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आहार का चुनाव

विष्णु नागर हाल ही में शाकाहार के लाभों के बारे में श्रीश्री रविशंकर की एक टिप्पणी एक अखबार में छपी। रविशंकरजी का रुझान साफतौर पर हिंदुत्ववादी है, मगर वे इसे यहां-वहां से अच्छी तरह ढंकने की कोशिश करते हैं। इसलिए शाकाहार पर उनके इस लेख पर भी शक होता है कि कहीं यह उस विवाद […]

Author December 11, 2014 1:56 PM

विष्णु नागर

हाल ही में शाकाहार के लाभों के बारे में श्रीश्री रविशंकर की एक टिप्पणी एक अखबार में छपी। रविशंकरजी का रुझान साफतौर पर हिंदुत्ववादी है, मगर वे इसे यहां-वहां से अच्छी तरह ढंकने की कोशिश करते हैं। इसलिए शाकाहार पर उनके इस लेख पर भी शक होता है कि कहीं यह उस विवाद को हवा देने की एक चतुर कोशिश तो नहीं! वैसे न हर हिंदू, न हर हिंदुत्ववादी ही शाकाहारी है और न हर शाकाहारी या शाकाहार-समर्थक हिंदुत्ववादी है।

देश के आइआइटी और आइआइएम की कैंटीनों में शाकाहारी भोजन देने को एक मुद्दा बनाया गया था, जो अभी जीवित है। अभी संसद में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को इस बारे में सफाई देनी पड़ी कि आइआइटी को शाकाहारी और मांसाहार भोजन अलग-अलग बनाने के निर्देश नहीं दिए गए, बस एक सुझाव था। उधर कुछ समय पहले अंगरेजी साप्ताहिक ‘आउटलुक’ ने एक रिपोर्ट ‘मीट जिहाद’ शीर्षक से प्रकाशित की थी, जिसका सार यह था कि गुजरात और अन्यत्र हिंदुत्वादियों ने गोमांस बेचने के नाम पर मुसलमानों को परेशान किया; जिन ट्रकों में भैंस या बकरे ले जाए जा रहे थे, उन्हें भी पुलिस की मदद से रोका गया।

ध्यान रहे कि दशहरे पर संघ प्रमुख ने मांस निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही गायों की तस्करी पर रोक लगाने का आग्रह सरकार से किया था। संघ के अंगरेजी साप्ताहिक ‘आॅर्गनाइजर’ के पूर्व संपादक और अब भाजपा प्रवक्ता शेषाद्रिचारी के अनुसार मोहन भागवत चाहते हैं कि भैंसों तक का मांस खाना बंद किया जाना चाहिए, गाय ही नहीं, पूरे ‘गोवंश’ के मांस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। राजस्थान की भाजपा सरकार पहले ही ऊंटों के मांस पर प्रतिबंध लगा चुकी है। हालांकि वरिष्ठ वैज्ञानिक पुष्प एम भार्गव कहते हैं कि गाय और भैंस का वंश एक नहीं है। लेकिन हिंदुत्ववादी एजेंडे में जो आ गया, सो आ गया! उसका धर्म, इतिहास-विज्ञान किसी से कोई मतलब नहीं होता, क्योंकि उसका विशेष उद्देश्य अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति को हर तरह से हवा देना होता है।

याद आता है कि करीब तीन दशक पहले ‘दिनमान’ साप्ताहिक ने एक बहस छापी थी, जिसमें वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने शाकाहार के पक्ष में रविशंकरजी से ज्यादा मजबूत तर्क दिए थे। उधर मांसाहार के समर्थन में आहार विशेषज्ञों के अपने तर्क हैं, जिसे वे उस देश में जहां ज्यादातर लोग कुपोषण की समस्या से ग्रस्त हैं, प्रोटीन के लिए आवश्यक मानते हैं। इस बारे में किसी भी बहस में कोई भी अच्छा वक्ता दूसरे पक्ष को हराने में समर्थ है। यों शाकाहार या मांसाहार में से क्या बेहतर है, इसे सिद्ध करने का मामला है भी नहीं, क्योंकि इसकी जटिलताएं काफी दूर तक जाती हैं। यह सिर्फ स्वाद का मामला ही नहीं है। यह जरूरतों, उपलब्धता, परिस्थिति, धर्म, क्षेत्र और परंपरा से जुड़ा हुआ मामला भी है। जो खाना एक के लिए सुनने में भी असहनीय लगता है, वह दूसरे के लिए सहज-स्वाभाविक हो सकता है। जो एक के लिए अखाद्य है, वह दूसरे के लिए जीवन का अनिवार्य हिस्सा हो सकता है। आज जो शाकाहारी हैं और इस पर गर्वित भी हैं, वे अगर दूसरी परिस्थितियों, देश-प्रदेश में या किसी दूसरे धर्म के होते तो उनकी खाने की आदतें कुछ और ही हुई होतीं।

दरअसल, शाकाहार या मांसाहार न जाति बदलने जैसा असंभव मामला है और न धर्म बदलने जैसा मुश्किल। सभी व्यक्तिगत मामलों की तरह यह भी एक निजी मामला है। एक ही परिवार में, वह चाहे मुसलिम हो या हिंदू, इस तरह के विभाजन देखने को मिलते हैं। कुछ परिवारों में पुरुष आमतौर पर मांसाहारी होते हैं, मगर स्त्रियां शाकाहारी। यह मामला धर्म से जुड़ा हुआ भी नहीं है, क्योंकि भारत जैसे देश में सभी धर्मों में शाकाहारी और मांसाहारी मिलते हैं और कई अपने धर्म, जाति और संस्कारों से लड़ते हुए या परिस्थितवश शाकाहारी से मांसाहारी बन जाते हैं। संघ के लोग बड़े चुनिंदा ढंग से पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव की बात करते हैं, क्योंकि समग्रता में बात करना उनकी अपनी संस्कृति के विरुद्ध है, विजातीय है। यह भी नहीं कि शाकाहारी को पुण्य मिलता है और मांसाहारी को नरक या कि सारे शाकाहारी स्वस्थ होते हैं और सारे मांसाहारी अस्वस्थ। स्थायी या अस्थायी रूप से स्वस्थ या अस्वस्थ होने के कई-कई कारण होते हैं, जो दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं।

सच यह भी है कि अगर सारे देश पर मांस न खाने या गोमांस खाने पर प्रतिबंध लगाने की कभी कोशिश हुई तो विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए सारे देशवासियों को शाकाहारी बनाने की कोशिश हास्यास्पद है और एक फासिस्ट दिमाग की उपज है। यह बात मेरे जैसा एक ऐसा आदमी कहना चाहता है जो बचपन से शाकाहारी था, कुछ समय तक मांसाहारी रहा और फिर शाकाहारी हो चुका है पिछले दो दशकों से, जिसे अंडा खाना भी पसंद नहीं। गरमागरम आमलेट से जरूर कई लोगों को सुगंध आती होगी, उस गंध से उनकी भूख बढ़ती होगी, मगर क्या करूं अपना कि मैं उसे दुर्गंध की तरह सहता हूं!

 

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