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स्मार्ट की महिमा

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: आजकल ‘स्मार्ट’ शब्द की सभी क्षेत्रों में खूब चर्चा हो रही है। ‘स्मार्ट’ शहर चुने जाने की बात भी जोर-शोर से की जा रही है। इससे क्या आशय है, यह तो इसे चलाने वाले ही जानें। मगर सामान्य बुद्धि और ज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि […]

Author September 29, 2014 10:56 AM

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: आजकल ‘स्मार्ट’ शब्द की सभी क्षेत्रों में खूब चर्चा हो रही है। ‘स्मार्ट’ शहर चुने जाने की बात भी जोर-शोर से की जा रही है। इससे क्या आशय है, यह तो इसे चलाने वाले ही जानें। मगर सामान्य बुद्धि और ज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि यह एक आदर्श शहर की परिकल्पना है। एक ऐसा शहर, जो साफ-सफाई, पर्यावरण, अनुशासन, कानून-व्यवस्था, जलवायु, आवागमन, यातायात, शिक्षा, चिकित्सा और आपसी सद्भाव की दृष्टि से उदाहरण पेश करने वाला हो। कुछ शब्द पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। ‘स्मार्ट’ ऐसा ही शब्द है।

ऐसी ही आदर्श स्थिति शायद उन लोगों के दिलो-दिमाग में भी होगी जो ‘स्मार्ट’ शब्द का उपयोग हर उत्पाद, वस्तु और कार्यप्रणाली के लिए करते नजर आते हैं। स्मार्ट फोन, स्मार्ट कार्ड के अलावा कॉलोनी, कार-स्कूटर, शिक्षा, इलाज, स्कूल से लेकर अस्पताल और आवागमन के साधन तक सब स्मार्ट। खाना भी लजीज होने के साथ-साथ पौष्टिक और होटल भी साफ-सुथरा और आकर्षक, यानी स्मार्ट। पर क्या एक साथ इतनी सुविधाएं और खूबियां किसी एक स्थान या वस्तु में मिलना संभव है? इसी उम्मीद में सब कुछ चल रहा है कि न जाने कब और कौन-सी योजना फलीभूत हो और जो मांगा या चाहा गया है, वह हो जाए। अगर आपने उनकी सलाह मान ली तो आपकी पसंद ‘स्मार्ट च्वाइस’ और आपका निर्णय ‘स्मार्ट’ और इस कारण आप ‘स्मार्ट’ व्यक्ति! पहले माना जाता था कि ‘स्मार्ट’, यानी तेज और सजग, अधिक काबिल, आकर्षक और सक्षम। पता नहीं आज अधिक ‘स्मार्ट’ होने का प्रयोग किस अर्थ में करते हैं। यों जब कोई कहे कि आप ज्यादा ‘स्मार्ट’ बनने की कोशिश कर रहे हैं तो यही माना जाएगा कि जरूरत से ज्यादा होशियार बन रहे हैं। पर सिर्फ ‘स्मार्ट’ शब्द का प्रयोग तो अनेक गुणों और शर्तों की संभावना व्यक्त करता है।

मार्केटिंग और प्रचार-प्रसार के इस दौर में ‘स्मार्ट’ शब्द का इस कदर और इतने जोर शोर से हर क्षेत्र में प्रयोग हो रहा है कि यह आज की जिंदगी में यह रच-बस गया है। सभी ओर और सभी क्षेत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन ‘स्मार्ट’ शब्द से भरे पड़े हैं। यह आज आम चलन में आ गया है और जो इसका मतलब और अर्थ नहीं समझते, वे भी धड़ल्ले से इसका उपयोग कर रहे हैं।

अंगरेजी साहित्य के आयरिश नाटककार बर्नार्ड शॉ ने अपने मशहूर नाटक ‘मेन ऐंड सुपर मेन’ में एक परिकल्पना की थी कि उत्तरोत्तर प्रगति के इस दौर में विज्ञान और तकनीक के सहयोग से एक समय ऐसा भी आएगा, जब महिला और पुरुष वर्तमान महिलाओं और पुरुषों के मुकाबले शारीरिक और बौद्धिक दृष्टि से बेहतर और अधिक काबिल होंगे। बच्चे अपने मां-बाप की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान और साहसिक होंगे। तो क्या यह माना जाए कि आज उसी लिहाज से सब कुछ ‘स्मार्ट’ होता जा रहा है? शहर, मोहल्ला, गली, घर और उसमें रहने वाले भी स्मार्ट। स्मार्ट कहलवाना या माना जाना अब सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता जा रहा है। अगर कोई आपके चपल बच्चे को देख कर कह दे कि बच्चा कितना स्मार्ट है तो यकीनन आपका दिल बाग-बाग हो जाएगा।

सच यह है कि स्मार्ट शब्द हवा-पानी में घुल गया है। ‘स्मार्टनेस’ सर्वव्यापी हो गई है। अब वह दुर्लभ नहीं रही। भला कौन चाहेगा कि पड़ोसी को तो स्मार्ट कहा जाए, पर उसे नहीं? अगर कोई कहे भी कि फलां व्यक्ति तो स्मार्ट है पर फलां नहीं तो जिसे स्मार्ट नहीं बताया जाएगा, वह आग-बबूला होकर जाने क्या कर बैठे! अब तो यात्राएं भी स्मार्ट होंने वाली हैं। पहले कष्टप्रद हुआ करती थीं। जब सब कुछ स्मार्ट हो जाएगा तो सुविधाएं भी स्मार्ट होंगी। आप किसी भी साधन से जाएं, सभी साधन स्मार्ट मिलेंगे। कम से कम विज्ञापनों में तो यह दावा किया ही जाएगा। हकीकत भले ही अलग हो। कुछ शब्द अपनी लोकप्रियता के कारण जुमले बन जाते हैं। ‘स्मार्ट’ आज जुमला बन चुका है। ऐसा हर समय और काल में होता है। आज भी हो रहा है और जो ‘स्मार्ट’ नहीं वह ‘डल’, यानी मंदबुद्धि या बुद्धू हुआ। खुद को यह उपाधि कौन दिलवाना चाहेगा! सभी अच्छा दिखना और कहवाना चाहते हैं। भले ही वे हों नहीं। लेकिन लोग उन्हें मानें, यह सभी की कामना होती है। आपने देखा भी होगा कि जो व्यक्ति जितना कमजोर होता है, वह उतना ही अकड़ कर चलता है। यह इंसानी कमजोरी है। इसलिए हम ‘स्मार्टनेस’ को स्वीकारें। कोई विकल्प भी तो नहीं है!

 

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