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आमंत्रण का सम्मान

मृदुला सिन्हा जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हर व्यक्ति जीवन में कभी अभ्यागत तो कभी अतिथि की भूमिका में आता रहता है। आमंत्रण भेजने वाले से विनम्रता की अपेक्षा रहती है। हमारे समाज में विवाह या किसी और शुभ दिन के लिए भेजे गए आमंत्रण पत्र पर लिखा होता था- ‘भेज रहा हूं नेह निमंत्रण प्रियवर […]

Author September 24, 2014 12:43 PM

मृदुला सिन्हा

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हर व्यक्ति जीवन में कभी अभ्यागत तो कभी अतिथि की भूमिका में आता रहता है। आमंत्रण भेजने वाले से विनम्रता की अपेक्षा रहती है। हमारे समाज में विवाह या किसी और शुभ दिन के लिए भेजे गए आमंत्रण पत्र पर लिखा होता था- ‘भेज रहा हूं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को, हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को।’ इसे पढ़ कर भला किसका मन उस निमंत्रण को स्वीकार करने का नहीं होगा, भले ही संबंधों में कटुता हो! इस प्रकार के कई दोहे, श्लोक आमंत्रण पत्रों पर अंकित रहते थे। यह भी देखा जाता था कि बहुत दिनों की आपसी दुश्मनी भी विवाह आदि के अवसर पर दोस्ती में बदल जाती थी।

दरअसल, हर व्यक्ति अपने को मेहमान बनाने को इच्छुक तो रहता ही है। मुझे अपने एक बड़े भाई की स्मृति हमेशा ताजा रहती है। साठ वर्ष पूर्व का संस्मरण है। उनका विवाह नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने अपने जीवन में एक भी छोटे या बड़े उत्सव का आयोजन नहीं किया, जब वे किसी को निमंत्रित करते। लेकिन अपने आस-पड़ोस में किसी भी घर में कोई समारोह की तिथि तय होने पर वे अपने दरवाजे पर बैठे-बैठे उच्च स्वर में घोषणा करते- ‘मुझे क्यों कोई बुलाएगा! मैं तो किसी को बुलाने वाला हूं नहीं! मेरे रिश्तेदारों ने मेरा परिवार ही नहीं बनने दिया!’ इसके आगे वे गालियां भी उगलने लगते थे। यह सुन कर यज्ञकर्ता सबसे पहले उन्हें ही निमंत्रण दे आता था। आयोजन के दिन वे विशेष रूप से रूठ जाते थे। उनका मान-मनौव्वल होता था। सब जानते थे कि उनका वह व्यवहार अपने प्रति ध्यान आकर्षित करने का एक तरीका था।

गांव में शादी-ब्याह के समय मेहमानों में किसी न किसी के रूठने का एक चलन-सा था। मेजबान यह जानते हुए भी कि फलां मेहमान उसके बुलावे पर नहीं आएगा, उसे आमंत्रण भेजना नहीं भूलता था। विवाह के अवसर पर केवल आमंत्रण पत्र भेज देने से कोई नहीं आता था। विवाह के तीन-चार दिन पहले से कई प्रकार की रस्मों में भागीदारी के लिए महिलाओं को भी बार-बार ‘हंकार’ दिया जाता था। भोज के निमंत्रण के बाद भी जब तक जोर से आवाज नहीं दी जाती थी कि ‘विजो हुआ’, तब तक कोई भी भोज खाने नहीं आता था। भोज की पंगत में बैठ कर भी कभी-कभी खाने वाले रूठ जाते थे। कई लोग जानबूझ कर ऐसा करते थे, ताकि मेजबान के आयोजन में विघ्न पड़ जाए।

इस सब के बावजूद आमंत्रण पाने का एक अपना आनंद है। आमंत्रण देने और पाने वाले के बीच के संबंध में कहीं न कहीं पाने वाले का स्थान ऊंचा समझा जाता है। आमंत्रण देने वाला ‘आतिथेय’ और पाने वाला ‘अभ्यागत’ हो जाता है। आज स्थितियां बदल गई हैं। डाक से कार्ड भेज दिए जाते हैं। इधर नई दिल्ली में मैंने मेजबान द्वारा मोबाइल पर एसएमएस करके आमंत्रित करते हुए देखा। उसे भी नेह-निमंत्रण ही कहेंगे। सामाजिक आपसी संबंधों के अलावा, दो देशों और महादेशों के बीच भी आमंत्रणों का आदान-प्रदान होता है। गांव के आमंत्रण की चर्चा, रूठने-मनाने के कार्य, गांव-घर में ही संपन्न होते थे। दो देशों और महादेशों के बीच राष्ट्राध्यक्षों के आमंत्रणों की चर्चा दोनों देशों में होती है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री को अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा मिले आमंत्रण की बहुत चर्चा हुई है। स्वाभाविक रूप से भारतवासियों के मन में गौरव-भाव जगा है। हालांकि अमेरिका और भारत में दुश्मनी का वातावरण तो था नहीं, लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका ने कभी नरेंद्र मोदी के वीजा पर रोक लगा दी थी।

खैर, मेरे साथ एक दूसरी कठिनाई होती है। विभिन्न प्रकार की गोष्ठियों, सभाओं और मांगलिक आयोजनों पर जाने का निमंत्रण आता है। मैं अधिकतर को स्वीकार कर लेती हूं। मेरे एक मित्र कभी-कभी नाराज होते हैं। उनका कहना है कि सभी आमंत्रण स्वीकार करने के लिए नहीं होते। मेरा मानना है कि वह व्यक्ति सौभाग्यशाली है, जिसके पास कोई बुलावा आता है। वह व्यक्ति उससे भी बढ़ कर सौभाग्यशाली है, जिसके बुलावे पर लोग एकत्रित हो जाते हैं। मैं हमेशा कहती हूं कि मैं आज के हर आमंत्रण का सम्मान करती हूं। पता नहीं, कल ऐसी स्थिति हो जाए कि मुझे कोई बुलावा ही न भेजे। फिर कितना दुखद होगा समय! गंगोत्री भैया की तरह मैं चिल्लाऊंगी तो नहीं, न किसी को गालियां दूंगी। लेकिन मन न्योता पाने के लिए लालायित रहेगा। मैं सबको कहती हूं कि आमंत्रण का कभी अपमान नहीं करना। भारतीय समाज में इसीलिए अतिथि, देव की श्रेणी में आता है। वह आमंत्रित न भी हो तो क्या!

दरअसल, परिवार के एक व्यक्ति के नाम न्योता आने पर संपूर्ण परिवार हुलसित होता है। सवाल न्योते पर भोज खाने का नहीं, परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा का होता है। आखिरकार मनुष्य है तो सामाजिक प्राणी ही। किसी न किसी बड़े-छोटे माध्यम से सामाजिक पहचान प्राप्त करना उसकी भूख होती है।

 

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