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आभासी सुख का संजाल

पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं कि अमुक आदमी ने चांद पर जमीन खरीदी है। निश्चित तौर पर यह पढ़-सुन कर जानने की लालसा बढ़ती है कि जमीन खरीदने वाला कौन है और क्या सचमुच चांद पर बेचे और खरीदे जाने के लिए जमीन उपलब्ध है!

covid 19सांकेतिक फोटो।

हेमंत कुमार तिवारी

पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं कि अमुक आदमी ने चांद पर जमीन खरीदी है। निश्चित तौर पर यह पढ़-सुन कर जानने की लालसा बढ़ती है कि जमीन खरीदने वाला कौन है और क्या सचमुच चांद पर बेचे और खरीदे जाने के लिए जमीन उपलब्ध है! खासतौर पर तब जब चांद पर जीवन और लंबे समय तक के लिए रिहाइश की संभावना को लेकर अभी तक कोई बहुत उम्मीद जगाने वाली तस्वीर सामने नहीं आई है। फिर यह भी लगता है कि हो सकता है विज्ञान और अंतरिक्ष की दुनिया ने इतनी प्रगति कर ली हो कि चांद पर जीवन को संभव बनाने में कामयाबी मिल रही हो और अब इस ओर कदम बढ़ाए जा रहे हों। लेकिन फिर दिमाग में यह सवाल आता है कि धरती के वे लोग किस तरह और क्यों सोचते हैं कि उन्हें चांद पर बसना चाहिए।

दरअसल, इस बीच फिल्मी दुनिया की कई जानी-मानी हस्तियों के नाम सामने आए, जिन्होंने चांद पर जमीनी पर खरीदी थी। इसी तरह हाल ही में एक खबर आई कि ओड़ीशा के एक व्यक्ति ने मात्र अड़तीस हजार रुपए में चांद पर पांच एकड़ जमीन खरीदी। इसके बाद इसके बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने की मेरी लालसा बढ़ी। आज आधुनिक तकनीकी के जमाने में कुछ भी जानकारी हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं है, अगर खोज सही दिशा में की जाए। इस संबंध में मेरा सामने सबसे पहला सवाल था कि चांद किसकी संपत्ति है और यह किसे विरासत में हासिल हुई है। लेकिन बहुत खोजने पर भी इस सवाल का सही जवाब मुझे नहीं मिला। यह पता नहीं चल पाया कि चांद का मालिक कौन था और अब उसकी विरासत किसे मिली है, लेकिन इतना जरूर पता चला कि पृथ्वी पर बसी दुनिया के अधिकतर देशों ने इसे ‘कॉमन हेरिटेज’ यानी साझा धरोहर या विरासत का दर्जा प्रदान किया हुआ है।

अब सवाल उठता है कि यह साझा धरोहर या विरासत क्या है! जब इस बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि ‘कॉमन हेरिटेज’ शब्द का मतलब यह हुआ कि कोई भी इसका इस्तेमाल निजी सुख-सुविधा के लिए नहीं कर सकता है। साझार विरासत पूरी मानवता के लिए होता है। इस तथ्य से रूबरू होने के बाद अब अगला सीधा सवाल यही उभरा कि अगर इसका कोई भी व्यक्ति या संगठन निजी प्रयोग नहीं कर सकता है तो इसकी खरीद-बिक्री कैसे संभव है! इसका सामान्य-सा जवाब है कि अव्वल तो ऐसा हो नहीं सकता और अगर कोई इस तथ्य की अनदेखी कर या चोरी-चुपके ऐसा करता भी है तो इसकी कोई आधिकारिक मान्यता नहीं होगी।

इसके बाद अगला बिंदु यह आया कि आखिर चांद की जमीन कौन बेच रहा है। इस सवाल के कई जवाब दिखे, जिसमें सबसे बड़ा नाम इंटरनेशनल लूनर लैंड्स रजिस्ट्री नामक जमीन बेचने वाली वेबसाइट का था। इस वेबसाइट पर जाते ही कई भाषाओं में यह लिखा हुआ मिलता है कि ‘अंतरराष्ट्रीय चंद्र भूमि क्षेत्र चांद में आपका स्वागत है। चंद्र रियल एस्टेट, चंद्रमा पर संपत्ति’। इसके अलावा, अन्य जानकारियां भी दी गई हैं। अब सवाल यह उठा कि चांद अगर साझा विरासत है, तो यह संपत्ति इस वेबसाइट पर कैसे बिक रही है!

मुझे अब तक इसका सही जवाब नहीं मिल पाया, लेकिन एक जगह वीडियो में दर्ज किया गया है कि यह वेबसाइट दावा करती है कि कई देशों ने ‘आउटर स्पेस’ में इसे जमीन बेचने के लिए अधिकृत किया है। यह ‘आउटर स्पेस’ दरअसल उस प्रसंग के बारे में है, जिसके तहत भारत समेत लगभग एक सौ दस देशों ने 10 अक्तूबर 1967 को एक समझौता किया था, जिसे ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ के नाम से जाना जाता है। इसके मुताबिक ‘आउटर स्पेस’ यानी बाहरी अंतरिक्ष में चांद भी शामिल है, जो साझा विरासत है। एक बार फिर यह याद रखना चाहिए कि साझा विरासत का मतलब होता है कि इसका कोई भी व्यक्ति निजी तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकता है और यह पूरी मानवता के लिए होता है।

गौरतलब है कि ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ औपचारिक रूप से चंद्रमा और अन्य आकाशीय निकायों सहित बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उपयोग में अलग-अलग देशों की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों पर एक संधि है। अब सवाल उठता है कि जब एक सौ दस देशों ने ऐसी संधि कर रखी है कि चांद पूरे विश्व के लिए एक साझा धरोहर है तो चांद पर जमीन की खरीद-बिक्री कितनी मान्य होगी! मैंने कुछ विधिवेत्ताओं से भी संपर्क किया तो पता चला कि चांद पर जमीन खरीदना भारत में गैरकानूनी है, क्योंकि इसने बाहरी अंतरिक्ष समझौते पर हस्ताक्षर किया है।

ऐसी स्थिति में चांद पर जमीन खरीदना एक कागज के टुकड़े की कीमत देना मात्र है। लेकिन यह हो रहा है और इसकी सार्वजनिक खबर होने के बाद भी इस पर अब तक कोई रोकटोक नहीं देखने में आया है। हालांकि मुझे ऐसा लगता है कि चांद पर जमीन की खरीद-बिक्री और बहुत कम कीमत में इसके किसी टुकड़े पर अपना मालिकाना हासिल करने की पूरी प्रक्रिया महज आभासी है और फिलहाल एक काल्पनिक गतिविधि में ऊर्जा की बर्बादी है या फिर आभासी सुख हासिल करने से ज्यादा इसका कोई महत्त्व नहीं है। फिर भी सुनने-पढ़ने वाले के सामने इसकी सत्यता को लेकर भ्रम तो पैदा होता ही है!

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