तहजीब के तराने

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी बात सत्तर के दशक की है। तब दिल लखनवी बड़े लोकप्रिय थे। ऊंची आवाज और बुलंद तरन्नुम में गजल पढ़ते थे और एक-एक शेर को तीन बार पेश करते थे। उनकी मशहूर गजल थी- ‘जब पड़ा वक्त गुलिस्तां पे तो खूं हमने दिया/ बहार आई तो कहते हैं तेरा काम नहीं है!’ यह […]

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

बात सत्तर के दशक की है। तब दिल लखनवी बड़े लोकप्रिय थे। ऊंची आवाज और बुलंद तरन्नुम में गजल पढ़ते थे और एक-एक शेर को तीन बार पेश करते थे। उनकी मशहूर गजल थी- ‘जब पड़ा वक्त गुलिस्तां पे तो खूं हमने दिया/ बहार आई तो कहते हैं तेरा काम नहीं है!’ यह शेर अक्सर उपेक्षा के शिकार लोग सुनाते मिल जाते हैं। दिल साहब ने एक बार इंदौर के एक मुशायरे में अपने विशेष आग्रह पर बुलवाए गए एक उस्ताद के सामने शेर पढ़ा। सुनने वाले तो उठ-उठ कर राय दे रहे थे, मगर वे उस्ताद गुमसुम बैठे थे, जैसे उन पर कोई असर न हुआ हो। दिल साहब बार-बार उन्हीं की ओर देख कर उनके दाद न देने और उनकी चुप्पी पर हैरान थे। गजल पढ़ कर वे उनके पास आए और उनकी राय मांगी। उस्ताद बोले कि आप बहुत अच्छा पढ़ते हैं और आपने वाकई बहुत अच्छा पढ़ा। दिल हैरान थे कि सिर्फ पढ़ने का जिक्र कर रहे हैं, पर यह नहीं बोल रहे कि अच्छा कहते हैं। पढ़ने और कहने में जमीन-आसमान का फर्क है। बहुत पूछने पर उस्ताद ने पूछा कि शेर की पहली लाइन में ‘खूं हमने दिया’ कहा गया है, पर दूसरी लाइन में ‘तेरा काम नहीं’ कैसे हो गया! यानी बहुवचन से एकवचन में बात कैसे सिमट गई?

जाहिर है, उर्दू के उस्ताद इतनी बारीक नजर से अपने शायरों को परखते हैं और गलती पर उन्हें भी नहीं बख्शते। तो अगर उर्दू वाले हिंदी या अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति थोड़े सख्त हैं तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। पर इतने सख्त पैमाने वाले जानकार भला कितने हैं? एक उस्ताद शायर ने एक बार मुझसे कहा था कि शेर की पहली पंक्ति में शायर दलील पेश करता है। दावा और दलील के बिना गजल नहीं हो सकती। जहां यह नहीं है, उसे उस्ताद एकदम खारिज कर देते हैं।

दरअसल, गजल छोटी बहर की भी होती है और बड़ी बहर की भी। उसकी अपनी तख्ती होती है और मीजान होता है, अपनी बहर या लय होती है। उसी मीजान पर उसे परखा जाता है। उदाहरण के तौर पर कामयाब गजलों के कुछ शेर देखे जा सकते हैं- ‘दो परिंदे उड़े आंख नम हो गई / मैंने जाना कि मैं उसको भूला नहीं।’ और ‘इक लफ्जे मुहब्बत का अदना-सा फसाना है/ सिमटे तो दिले-आशिक, फैले तो जमाना है।’

फिलहाल गजलें खूब लिखी जा रही हैं। सत्तर के दशक में दुष्यंत कुमार ने हिंदी गजलों को बहुत लोकप्रिय बनाया। उनके पहले हिंदी में गजलें तो लिखी गर्इं, पर चर्चित नहीं हुर्इं। लेकिन दुष्यंत की हिंदी गजलों के मशहूर होने के बाद अनेक स्थापित कवियों ने भी गजलें लिखीं। आज हिंदी में ही नहीं, मराठी, गुजराती और पंजाबी, सिंधी, राजस्थानी, मालवी, निमाडी और अन्य बोलियों में भी गजलें हो रही हैं। जहां तक स्तर का सवाल है, इस पर हर भाषा में विवाद उठते रहे हैं। आम अवाम गजलों का दीवाना है। इसलिए वे लिखी भी खूब जा रही हैं और पसंद भी की जा रही हैं। कवियों और शायरों को ‘पोइटिक लाइसेंस’ देने की बात कही जाती है। स्तर की बात छोड़िए। यह यों भी बड़ा नाजुक मामला है!

बहरहाल, उर्दू गजलें अपने आप में लोगों की पसंद होती चली गर्इं, लेकिन बेगम अख्तर, मेंहदी हसन, गुलाम अली और जगजीत सिंह जैसे विख्यात गजल गायकों ने उन्हें गाकर उनकी लोकप्रियता में इजाफा किया। यही वजह है कि अन्य भाषा-भाषी भी गजलों की ओर आकर्षित हुए। आज क्या नेता, क्या अभिनेता और क्या खुद को पढ़ा-लिखा कहने या बनाने की कोशिश में लगे सफल आम लोग, सब कभी न कभी एकाध शेर सुनाते नजर आ ही जाते हैं और अक्सर वे शेर गजलों के ही होते हैं। दरअसल, गजल तहजीब का एक हिस्सा बन गई है। ग़ालिब, जिगर, शकील, खुमार, जांनिसार अख़्तर, मजरूह और कैफ़ी आज़मी उन लोकप्रिय शायरों में हैं जिन्हें लोग हमेशा सुनना पसंद करते हैं।

कुछ लोगों के अनुसार गजल का अर्थ है माशूका से, या माशूका की बात करना। कुछ अन्य लोगों की राय है कि गजल शायर या कवि की असीम वेदना के क्षणों में उठी चीख है। पर सच यह है कि गजल उर्दू अदब की एक मुकम्मल, समर्थ और समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा से युक्त ताकतवर विधा है। शायर गागर में सागर भर कर सीधे अवाम से संवाद करता है और उसकी बात दिल पर तीर-सा असर करती है। शायद इसीलिए उर्दू वाले फख्र से यह कहते हैं कि उर्दू का जो भी पहला शायर हुआ होगा, उसने गजल ही कही होगी और जो आखरी शायर होगा वह भी यकीनन गजल ही कहेगा।

 

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