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दुनिया मेरे आगे: हर चीज बिकती है

मेरे घर के एक बुजुर्ग कहा करते थे कि बोलने वाले की मिट्टी भी बिक जाती है और घुम्मे का सोना भी नहीं बिकता। यकीन मानिए, यह काफी हद तक सच है।

Author Updated: January 25, 2021 5:46 AM
waterसांकेतिक फोटाेेे।

राजेंद्र वामन काटदरे

साहिर लुधियानवी के लिखे गीत के मुताबिक, ‘यहां तो हर चीज बिकती है… सुनो जी तुम क्या-क्या… बाबूजी तुम क्या-क्या खरीदोगे!’ जी हां, फल-फूल, भाजी-तरकारी, दूध, किराना, कपड़ा, किताबें तो रोजमर्रा की बात हैं, लेकिन वार-त्योहार पर सोना-चांदी, जड़-जवाहरात, गाड़ी और कर्ज लेकर जमीन, फ्लैट, बंगला आदि सब कुछ खरीदा जा सकता है, बस आपके पास रुपए होने चाहिए। आपकी जेब गरम होनी चाहिए और सच यह है कि यहां ईमान भी बिकता है।

खंभों और तारों से होते हुए आपके घर आने वाली बिजली और नल से आने वाला पानी आप सरकार से खरीदते ही हैं। प्यासे को पानी पिलाना किसी जमाने में पुण्य का काम रहा होगा। आजकल सरकारी रेल में भी बीस-बीस रुपए में मात्र एक लीटर पीने का पानी बेचा जा रहा है। हवा भी बिकती है आजकल। यकीन न हो तो किसी अस्पताल में भर्ती होकर देख लें कि आॅक्सीजन के कितने पैसे वसूले जाते हैं आप से!

ईमान बेचने वाले भी कुछ सरकारी दफ्तरों में मिल ही जाते हैं, जो हमारे-आपके जायज काम करने या कराने के लिए नाजायज पैसे वसूलते हैं। अफसोस की बात यह भी है कि अब सेना में भी कभी-कभार बिक जाने वाले कुछ किस्से सामने आने लगे हैं, जो देश के लिए खतरनाक है। सिनेमा सपने बेच रहा तो टीवी मीडिया पर भी टीआरपी खरीदने के आरोप लग रहे हैं।

छोटे से छोटे नगर-शहर में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह सिगरेट-बीड़ी-तंबाकू और देसी या फिर अंग्रेजी शराब भी सरकारी लाइसेंस वाली दुकानों में मिल जाती है। एक शर्मनाक सच यह भी है कि लगभग हर शहर में एक बदनाम गली भी है जहां देह-व्यापार में धकेली गई महिलाओं को नरक जीना पड़ता है। क्या इस सबके बारे में हमारा समाज नहीं जानता है या फिर हमारा प्रशासन नहीं जानता है? लेकिन इस सबकी जानकारी होने के बावजूद, सबके सामने इन तमाम चीजों की खरीद-बिक्री चलती रहती है। किसको कितना फर्क पड़ता है? हम भैंस, बकरी, कुत्ते-बिल्ली, मछली-पंछी तक के बिकने को ठीक मानते हैं, लेकिन बिकने के लिए इंसानों के शरीर से लेकर व्यक्तित्व तक का उपलब्ध होना किस दुनिया में हो रहा है?

थोड़ा परिहास की दृष्टि के साथ देखना शुरू करते हैं तो यह भी है कि गधे भी बिकते हैं और खबर आई कि गधों की बिक्री की वजह से एक देश की अर्थव्यवस्था भी सुधर गई। बहरहाल, जानवरों के बिकने की बात के क्रम में घोड़ों के बिकने की बात कम से कम अब के दौर में छोड़ी नहीं जा सकती है। पशु बाजारों में उन्नत नस्लों के घोड़े की खरीद-बिक्री की बात कोई खास ध्यान आकर्षित करने जैसा नहीं है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि हमारे देश में असली घोड़ों के साथ ‘नकली घोड़े’ भी बिकते हैं।

जी हां, हम सबने ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की बात अवश्य सुनी होगी। आमतौर पर इस तरह की खरीद-बिक्री को लेकर सत्ता का विपक्ष आवाज उठाता है या आरोप लगाता है कि उसके नेता, विधायक, मंत्री खरीद लिए गए। इसमें कोई शक नहीं कि पैसे वाले सत्ता वर्ग इस तरह अपनी सत्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, लेकिन एक सवाल यह भी है कि अगर किसी राजनीतिक दल का विधायक या सांसद बिकता है तो क्या उससे कभी पूछा जाता है कि किस सिद्धांत और विचार का आश्वासन देकर आपने जनता से अपने लिए समर्थन मांगा था और अब उस सिद्धांत और विचार के बारे में क्या खयाल है? क्या सिर्फ ‘अंतरात्मा की आवाज’ की दलील पर सारे सिद्धांत और विचार बच जाते हैं? लेकिन ऐसे लोगों के लिए अगर सिद्धांत मायने ही रखता तो उनकी कीमत ही कहां लगाई जा सकती थी!

अफसोस है कि कि हम जिस युग में जी रहे हैं, उसमें सब कुछ बिक रहा है। शिक्षा एक व्यापार हो गया है, जिसमें अब सिर्फ सामर्थ्यवानों की जगह बची लगती है। जीवनरक्षक दवाइयां महंगे दामों पर बिक रही हैं और यह कहते हुए भी शर्म आती है कि अब यहां मां की कोख भी ‘सरोगेट मदर’ के नाम पर बिक रही है।

ऐसा लगने लगा है कि सब पैसे का खेल है। आप चाहे तो कोई पेंटिंग दो करोड़ में खरीद सकते हैं और चाहें तो करोड़ों की जमीन किसी से सांठगांठ कर कौड़ियों के मोल खरीद सकते हैं। आप देश के फिल्मी सितारों को घंटे-दो घंटे के लिए किराया चुका कर अपने घर के किसी समारोह में शोभा बना सकते हैं। इसके बावजूद यह सच है कि सब कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है, मगर जिंदगी नहीं खरीदी जा सकती।

अगर जान या जिंदगी अनंतकाल तक के लिए पैसे देकर खरीदी जा सकती तो कोई राजा, कोई मंत्री मरता ही नहीं। हमारे पास अथाह पैसा हो तो हम अच्छी सुविधाओं वाले और नामी डॉक्टर की सुविधा वाले अस्पताल में भर्ती हो सकते हैं, लेकिन वहां भी पैसों के बल पर हम अपनी जिंदगी हर हाल में नहीं खरीद सकते। जान है तो जहान है।

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