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गांव में पुस्तकालय

राजेंद्र उपाध्याय जनसत्ता 26 सितंबर, 2014: गांव में एक पुस्तकालय था, पर कुछ लोगों के लिए उसके वहां होने का कोई अर्थ नहीं था। उसकी वहां वैसी उपयोगिता नहीं थी जैसी किसी मंदिर, अस्पताल या किसी श्मशान गृह की होती है। वह उस झरने की तरह भी उपयोगी नहीं था, जहां से लोग अपने पीने […]

Author September 26, 2014 11:28 AM

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 26 सितंबर, 2014: गांव में एक पुस्तकालय था, पर कुछ लोगों के लिए उसके वहां होने का कोई अर्थ नहीं था। उसकी वहां वैसी उपयोगिता नहीं थी जैसी किसी मंदिर, अस्पताल या किसी श्मशान गृह की होती है। वह उस झरने की तरह भी उपयोगी नहीं था, जहां से लोग अपने पीने के लिए ठंडा पानी लाते थे। कभी-कभी कुछ थके बुजुर्ग वहां आते थे। पर उनकी दिलचस्पी किताबों में कम, एक-दूसरे में ज्यादा होती थी। वे गांव की बातें करने वहां रोज आते थे और जोर-जोर से बोलते थे। उन्हें कोई रोकता नहीं था। वहां ऐसे दिशा-निर्देश भी नहीं थे कि शांति बनाए रखी जाए! हालांकि वहां बस किताबें थीं, जो बोलती थीं। लेकिन वे न जाने कब से ताले में बंद थीं। चाबी मांगने की कोई हिम्मत नहीं करता था। वे पड़ी रहती थीं उन लेखकों के बारे में सोचती हुर्इं जो उन्हें लिख कर, ईनाम पाकर अब राजधानी में बस गए थे। कई किताबों के लेखक कभी के मर गए थे।

वहां कुछ पढ़े-लिखे बेरोजगार भी आते थे, बड़े शहरों में अपने लिए नौकरियां तलाशने। दरअसल, वहां आने वाले ‘रोजगार समाचार’ में कभी-कभी उन्हें आकर्षक नौकरियां दिख जातीं और वे भविष्य के सुंदर सपनों में खो जाते। वे उस गांव के एकमात्र फोटो स्टूडियो में फोटो खिंचवाने जाते, जो नौकरी के लिए भरे जाने वाले आवेदन में चिपकाई जाने वाली थी। वह गांव अभी भी श्वेत-श्याम दौर की फिल्मों का गांव था। वहां विवाह योग्य लड़कियां भी फोटो खिंचवाने के लिए साड़ी पहन कर जातीं। वही फोटो बारी-बारी से रिश्ते के लिए बाहर भेजने के काम आता था।

वह गांव फिल्मों की हर उस चर्चा या प्रचार से दूर था, जो अक्सर छोटे और कभी-कभी बड़े शहरों में होती रहती है। उस गांव में दूध और दही तो बिकता था, पर मांस नहीं। अंडे जरूर कहीं-कहीं किसी दुकान पर देखे जाते थे, पर उन्हें खाने वाले कम थे। सब्जियां भी सब तरह की नहीं मिलती थीं। वहां देशी-अंग्रेजी शराब की एक भी दुकान नहीं थी, यानी मद्य-निषेध सांस्कृतिक रूप से अपने आप लागू था। बूढ़े हुक्का गुड़गुड़ाते थे, पर सिगरेट पीते नौजवान लगभग नहीं दिखते थे। लड़कियां सीधी-सादी सलवार-सूट में रहती थीं। वहां हिंदी साहित्य के कई लेखकों और कालजयी कवियों के चित्र लगे थे, जो अपनी किताबें छोड़ कर ‘गोलोक’ को चले गए थे। अब उनकी पुस्तकें इतनी कालजयी हो गई थीं कि कोई उन्हें पढ़ने का साहस नहीं करता था। एकाध बार किसी ने किसी किताब को छूना चाहा तो किताबों के रजिस्टर के पास ऊंघते आदमी को आलमारी की चाबी नहीं मिली। शाम को चाबी मिली तो ताला खोलने में मशक्कत करनी पड़ी। उन किताबों को लिखने वाले मर गए थे! उन्हें पढ़ने वाले भी शायद मर गए थे! अब उन्हें कोई छूता नहीं था। प्रसाद ग्रंथावली, रांगेय राघव और मुक्तिबोध रचनावली में लोगों को रुचि नहीं रह गई थी। वृंदावनलाल वर्मा रचनावली भी इतिहास की वस्तु हो गई थी।
वहां कई सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएं किताबें मुफ्त में भेजती थीं। कभी-कभी कुछ विद्यार्थी आकर किताबें मांगते। थके हुए बूढ़े वहां इस बात पर बहस करते कि ‘कालिदास’ कहां के थे। कोई सिद्ध करता कि वे यहीं इन्हीं पहाड़ों के रहने वाले थे। यहीं काली मंदिर में पूजा करते थे। यहीं उन्होंने ‘मेघदूत’ लिखा था। यहीं भागीरथी, अलकनंदा है, यहीं मेघों का ‘गर्जन-तर्जन’ उन्होंने सुना और ‘ऋतु संहार’ लिखा। ऐसी प्राकृतिक सुषमा के बीच ही उन्होंने प्रकृति वर्णन किया! उज्जैन जैसी शुष्क जगह में कालिदास ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’ कैसे लिख सकते थे!

कोई बूढ़ा तंबाकू खाने वाले दूसरे बूढ़ों को तंबाकू की तकलीफों और बुराइयों के बारे में बताता कि इससे कितनी जल्दी कैंसर हो सकता है। अधेड़ उम्र के लोग मेज पर फैले अखबारों में भविष्यफल देखने आते थे। इसके बाद उनकी दिलचस्पी तीज, त्योहार, व्रत आदि में होती। ज्यादा से ज्यादा वे ‘जीप उलटी दस मरे’, ‘लॉरी उलटी आठ मरे’ जैसी खबरों में ही रस लेते। उनकी दुनिया बहुत सीमित थी, सरोकारों का दायरा छोटा था, इसलिए उनके लिए समाचार भी सीमित हो गए थे। कभी होली के दिन या किसी सार्वजनिक अवकाश के दिन पुस्तकालय पर ताला लगा देख कर बूढ़े अचरज में पढ़ जाते कि अब क्या करें। उनके घर पर रोज अखबार भी नहीं आता था, जिसे वे पढ़ कर वक्त गुजारें।

एक बार बूढ़ी काकी का बेटा किसी बात पर मां से रूठ कर कहीं चला गया। दो-तीन दिन तक घर ही नहीं आया। काकी का रो-रोकर बुरा हाल। सबने खूब समझाया। हार कर पत्रकार बाबू को पकड़ा। सबने चंदा करके काकी के बेटे शिवकुमार की तस्वीर ‘पत्रकार बाबू’ को दी और अखबार में छपवाया- ‘गुमशुदा’ वाले कॉलम में। उसमें काकी का पता भी दिया था- शिव मंदिर के सामने!

 

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