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अजमेर में रज़ा

हर साल अपनी पहचान में कोई न कोई ऐसा प्रसंग छोड़ जाता है, जिससे उसकी यादें, उसकी क्रमिकता हमारे भीतर बनी रहती हैं। बीते वर्ष की प्रासंगिकता को मैं अपनी एक अनुपम उपलब्धि के लिए याद करूंगा। इसमें मेरी व्यक्तिगत संतुष्टि छिपी है। अक्सर कहा जाता है कि जब तक अजमेर के हिंदल वली गरीब […]
Author January 21, 2015 14:51 pm

हर साल अपनी पहचान में कोई न कोई ऐसा प्रसंग छोड़ जाता है, जिससे उसकी यादें, उसकी क्रमिकता हमारे भीतर बनी रहती हैं। बीते वर्ष की प्रासंगिकता को मैं अपनी एक अनुपम उपलब्धि के लिए याद करूंगा। इसमें मेरी व्यक्तिगत संतुष्टि छिपी है। अक्सर कहा जाता है कि जब तक अजमेर के हिंदल वली गरीब नवाज ख्वाजा-ए-ख्वाजगां हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि अपने दरबार में नहीं बुलाते, तब तक उनकी चौखट पर पहुंचना संभव नहीं है।

भारत लौटने के बाद बीते कुछ वर्षों से विख्यात चित्रकार सैयद हैदर रज़ा की अजमेर जाने की तीव्र इच्छा थी। वे मंदिर, मस्जिद और चर्च तो संभवत: हर सप्ताह जाते हैं, लेकिन कभी मक्का नहीं जा सके। उनसे किसी ने कहा कि अगर मक्का नहीं जा सके तो एक बार अजमेर जरूर चले जाइए। कभी उनके स्वास्थ्य, कभी मौसम और अन्य कारणों से रज़ा की यह यात्रा बार-बार टल रही थी। अलग-अलग मौकों पर कई बार वे वहां जाने की इच्छा बड़ी शिद्दत से जाहिर कर चुके थे। ऐसी कई शामें मैंने उनके साथ गुजारी थीं, जिनमें वे अजमेर जाने की ख्वाहिश जाहिर कर चुके थे। अक्सर उन शामों में वे अब तक वहां न जा पाने से व्यथित होते थे और मैं उन्हें अभी तक वहां न ले जा पाने से व्यथित होता था।

इन्हीं वर्षों के दौरान बीच-बीच में रज़ा के गिरते-बिगड़ते स्वास्थ्य के कुछ ऐसे अंतराल भी आए जब बार-बार उन्हें अस्पताल में भरती करना पड़ा। जहां अपने होश में डोलते हुए, दवाइयों के नशे में सोते-जागते हुए, अपनी तकलीफ में खुद को जैसे-तैसे संभालते-कराहते हुए, अपने पुरखों, गुरुओं और पत्नी की याद से खुद को निथारते हुए, अस्पताल में अपने कमरे की खाली दीवारों पर टंगे किसी शून्य को अपलक घूरते हुए, मौन और पानी से भरी अपनी लाचार आखों से हमें देखते हुए कई बार मैंने उनके विचलन को महसूस किया था। उनकी उम्मीद और उनका देखना एक हो गया था।

बीते वर्ष रज़ा की यह मुराद पूरी हो सकी। वे अजमेर जा सके। वहां जिआरत कर सके। इस बार वे जैसे ही अपने थोड़े होश और थोड़े जोश में थे, हमने उनके डॉक्टर से सलाह और अनुमति के बाद इस यात्रा पर उन्हें ले जाना तय कर लिया था। रज़ा की तबियत, उनकी कैफियत और उनकी स्थिति के हिसाब से यह एक सघन और संवेदनशील यात्रा थी। वे हवाई जहाज में नहीं बैठ सकते थे, हम उन्हें एक बस में ले गए। बस में रज़ा के साथ मैं, अशोक वाजपेयी और हम सबके सहयोगी संजीव चौबे थे।

दस घंटों की इस धीमी यात्रा में हम, समय से उन्हें भोजन, पानी और दवाइयां देते हुए, टूटी सड़क के धचकों से बचाते हुए, उनकी कमर और कंधों के इर्दगिर्द नर्म तकियों को फंसाते हुए, गरम कंबल और रजाई में उन्हें सर्दी से बचाते हुए, वे जब जागे तो उन्हें हंसाते हुए, जब उनींदे हुए तो उन्हें सुलाते हुए, कभी उनकी हथेली तो कभी घुटनों को सहलाते हुए, निर्विघ्न यात्रा की प्रार्थना दोहराते हुए, अपने संकल्प को आपस में संबल देते हुए, रात दो बजे अजमेर पहुंचे थे। अजमेर पहुंचने के बाद, रज़ा इतनी लंबी यात्रा की थकान के बावजूद बहुत उत्साहित थे। उनके उत्साह से हम भी उतने ही उत्साहित थे।
अगली सुबह, अपने साफ और सफेद वस्त्रों में रज़ा खिल रहे थे। दरगाह की सीढ़ियों पर वे कुछ देर अपनी आंखें मूंद कर, तल्लीन होकर बैठे गए थे। अशोक वाजपेयी खड़े-खड़े और मैं बैठे-बैठे उनके सुकून में डूब रहे थे। इस बीच शाह सैयद जकारिया गुर्देजी उन सीढ़ियों से हमें दरगाह के भीतर ले जाने, गरीब नवाज के दर्शन कराने के लिए आ गए थे। हम सब उनके पीछे-पीछे चल दिए थे।

मैं, गरीब नवाज की चादर को अपने सिर पर उठाए हुए, रज़ा के आगे-आगे दरगाह की ओर जाते हुए, उनके रास्ते से लोगों को थोड़ा हटाते हुए, उसकी देहरी तक पहुंचने से पहले उनसे थोड़ा पीछे होते हुए, दरगाह में उन्हें प्रविष्ट होते हुए देख रहा था। अपने रूहानी सहारों पर चलते हुए, हमारे कंधों पर टिकते हुए, बहुत धीमे-धीमे दरगाह के फर्श से अपने पैरों की रगड़ पर चलते हुए, खुद में कराहते और सराहते हुए, अपनी नजर वहां के एक-एक कोने पर दौड़ाते हुए, मन ही मन कलमा पढ़ते, अपने पूर्वजों को याद करते हुए, अपने मौन और अपने होश को साधते हुए, सीढ़ियों से दरगाह के फासलों को मिटाते हुए, गरीब नवाज की ड्योढ़ी पर रज़ा ने अपना माथा रख दिया था। उनके मुंह से एक ध्वनि निकली थी, उसमें रुदन था या हर्ष, इसका अंतर दरगाह की ड्योढ़ी पर झर गया था।

रज़ा ने अपनी पंखुड़ियों जैसी अंगुलियों से उस चादर को गरीब नवाज पर अर्पित कर दिया था। शाह सैयद जकारिया गुर्देजी ने, जिनके पूर्वजों ने कभी अकबर की जिआरत कराई थी, रज़ा की जिआरत करवा दी थी। रज़ा ज्यादा खुश थे या हम, कह पाना मुश्किल था।

अजमेर से लौट कर, इन दिनों उनका कमरा नए चित्रों से, उनके ओज से भरा पड़ा है। जल्द ही उनके इन चित्रों की तीन प्रदर्शिनियां तीन अलग-अलग शहरों में लगभग एक साथ शुुरू होने वाली हैं। उनके चित्रों का एक और नया अध्याय शुरू हो गया है। अब उनकी शारीरिक दुर्बलताओं को उनके आत्मिक सामर्थ्य ने सोख लिया है। उनका मौन मुखर हो गया है।

 

मनीष पुष्कले

 

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