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वह सुबह

दिल्ली के पंडारा रोड में मेरे घर के अगल-बगल अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो एक दूसरे से शायद ही कभी बोलते हैं। शादी-ब्याह, खुशी-गमी में भी एक दूसरे को नहीं बुलाते। पर मैंने सुना है कि कभी यहां रंगकर्मी बव कारंथ, शुभा मुद्गल आदि कलाकार भी रहते थे। आजकल भी ऐसे लोग […]

Author January 20, 2015 2:00 PM

दिल्ली के पंडारा रोड में मेरे घर के अगल-बगल अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो एक दूसरे से शायद ही कभी बोलते हैं। शादी-ब्याह, खुशी-गमी में भी एक दूसरे को नहीं बुलाते। पर मैंने सुना है कि कभी यहां रंगकर्मी बव कारंथ, शुभा मुद्गल आदि कलाकार भी रहते थे। आजकल भी ऐसे लोग रहते होंगे, मन में यह जिज्ञासा थी। न्यूयार्क स्थित कलाकार-लेखक मित्र विजयकुमार ने बताया था कि पंडित बिरजू महाराज भी यहीं रहते हैं। घर का नंबर नहीं मालूम था। एक दिन इंटरनेट से पता कर मैं उनके घर डी- 2/33 पहुंच गया। नीचे के घर में वे बरसों से रह रहे हैं। अब यह पंडित बिरजू महाराज के घर के नाम से मशहूर है।

एक लड़का तौलिया सुखाने बाहर आया तो मैंने पूछा- ‘उस्ताद बिरजू महाराज’ यही रहते हैं? उसने कहा- ‘हां।’ उस वक्त सुबह-सुबह उनसे मिलने की हिम्मत मैं नहीं जुटा पाया। बाद में भी जाना टालता रहा। पता चला मुंबई गए हैं। डी-2 के इन मकानों में कितने ही बड़े-बड़े अफसर आए और चले गए, उन्हें कौन याद रखता है। पंडितजी को सब याद रखेंगे। जब सितारादेवी गुजरीं, पंडित बिरजू महाराज की उनको श्रद्धांजलि की खबर अखबारों में पढ़ी। प्रयागजी से चर्चा की कि इस बारे में पंडितजी से और जानकारी लेनी चाहिए। एक दिन घर बंद देख लौट आया।

कुछ दिन पहले सुबह-सुबह उनके घर का एक किवाड़ खुला देख कर मैं चला गया। उस्ताद एक तख्त पर ड्रार्इंगरूम में बैठे थे। कमरे का हीटर चल रहा था। वे नहा-धोकर प्रसन्न लग रहे थे। लखनऊ के अपने बाबा, चाचा, पिताजी अच्छन महाराज की तस्वीरें दिखाने लगे। उनका घर एक तरह का संग्रहालय है। उनकी इच्छा लखनऊ में एक कथक संग्रहालय बनाने की है। उसमें कथक से जुड़ी यादें रखने की उनकी योजना है। वे हाल ही में दिवंगत सितारा देवी की तस्वीरें, उनके घुंघरू-पाजेब, नृत्य-पोशाक भी उसमें रखना चाहते हैं। सितारा देवी उन्हें अपने घर का चिराग, बेटा और घर का खलीफा मानती थीं। आजकल ये मुहावरे पुराने पड़ गए हैं। हमारे लखनऊ में ये चलते थे।

उन्हें सरकार ने 1984 में पद्म विभूषण दिया था। उसकी तस्वीर खो गई है। उन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में तो है, पर वह उनके पास नहीं है। तमगा जरूर कहीं रखा है। उन्हें दुनिया ‘भारत रत्न’ मानती है, पर सरकार नहीं। सरकार इंतजार करती है, कलाकार के मरने का, वृद्ध और जर्जर होने का तब देगी। वे कहते हैं कि अभी जापान-मलेशिया-लंदन में प्रदर्शन करके लौटा हूं। जहां-जहां भी जाता हूं, लोगबाग कहते हैं कि आप तो ‘भारत रत्न’ हैं! सरकार दे या न दे। मैं नाचना थोड़े ही छोड़ दूंगा। मेरा काम, मेरी साधना और पूजा नाचना है। मैं नाचूंगा। दे या नहीं दें। पर समय रहते दे देते हैं तो अच्छा लगता है।

यह उत्साहवर्धक होता है। पंडितजी ने बैठकखाने को ही अपने सोने की जगह भी बना रखा है। उसी में पूजा करते हैं। लिखते-पढ़ते हैं। दीवान पर सोते हैं। वहीं एक टेबल-लैंप भी रखा है। ड्रार्इंगरूम में सीसीटीवी कैमरा लगा है। दीपक महाराज भी उनके साथ रहते हैं। वे भी कथक करते हैं। पंडितजी के लिए उस्ताद अल्ला रक्खा और उनके बेटे जाकिर हुसैन ने भी तबला बजाया है।

मैंने पंडितजी से चलते समय फोटो मांगा। उन्होंने कहा- ‘शाश्वती आएगी तो देगी।’ मैंने उसका इंतजार करना ठीक नहीं समझा और चला आया। उन्हें आज भी कई तरह के कैमरे, रेडियो, वीडियो कैमरे आदि इकट्ठा करने, खरीदने का शौक है। कथक नृत्य का लखनऊ घराना उनके घर का घराना है। उनका दिल्ली का घर भी संगीत-नृत्य का मंदिर है। इस फर्श ने कई घुंघरुओं की आवाज सुनी है। कई पैरों की थिरकन जानी है। संगीत की वे पदचापें सुनी-देखी हैं, जिनके लिए दुनिया तरसती है। पंडितजी के रियाज का पहला गवाह पहला स्वाद इस फर्श ने जाना है।

ये खिड़कियां, दीवारें और पेड़ उनकी कला के मर्म को जानते हैं। दिल्ली में भारतीय कला केंद्र में सरकार ने उन्हें कथक नृत्य सिखाने के लिए रखा था। हमारे बीच कुछ देर चुप्पी भी रही। मैं उन्हें देखता रहा।

दिल्ली में शाहजहां रोड पर रहने से पहले वे मातासुंदरी लेन की बैरक में रहते थे। वहीं उस्ताद अमजद अली खां भी रहते थे। भारत सरकार ने उन बैरकों को नृत्य, संगीत, साज आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ाने के लिए विकसित किया था। वहीं वे कथक की कक्षाएं लेते थे। कथक सम्राट बहुत अच्छे गायक भी हैं। उनके गाए गीत, भजन, गजलें, कजरी लोगों को अब भी याद हैं। पचहत्तर साल से ज्यादा उम्र में भी उनमें युवाओं जैसा जोश, उत्साह और लगन है।

 

राजेंद्र उपाध्याय

 

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