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रिश्तों की डोर

शिबन कृष्ण रैणा जब यह तय हो गया कि तबादला निरस्त होने वाला नहीं है और दूसरी जगह जाना ही पड़ेगा तो हम पति-पत्नी सामान समेटने और बच्चों की टीसी निकलवाने, दूधवाले, अखबारवाले आदि का हिसाब चुकता करने में लग गए। पंद्रह वर्षों के सेवाकाल में यह मेरा चौथा तबादला था। यही वह स्थान था, […]

शिबन कृष्ण रैणा

जब यह तय हो गया कि तबादला निरस्त होने वाला नहीं है और दूसरी जगह जाना ही पड़ेगा तो हम पति-पत्नी सामान समेटने और बच्चों की टीसी निकलवाने, दूधवाले, अखबारवाले आदि का हिसाब चुकता करने में लग गए। पंद्रह वर्षों के सेवाकाल में यह मेरा चौथा तबादला था। यही वह स्थान था, जहां हम पूरे दस वर्ष जमे रहे। सारा सामान बंध चुका था। मैं रिक्शा लेने चला गया।

गरमी जोर की पड़ रही थी। ‘लालगेट’ पर एक रिक्शा मिला, जो ज्यादा पैसे मांग रहा था। मैं आगे बढ़ा। शायद ‘सुंदर विलास’ पर कोई रिक्शा मिल जाए। मैं ‘सुंदर विलास’ की तरफ बढ़ा और इसी के साथ मेरी याददाश्त दस वर्ष पीछे चली गई। मैं नया-नया आया था तब यह शहर एक छोटा-सा, सुंदर कस्बा लगा था। देखते ही देखते इस कस्बे ने चारों तरफ फैल कर अपने आकार को बढ़ा लिया। तब यहां रिक्शे नहीं चलते थे। बस स्टैंड से शहर तक तांगे चलते थे।
‘सुंदर विलास’ पहुंचा तो एक रिक्शेवाला मेरी तरफ आया। ‘बस स्टैंड चलोगे?’ ‘चलेंगे, बाबूजी।’
दस रुपए में सौदा तय हुआ। ‘बाबूजी, और सवारियां कहां से लेनी हैं?’

‘भई, दूसरे मोड़ पर, तहसील के पास सोनी-बंगले से।’ ‘सोनी-बंगला’ कहते ही मैं फिर अतीत में खो गया। शुरू में मकान न मिलने तक चार-पांच दिन के लिए मुझे एक धर्मशाला में रुकना पड़ा था। दफ्तर के सहयोगियों ने कहा था- तहसील के पास सोनीजी का बंगला है, चाहो तो उसमें कोशिश कर लो। सुना है बंगले का मालिक अपना मकान किसी को किराए पर नहीं देता। मैं उसी दिन दफ्तर से सीधे सोनी बंगला गया था। बंगले पर मेरी भेंट एक बुजुर्ग-से व्यक्ति से हुई थी, जिन्हें बाद में पूरे दस वर्षों तक मैं ‘बा-साब’ संबोधित करता रहा। बा-साहब ने छूटते ही पूछा था- ‘आप इधर के नहीं लगते हैं?’
‘जी हां, मैं बाहर का हूं। रोजगार के सिलसिले में इस तरफ आ गया हूं।’

‘ठीक है, आप कल शाम को आ जाना, मैं सोच कर बताऊंगा।’ अगले दिन जब शाम को मैं गया तो ‘बा-साब’ ने निर्णय मेरे पक्ष में दिया था। फिलहाल एक कमरा और रसोई और बाद में दो कमरे। यह समाचार ‘बा-साब’ की पत्नी ‘मां-साब’ ने परदा करते हुए मुझे दिया था। ‘बा-साब’ जवानी के दिनों में काफी मेहनती, लगनशील और जिंदादिल स्वभाव के रहे होंगे, यह उनकी बातों से पता चलता था। चांदी के जेवर, खासकर मीनाकारी का उनका पुश्तैनी काम था। काम वे घर पर ही करते थे और इसके लिए उन्होंने पांच-छह कारीगर भी रखे थे। यों उन्हें कोई कमी नहीं थी। बस, अगर कमी थी तो संतान की। इस अभाव को ‘बा-साब’ भीतर-ही-भीतर एक तरह से पी-से गए थे। चाहते तो वे खूब थे कि उनका यह अभाव प्रकट न हो, पर उनकी आंखों में उनके मन की पीड़ा जब-तब झलक ही पड़ती थी।

समय गुजरता गया और इसी के साथ मकान मालिक और किराएदार का रिश्ता सिमटता गया और उसका स्थान एक मानवीय रिश्ता लेता गया। वैसे, इस रिश्ते को बनाने में हम दोनों पति-पत्नी की भी खासी भूमिका थी, क्योंकि सुदृढ़ रिश्ते एकपक्षीय नहीं होते। उनकी नींव आपसी विश्वास और त्याग की भावनाओं पर आश्रित रहती है। पिछले आठ-दस वर्षों में यह रिश्ता नितांत सहज और आत्मीय बन गया था।

एक दिन ‘बा-साब’ मूड में थे। मैंने पूछ ही लिया था- ‘बा-साब, उस दिन पहली बार जब मकान के सिलसिले में मैं आपके पास आया था, तो आपने बिना किसी परिचय या जान-पहचान के मुझे यह मकान कैसे किराए पर दे दिया?’

बात को याद करते हुए बा-साब बोले थे- ‘आप यहां के नहीं थे, तभी तो मैंने आपको मकान दिया था। आपको वास्तव में मकान की आवश्यकता थी, यह मैं भांप गया था। अपना मकान मैंने आज तक किसी को किराए पर नहीं दिया, पर आपको दिया। इसलिए दिया, क्योंकि आपके अनुरोध में एक तड़प थी, एक कशिश थी, जिसने मुझे अभिभूत किया।’

बा-साब अब इस संसार में नहीं हैं। पिछले साल दमे के जानलेवा दौरे में उनकी हृदय-गति अचानक बंद हो गई थी। मेरी ही बाहों में उन्होंने दम तोड़ा था।
‘सोनी-बंगला आ गया साहब’, रिक्शेवाले की इस बात ने जैसे मुझे नींद से जगा दिया। नजर उठा कर देखा तो बंगले के गेट पर श्रीमतीजी, दोनों बच्चे और मां-साब खड़े थे। पड़ोस के लोग भी उनमें शामिल थे। मुझे लगा कि मां-साब मुझसे कुछ कहना चाहती है। मैं उनके निकट गया। मां-साब फफक-कर रो दीं: ‘मने भूल मती जाज्यो। याद है नी, बा-सा आपरी बावां में शांत विया हा।’ मैंने एक बार फिर मकान पर भरपूर नजर डाली। मां-साब को दिलासा देकर और सभी से आज्ञा लेकर हम लोग रिक्शे में बैठ गए। मानवीय रिश्ते भी कितने व्यापक और कालातीत होते हैं, मैं सोचने लगा।

 

 

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