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संवेदना का पक्ष

उस रात दो-ढाई बज गए थे। विभागीय मित्र, रंगकर्मी और आकल्पक राहुल रस्तोगी और एक रंगकर्मी मित्र अनूप जोशी बंटी सहित हम कुछ लोग उज्जैन में कालिदास अकादमी परिसर में अखिल भारतीय कालिदास समारोह की मंच निर्माण की प्रक्रिया के साक्षी और सलाहकार थे। इस काम में तीन दिन से रोज ही सुबह चार बज […]

Author February 26, 2015 7:00 PM

उस रात दो-ढाई बज गए थे। विभागीय मित्र, रंगकर्मी और आकल्पक राहुल रस्तोगी और एक रंगकर्मी मित्र अनूप जोशी बंटी सहित हम कुछ लोग उज्जैन में कालिदास अकादमी परिसर में अखिल भारतीय कालिदास समारोह की मंच निर्माण की प्रक्रिया के साक्षी और सलाहकार थे। इस काम में तीन दिन से रोज ही सुबह चार बज जाते थे, मगर रुचि के काम और संवादों में समय का पता नहीं चलता था। उस दिन सुबह तक काम पूरा होना था। इधर मौसम भोपाल से उज्जैन तक एक जैसा ही था, पूरा दिन धुंध और गलाने वाली ठंड से भरा हुआ।

सामने मंच बन रहा था। महाकवि कालिदास की एक कृति से प्रेरित मंच की आभा सबको अच्छी लग रही थी। कुछ लोग जो अनौपचारिक रूप से अंदर काम देखने आ जाते थे, वे कहते थे कि शायद पिछले दस साल में ऐसा कलात्मक और बड़ा मंच नहीं बना। खैर, हम सबको चाय पीने की तलब लगी। कुछ देर पहले ही शहर का एक कथक सीख रहा छात्र उज्जैन में दो-तीन चाय की जगहें बता कर गया था, जहां चाय मिल सकती थी।

मैं, बंटी, राहुल और टेंट-मंच के काम को नियंत्रित कर रहे इस काम के व्यवसायी राजू कार से चाय खोजने चल पड़े। पहले गए रेलवे स्टेशन के पास। लेकिन दुकान बंद हो चुकी थी। शासकीय अस्पताल वाली दुकान खुली थी और चार-पांच लोग चाय की चुस्कियां ले रहे थे। दुकान मालिक पैसे लेने में लगा था, उसका एक आदमी सुबह के हिसाब से प्याज, धनिया, मिर्च कतरने में लगा था और एक दूसरा व्यक्ति चाय बना रहा था। कढ़ाई में रखे पोहे के भी ग्राहक थे। हमारे तीनों साथियों ने पोहा लिया। मैं केवल चाय पीना चाह रहा था, सो पहले ही चाय मांग लेने पर उसने सुत्तुलिया (छोटे पात्र को कानपुर मूल की हमारी मम्मी यही कहती हैं) में चाय दी। साधार प्लास्टिक का वह इतना छोटा ग्लास था जैसे खून की कमी वाले मरीजों को लिखे जाने वाले टॉनिक के ऊपर प्लास्टिक का ग्लासनुमा मापक ढक्कन होता है। उसे पीना शुरू करते हुए मैंने एक और बार पीने का मंतव्य मन ही मन दोहराया। मित्रगण अपना पोहा खत्म कर रहे थे।

इसी बीच एक कार से तीन व्यक्ति आकर रुके। उन्होंने पहले पोहा मांगा, बेहद गरीब से दिखने वाले नौकर ने तीनों को कागज में पोहा दिया। नौकर के कपड़े, दाढ़ी, उम्र और रंग उसकी दयनीयता को दर्शा रहे थे। इस बीच मैंने देखा कि होटल मालिक ने यह महसूस किया कि सेव और नींबू मांगने के बहाने वे तीनों व्यक्ति उस नौकर से बहुत खराब ढंग से पेश आ रहे हैं। उसके सजग होने पर मेरा ध्यान भी गया। उन लोगों ने पोहा खाकर चाय मांगी तो वह बात लगभग साबित हो गई। मैंने देखा कि होटल मालिक ने दृढ़ होकर तीनों को ललकार दिया और बोला कि भाई साहब बड़ी देर से देख रहा हूं, आप इस बूढ़े आदमी से बदतमीजी किए जा रहे हो। वे तीनों सकपकाए। पर होटल मालिक ने कहा- ‘क्या बहुत बड़ी तोप हो? यह गरीब आदमी मेरे यहां काम कर रहा है। आप जो कह रहे हो, यह कर रहा है, जो मांग रहे हो, दे रहा है। इससे ज्यादा क्या इसे अपना गुलाम समझ रखा है?’ वे तीनों आगे कुछ कह पाते, इसके पहले उसने आगे कहा- ‘आप कोई अहसान नहीं कर रहे, समझे? जितनी आप लोगों ने पी है, उतनी मैंने भी पी रखी है, तमीज में खाओ और जाओ।’

हम सभी इस दृश्य से दंग थे। यह छोटी-सी साधारण-सी चाय की दुकान का किस्सा है। जिस तरह दुकान मालिक अपने नौकर के पक्ष में आया, हम सब प्रभावित हुए बगैर न रह सके। चार ग्राहकों के सामने उन अशिष्ट लोगों की बेइज्जती हुई। शायद मर्यादा का व्यवहार सीख कर गए हों। दुकान मालिक को देख कर हम जरूर आपस में सोच रहे थे कि इसका तेवर वाकई ऐसा था कि बात बढ़ती तो झारा लेकर चार जमाता भी। हमें उस पर गर्व भी हुआ और बहादुरी पर हंसी भी आई। सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह थी कि जिस दीन-हीन नौकर के पक्ष में यह दृश्य खड़ा हुआ, वह बिल्कुल निरपेक्ष अपने काम में रत था, ग्राहकों को चाय और पोहा दे रहा था। यह बात शायद मैं कभी न भूल पाऊं! खासकर ऐसे वक्त पर जरूर याद आती रहेगी जब कहीं कोई सेठ, मालिक और साहब टाइप के लोग चार दूसरे साधारण लोगों के सामने अपने ही किसी आदमी की बेइज्जती करने लगते हैं!
सुनील मिश्र

 

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