शिक्षा बनाम दीक्षा

उस दिन हमारे पड़ोसी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया।

सांकेतिक फोटो।

मनोज कुमार

उस दिन हमारे पड़ोसी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किस्म के जतन करने पड़ते हैं। अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रख कर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है। बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व होता है। उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आई कि यह हो सकता है, लेकिन यह पूरा नहीं है। फिर सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है! शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है।

जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहले शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया। शिक्षा यानी अक्षर ज्ञान। वह सब कुछ, जो लिखा हो, उसे हम पढ़ सकें। एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं। शिक्षा को एक तंत्र चलाता है, इसलिए शिक्षा निशुल्क नहीं होती है। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है। इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क। यानी आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी। आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं। चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाए गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे। एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को न केवल सार्थक करेगी, बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों। यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है।

अब दूसरा शब्द दीक्षा है। दीक्षा शब्द उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था। शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी। दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी। दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे। दीक्षा भी निशुल्क नहीं होती थी, लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं होता था। यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे या नहीं मांगे। यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था। दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को जीवन की सीख देना था। विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे। दीक्षा के बाद रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के प्रशिक्षण दिए जाते थे। जंगल से लकड़ी काट कर लाना, भोजन खुद पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था। दीक्षा अवधि पूरी होने के बाद उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारंपरिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे। यानी दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों का मानस तैयार करना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सिखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सिखाना था।

यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है। निश्चित रूप से यह सच हो सकता है, लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हैं, डिग्रीधारी बन रहे हैं, लेकिन सोचने-समझने का सलीका और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है। हम शिक्षित हैं, लेकिन जागरूक नहीं। हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं। शिक्षक हैं, लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं। जिस भी कार्य का हम मूल्य चुकाएंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा। शिक्षा आज एक उत्पाद है, जो दूसरे उत्पाद से हमें जोड़ता है कि हम नौकरी प्राप्त कर लें। दीक्षा विलोपित हो चुकी है। शिक्षा और दीक्षा का जो अंतर्संबंध था, वह भी हाशिये पर है। शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं।

शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है, लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है। लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है। राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है। यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है, लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित भी देश संभालने की क्षमता रखता है। विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है। वह भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी स्कूली कक्षा में नहीं पढ़ाया जा सकता है। लेकिन सम्मोहन के बरक्स किसी भी तरह की शिक्षा अगर मानवीय संवेदना और सरोकार पैदा करने में नाकाम होती है तो उसका कोई मतलब नहीं है!

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