पहले यह बात किसी ने फैलाई भी तो नहीं थी! इस पूरे प्रकरण में सबसे मजेदार और जायज प्रश्न मुझे यह लगा कि यह कैसे पता चला कि इस पूरे तामझाम के केंद्र में बालाजी थे। कोई दूसरे भगवान भी तो हो सकते थे! खैर, सवाल उठाने का स्वाभाविक नतीजा कुछ देर के लिए सही, लेकिन पारिवारिक बहिष्कार सहना पड़ा।

मुझे याद है, जब मैं सातवी कक्षा में पढ़ती थी तब स्कूल में ही पता चला था कि आज भगवान दूध पी रहें हैं। तब इस चमत्कारी बात को सुन कर मन कैसा रोमांचित हुआ था! मैं और मेरी सहेलियां स्कूल का बस्ता लेकर ही मंदिर पहुच गए थे दूध पीते भगवान को देखने। लंबी-लंबी कतारों में कितने सारे लोग दूध लिए खड़े थे! परीक्षाएं नजदीक थीं, इसलिए अच्छे नंबरों की कामना हमने भी की थी। बड़ा मजा आया था उस दिन। लेकिन तब बालमन किसी विश्वास और अंधविश्वास को नहीं जनता था। लेकिन आज मैं यह समझ पा रही हूं कि उस उम्र से ही इस विचार की नींव पड़ती है। कुछ उस नींव को मजबूत करते चले जाते हैं, कुछ उम्र के साथ-साथ उसे ढहा देते हैं।

इन अंधविश्वासों की एक ताकत के रूप में मैं आज सोशल मीडिया की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानती हूं, जहां हर मर्ज का इलाज और हर विश्वास का अंधविश्वास मौजूद है। रंग-रूप के निखार से लेकर उस भविष्य तक की जानकारी, जिसके बारे में न किसी ने जाना था, न जान पाएगा। शिक्षित वर्ग भी इसकी चपेट में पूरी तरह घिरा हुआ है। मैंने पढ़ा था कि आधुनिकता तर्क सिखाती है और शिक्षा इसका आधार है। लेकिन इस मामले में मुझे शिक्षा भी कमजोर लगने लगती है। समाज का एक तबका इन अंधविश्वासों को सिरे से नकार देता है, लेकिन उस तबके को फिर समाज बेवकूफ और अभिमानी समझता है।

मैं किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। आज भी जब-तब हम रोटी बेलने वाले बेलन को रसोई की स्लैब पर खड़ा कर देते हैं, उस दिन को याद करते हुए। बात सारी संतुलन की थी, लेकिन यहां कोई तर्क नहीं खोजता। बस एक ने कहा और दूसरे ने किया। आंख बंद करके विश्वास करने की परंपरा उतनी ही प्राचीन है, जितनी मानव सभ्यता। मैं सोचती हूं कि जब कोई धर्म की बात करता हो तो विश्वास अंधा हो जाता है, लेकिन जब वही व्यक्ति आपकी कोई बहुमूल्य वस्तु मांग ले तो विश्वास चरमरा जाता है। ये कैसा अवसरवादी विश्वास है जो अवसर के अनुसार बनता-बिगड़ता है! मौजूदा काल ने जहां बहुत कुछ सिखाया, वहां इस बात पर न मिटने वाली मोहर लगा दी है कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हों, कितना भी तर्क करना सीख जाएं, तमाम प्रगति के बावजूद अंधविश्वासों के मकड़जाल से शायद बाहर नहीं निकल पाएंगे। इस काल में हमें क्या करना है? अपने आपको बदलना है या आत्मविश्लेषण करना है, यह हमारे ऊपर है।

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