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दुनिया मेरे आगे: समानता के सपने

दरअसल पूजा हम अपनी कार्यसिद्धि के लिए करते हैं, वरना स्वार्थ और कुराजनीति से ग्रस्त इस दुनिया में देवताओं से कौन डरता है? शक्ति और धन तो कदापि नहीं। देवता से डर कर नहीं, बल्कि देव समाज के नाम पर आम लोगों को डराया जरूर जाता है।

महिलाओं की समानता की बातें हमेशा से होती रही हैं, परन्तु जिन्हें समानता देनी हैं, वे स्वयं इससे असहमत दिखते हैं।

संतोष उत्सुक

कुछ दिन पहले परिवार सहित प्रसिद्ध झील के आसपास टहल रहा था। पड़ोस में बने मंदिर के प्रांगण में देव सवारी पधारी हुई थी। लोग आशीर्वाद ले रहे थे और अपनी इच्छाओं से भरे सवालों के शायद जवाब भी प्राप्त कर रहे थे। राजनीति में सफल और सुफल लोगों से आकर्षित बेटे ने कहा- ‘आप देवता से पूछें कि आप कोई बड़ा नेता और मंत्री बन सकते हैं या नहीं।’ परिवार के बाकी मुस्कराते लोगों के भी कहने पर मैंने देवता को भेंट प्रस्तुत की और यों ही ‘देव प्रवक्ता’ से एक प्रश्न भी पूछ लिया। ‘देव प्रवक्ता’ आदि की वाणी आज भी ‘देववाणी’ मानी जाती है। उसमें एक ने मुझ नाचीज को आशीर्वाद दिया कि ‘आपका काम हो..!’ शायद उन्हें मेरा प्रश्न समझ नहीं आया या उन्हें भारतीय राजनीति में किसी की भी अप्रत्याशित जीत का भान रहा होगा! ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अभी भी ऐसे लोगों के माध्यम से देवताओं के सामने अपनी परेशानियां रखी जाती हैं और लोग उनके निर्देशों का पालन करते हैं। यह महीन सुविधा भी है कि देवता आपके घर भी पधार सकते हैं!

प्रसिद्ध मेलों में कई देवताओं को बाकायदा निमंत्रण भेजा जाता है, उन्हें नजराना दिया जाता है। कई बार खुद व्यवस्था या फिर आयोजन समिति की ओर से ऐसा किया जाता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मेलों की शोभा यात्रा में एक दूसरे से आगे चलने के बहाने, एक दूसरे को छोटा साबित करने की बातें देव व्यवहार को तो नहीं रूपायित करतीं! अभी भी ऐसे मंदिर हैं जहां जाति के आधार पर भक्तों को प्रवेश देने की बातें की जाती हैं और कई जगहों पर ऐसा देखा भी जाता है। ऐसे कई मामले न्यायालय की शरण में पता नहीं कितने दिनों तक लंबित रहते हैं। लेकिन ‘देवताओं’ के आशीर्वाद से उन्हें कोई मदद नहीं मिलती!

समाज में बुद्धि, ज्ञान और समानता का प्रसार करने के लिए खोले गए स्कूल प्रांगणों में पारंपरिक सार्वजनिक भोजन के दौरान सभी इंसानों को समान समझने के प्रचारित सामाजिक सूत्र की अधिकांश सिलाइयां सबके सामने उधेड़ी जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय उत्सवों में कुछ प्रदेश वासियों को अछूत करार देकर रात्रि भोज के समय बीच से उठा देने की घटना अब दुखद इतिहास है, लेकिन उस समय शक्तिशाली सरकार माहौल खराब करने वालों का प्रशासनिक बहिष्कार नहीं कर पाई और सम्मानित ‘देव’ भी शांत रहे। कच्ची उम्र के बच्चों में भगवान देखा जाता है। उनके दिमाग में ऊंच-नीच की भावना इसी तरह तो स्थापित होती जाती है। उपस्थित देवता निश्चित ही समानता का संदेश देना चाहते होंगे, लेकिन उनके विश्वस्त अधिकांश प्रवक्ता इस संदर्भ में चुप रहते हैं। क्या वे भी मानते हैं कि सभी इंसान एक जैसे नहीं हैं?

बराबरी के प्रवचन की राजनीति खूब की जाती है। असहाय प्रशासन को ऐसे मामले फुटबॉल बना कर खेलने पड़ते हैं। बेचारा समय न्यायालय की शरण में परेशान खड़ा रहता है। इधर फिर से ऐसी घटनाएं होती रहती हैं और असमानता का पहाड़ ऊंचा होता रहता है। विस्मयकारी है कि उन्हें ‘प्रेरणा’ भी शायद यही मिलती है। जातीय भेदभाव कभी खत्म नहीं किए जाते। हमने कई समीकरणों के आधार पर देवताओं को भी श्रेणियों में बांट रखा है। आम लोक जीवन में देवताओं की भूमिका और जिंदगी और समाज के कठिन मोड़ पर इससे संबंधित अनेक सवाल जवाब चाहते हैं।

मौजूदा संकट के दौर में सरकार और प्रशासन अपनी तरफ से प्रयास कर रहे हैं। व्यक्ति, समूह और संस्थाएं भी सहयोग दे रही हैं। लेकिन इस विकट समय में भी कुछ लोग प्रशंसनीय मानवीय व्यवहार करते नहीं दिखते। समय बीतने के साथ शायद अब हमें रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़े हुए अनुशासित बदलावों के साथ जीना पड़ेगा। इन दिनों महामारी से बचाव के लिए सभी अपने अपने ईष्ट से निवेदन कर रहे हैं। कई महीने बाद पूजास्थल खुल चुके हैं, लेकिन काफी कुछ बदलना भी पड़ा है। इस बदलाव में देव संदेश नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य अनुशासन और स्वानुशासन लागू किया जाना आवश्यक है।

जिस तरह श्रद्धालु अब मास्क लगा कर आएंगे, हाथों को धोकर सैनिटाइजर लगाएंगे, थर्मल स्क्रीनिंग की जाएगी, लेकिन अपने ईष्ट की मूर्ति को छू नहीं पाएंगे, घंटी नहीं बजाएंगे, उन्हें प्रसाद नहीं मिलेगा, पैंसठ वर्ष से ज्यादा वरिष्ठ और दस वर्ष से छोटे बच्चे नहीं जा पाएंगे, उसमें पूजा का यह बदला हुआ स्वरूप आराध्य को प्रसन्न करेगा या नहीं, पता नहीं, लेकिन श्रद्धालु को इससे ही संतुष्टि ग्रहण करनी होगी। हमें यह समझना होगा कि इतने पूजास्थल भी इंसान ने अपनी इच्छा से अपने लिए ही बनाए हैं।

दरअसल पूजा हम अपनी कार्यसिद्धि के लिए करते हैं, वरना स्वार्थ और कुराजनीति से ग्रस्त इस दुनिया में देवताओं से कौन डरता है? शक्ति और धन तो कदापि नहीं। देवता से डर कर नहीं, बल्कि देव समाज के नाम पर आम लोगों को डराया जरूर जाता है। इतिहास की अनेक धार्मिक गलतियां यही साबित करती हैं कि महत्त्वपूर्ण या रसूखदार हो जाने वाले लोगों को किसी का भी डर नहीं। फिर भी वर्तमान संकट समय से उबर कर सभी को फिर से खड़ा होना है। ऐसे में सबको साथ मिल कर सहयोग करने की जरूरत है। किसी भी किस्म का भेदभाव इस प्रयास को रोकने का ही काम करेगा।

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