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बेटी का समाज

अलका कौशिक टिंबा ने मेरे शहरी दर्प को उस रोज चकनाचूर कर दिया था। नगालैंड के आदिवासी समाज की नुमाइंदगी करने वाला टिंबा अपनी ‘बोलेरो’ गाड़ी में मुझे राजधानी कोहिमा से मणिपुर तक के सफर पर ले गया था। बातों-बातों में मैंने उसके नगा समाज में बेटी की हैसियत को जानने का जोखिम मोल लिया […]

Author December 19, 2014 10:00 PM

अलका कौशिक

टिंबा ने मेरे शहरी दर्प को उस रोज चकनाचूर कर दिया था। नगालैंड के आदिवासी समाज की नुमाइंदगी करने वाला टिंबा अपनी ‘बोलेरो’ गाड़ी में मुझे राजधानी कोहिमा से मणिपुर तक के सफर पर ले गया था। बातों-बातों में मैंने उसके नगा समाज में बेटी की हैसियत को जानने का जोखिम मोल लिया था। उसने पहले मेरे उत्तर भारतीय होने के गर्वबोध को बींधने का जैसे निश्चय कर लिया था। उसने कहा- ‘आपके यहां दफ्तर से घर लौटने पर शाम की गृहस्थी की जिम्मेदारी किसकी होती है? आप ‘ही’ की या आपके पति उसमें हाथ बंटाते हैं?’ मैंने ईमानदारी से उसे औसत हिंदुस्तानी घर की दास्तान बताई। कह नहीं सकती कि उसे हैरानी हुई या नहीं। उसने कहा- ‘अब हमारी सुनो मैडमजी! मैं जब शाम को घर जाता हूं तो हम पति-पत्नी मिल कर खाना पकाते हैं। बच्ची को मैं संभालता हूं और वह बाकी काम देखती है। फिर हम साथ टीवी देखते हुए खाना खाते हैं।’ अब अवाक होने की बारी मेरी थी, क्योंकि मैं शेष हिंदुस्तान के उस इलाके से तुलना कर रही थी, जहां नौकरीशुदा औरत चौगुनी जिम्मेदारी संभालती है और घर का पुरुष आमतौर पर आइपीएल या फीफा के मैच देखने में मशगूल होता है। पूर्वोत्तर की खोह में छिपा है जनजातीय नगालैंड और उसके ‘अपढ़’ आदिवासी टिंबा की गृहस्थी के समीकरण महानगर से कहीं ज्यादा आधुनिक और सुलझे हुए दिखते हैं।

कोहिमा की सड़कों पर से गुजरती स्कूली लड़कियों या नवयौवनाओं के फैशन देख कर आपको बार-बार खुद को यह बताना पड़ता है कि आप बांद्रा की फैशन स्ट्रीट पर नहीं हैं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के उस इलाके में हैं जो मुख्यधारा से लगभग कटा हुआ है। नगालैंड के नजारे दिखाने के बाद टिंबा मुझे कोहिमा की सड़कों से लगभग उड़ाते हुए मणिपुर के सेनापति जिले में दाखिल हो गया था। भारत की हृदयस्थली की धड़कनों से कहीं दूर बसे इस प्रदेश की आवाज दिल्ली के आसपास बहुत कम सुनाई देती है। शायद तब, जब वहां कोई उपद्रवी संगठन धमाका कर देता है या इरोम शर्मिला के उपवास के साल-दर-साल पूरे होते हैं। तब भी, जब वहां की मैरीकॉम देश का नाम रोशन कर रही होती हैं। बाकी बहुत कुछ इस पूर्वोत्तर के मुकुट-मणि का अनजाना ही है। लेकिन अगर मणिपुर से सीधे मुलाकात हो जाए तो उसका रूप निराला है।

इसी निरालेपन से संवाद के लिए हम इरोम शर्मिला और मैरीकॉम की सरजमीं पर पहुंच चुके थे। हाइवे के किनारे लगे बिलबोर्डों पर मैरीकॉम घंूसा ताने दिखने लगी थीं, अलबत्ता शर्मिला कहीं नहीं दिखीं! पूर्वोत्तर के राज्य उन तमाम कारणों से चर्चा में रहते हैं जो ‘खबरीली’ तो होती हैं, लेकिन यहां की जमीन, आबोहवा और फितरत के साथ न्याय नहीं कर पातीं। मणिपुर भी सुदूर-पूर्व में वक्त की गोद में छिटका, ठिठका हुआ ऐसा ही राज्य है। खूबसूरत सीधे बालों वाली युवतियां और अल्हड़ अंदाज में घूमते फैशनेबल युवाओं को देख कर नहीं लगता कि पूर्वोत्तर का यह राज्य मुख्यधारा से इतनी दूर है। अक्सर चटकीले पारंपरिक परिधानों में यहां का समाज बेहद सहज रूप में सामने आता है। किसी झरने, नल पर कपड़े धोते, सिर पर टंगी बांस की टोकरियों में जाने क्या-क्या ढोते हुए या पीठ पर बच्चों को बांध कर रास्ते नापती माएं अपनी धुन में जैसे कुछ गुनगुनाते हुए गुजर जाती हैं।

पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों की तरह मणिपुर में भी औरतों की सक्रियता ज्यादा है। वे घर की देहरी तक सिमटी नहीं हैं और राजधानी इंफल में तो इमा मार्केट (इमा, यानी मां या औरतों द्वारा चलाया जाने वाला बाजार) जैसे आर्थिक केंद्र की धुरी भी हैं। करीब तीन हजार इमाओं के इस बाजार पर औरतों का कब्जा है। इस बाजार में पुरुष खरीदार तो हो सकते हैं, लेकिन दुकानदार नहीं। पर्यटकों के लिए इस बाजार में आना और पारपंरिक मणिपुरी पोशाक में सिमटी औरतों को मांस-मछली, जीरा, नून-तेल से लेकर हस्तशिल्प तक की बिक्री करते देखना एक अलहदा अनुभव है। कहते हैं पिछले करीब पांच सौ वर्षों से इमा बाजार की परंपरा मणिपुर में कायम है। किस्म-किस्म के रंगों, गंधों से सराबोर इमा मार्केट में माताओं के स्नेह की इबारत को आसानी से पढ़ा जा सकता है। बाजार में एक तरफ लूडो की बिसात सजी थी। सोलह साल की युवती से लेकर सत्तर बरस की अम्मा तक गोटियां सरकाने में मशगूल थीं। पान की लाली ने हरेक के होंठ सजा रखे थे। नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर खूबसूरत मुस्कराहटों की ओट में एक मणिपुरी युवती पान बनाने में मग्न थी। यों उसके कत्थई रंग में रंगे दांतों को देख कर लगता नहीं था कि वह कुछ बेच भी पाती होगी!

अलसाई नदियों और खरामा-खरामा टहलकदमी करती लोकटक झील के इस संसार में औरत होने का दर्प कुछ बढ़ जाता है। और अगर आप उत्तर भारतीय हैं तो यकीनन इस अहसास को शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। हवाओं में खुलापन है, जनजीवन में एक खास किस्म की ईमानदारी है, उन्मुक्तता है, मगर जिंदगी को कहीं से भी विद्रूप नहीं बनाया है उसने। इस जमीन पर आकर कई ढर्रे टूटते दिखते हैं और कई तिलिस्म उखड़ कर चूर-चूर हो जाते हैं।

 

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