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पर्यावरण के दोस्त

स्वाभाविक रूप से लगा कि बारिश के बाद तो यहां खेती का कोई काम नहीं। पानी ही नहीं, तो खेती कैसी। हमने साथ चल रहे एक स्थानीय आदिवासी युवक गोरख्या से पूछ लिया कि यहां सिंचाई से खेती तो नहीं होती होगी।

Author June 24, 2019 2:37 AM
किसान की प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express Photo)

मनीष वैद्य

हम खेतों में सिंचाई के लिए पानी का अंधाधुंध उपयोग करते हैं। साठ फीसदी भू-जल का उपयोग सिर्फ सिंचाई के लिए हो रहा है। साथ ही बिजली या डीजल की बड़ी मात्रा खपत करते हैं, लेकिन आदिवासी समाज ऐसी युक्ति का इस्तेमाल करते हैं जो उनके पूर्वजों ने बिना किसी पढ़ाई के परंपरा और अर्जित अनुभव से विकसित की थी। यह आज भी देखने को मिलती है और इसका अब भी कोई सानी नहीं। लगता है कि इनसे हमें अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

पश्चिम मध्यप्रदेश का निमाड़ इलाका सतपुड़ा पर्वत शृंखला की ऊंची-नीची पहाड़ियों की ऊसर जमीन का पठारी क्षेत्र है। इंदौर शहर से पौने दो सौ किमी दूर बडवानी का पाटी कस्बा एक छोटे पठार पर बसा है। इससे आगे छोटे-बड़े पहाड़ों का सिलसिला और उन पर बसे छोटे आदिवासी गांव फलिए का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। इसमें खासी मशक्कत की वजह से हांफते-हांफते जान निकलने लगती है। पूरे रास्ते पहाड़ वीरान और उसर पड़े हैं। न पेड़ है और न कोई बड़ी नदी। नर्मदा बहुत पहले ही छूट जाती है। दूर-दूर तक पानी का कोई सोता नहीं नजर आता। बस कुछ पहाड़ी नाले हैं जो बारिश के बाद ज्यादा दिन साथ नहीं देते। कई बरसों से यह इलाका सूखा घोषित किया जाता रहा है। कुछ कुएं और नलकूप भी हैं, पर ज्यादातर सूखे। कहीं छोटे-छोटे खेत जरूर दिख जाते हैं। यहां के लोग बड़ी तादाद में मजदूरी करने हर साल शहरों का रुख कर लेते हैं।

स्वाभाविक रूप से लगा कि बारिश के बाद तो यहां खेती का कोई काम नहीं। पानी ही नहीं, तो खेती कैसी। हमने साथ चल रहे एक स्थानीय आदिवासी युवक गोरख्या से पूछ लिया कि यहां सिंचाई से खेती तो नहीं होती होगी। उसने आशा के विपरीत मुस्कराते हुए कहा कि नहीं, यहां भी सिंचाई होती है हालांकि बहुत कम होती है। सहसा विश्वास नहीं हुआ। जिज्ञासा हुई कि आखिर इन हालात में ये लोग अपने खेतों को पानी कैसे देते होंगे, जबकि आसपास न अब तक कोई कुआं नजर आया था और न ही कोई अन्य साधन। इस सवाल पर गोरख्या कुछ बोला नहीं। बस मुस्करा दिया। फिर बोला कि खुद ही देख लेना। इसके बाद लंबे-लबे डग भरता हुआ हमसे आगे चलता रहा। पर हमारे मन में जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी कि यहां पानी कैसे और कहां से आता होगा। थका देने वाले इस लंबे पांच घंटे के सफर का पहला पड़ाव था पीपरकुंड। यह पहाड़ों के पार एक दूसरे पहाड़ पर बसा है। इस वन ग्राम में न बिजली है और न ही सड़क। आठ फलियों को मिला कर ढाई सौ लोगों की बस्ती है। गांव से लगे घने जंगल के आसपास कुछ खेती की जमीन। यहां किसी के पास तीन तो किसी के पास छह एकड़ तक खेती की जमीन है।

पहाड़ सिंह के खेत पर यह देख कर हम दंग रह गए कि छोटी-छोटी घुमावदार नालियों से रेंगते हुए पानी इस सूखे पहाड़ पर भी छलछलाता पहुंच रहा था। पहाड़ सिंह ने बताया कि यह उनका पारंपरिक तरीका है, जिसमें बिना बिजली या डीजल और बिना किसी उपकरण के सिर्फ घुमावदार नालियों के जरिए ही सैकड़ों फुट नीचे से पहाड़ों पर पानी चढ़ाया जाता है। पहले थोड़ा ऊपर, फिर नीचे फिर थोड़ा ऊपर, फिर नीचे- इस तरह बहते हुए पानी को गुरुत्वाकर्षण बल से ऊपर की ओर ले जाया जाता है। इसकी दूरी आधा से डेढ़ किमी तक होती है। यह विज्ञान के उसी सिद्धांत पर काम करता है जिसमें पहाड़ी नालों में बहते पानी को ‘डाउन स्ट्रीम’ से ‘अप स्ट्रीम’ में ले जाया जाता है। इसी तकनीक को स्थानीय बोली में पाट की खेती कहते हैं। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है, पर इन आदिवासियों की जिंदगी मेहनत से कब घबराती है! बकौल पहाड़ सिंह पहले तो बहुत लंबी-लंबी नालियां खोदनी पड़ती है, फिर इसकी लगातार देखभाल करनी पड़ती है और साल-दर-साल इसकी गाद हटानी पड़ती है।

यह तभी तक पानी दे सकता है, जब तक कि नाले में पानी हो। नाले का पानी सूख गया तो सारी मेहनत बेकार। कातर फलिए के वेलसिंह भी एक किलोमीटर दूर से नाली लाकर खेती कर रहे हैं। बीस साल पहले उसके पिता ने ये नालियां खोद कर पाट तैयार किया था, लेकिन बीच में बिजली आ गई तो हमने इसे बंद कर बिजली से सिंचाई शुरू कर दी। पर बिजली कटौती और भारी भरकम बिल आने से अब फिर पाट से पानी चढ़ा रहे हैं। इलाके में कई आदिवासी किसान पीढ़ियों से इस तरह पानी के साथ देश की बिजली और डीजल भी बचा रहे हैं। यह सब तरह से निरापद और प्राकृतिक होने के साथ-साथ बिजली और डीजल बचाने वाली परंपरागत पद्धति है। हमें इनसे सीखना चाहिए। हमारे ‘इको सिस्टम’ या पर्यावरण तंत्र को यथावत रखते हुए ऐसे वैकल्पिक संसाधनों और तकनीकों को सहेज कर इन्हें और परिवर्धित करने की जरूरत है, ताकि पानी और उर्जा को बचाया जा सके।

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