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बालों का क्या

सूरज प्रकाश जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: तब राजीव गांधी जिंदा थे और प्रधानमंत्री थे। उन्हीं दिनों बाजार में अनूप तेल आया था, सिर पर बाल उगाने के शर्तिया इलाज के दावे के साथ। हालत यह थी कि अनूप तेल वाले हर शीशी के साथ एक कंघी मुफ्त देते थे। शायद उन्हें यही पता था कि […]

Author September 25, 2014 10:47 AM

सूरज प्रकाश

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: तब राजीव गांधी जिंदा थे और प्रधानमंत्री थे। उन्हीं दिनों बाजार में अनूप तेल आया था, सिर पर बाल उगाने के शर्तिया इलाज के दावे के साथ। हालत यह थी कि अनूप तेल वाले हर शीशी के साथ एक कंघी मुफ्त देते थे। शायद उन्हें यही पता था कि तेल लगाते ही रातों-रात बाल उग आएंगे तो आधी रात को आप कहां कंघी खोजते फिरेंगे! यह होती है आशावाद की चरम सीमा। कहा जाता है कि राजीव गांधी ने भी अपने खोए हुए बाल अनूप तेल की मेहरबानी से ही पाए थे! राजीव गांधी के जाने के बाद तो पता नहीं तेल का क्या हुआ, लेकिन तब से देश में गंजों की तादाद बहुत बढ़ गई है।

यों ज्यादातर लोगों को यही चिंता होती है कि गिरते बालों को कैसे रोकें और गिर चुके बालों को वापस कैसे पाएं। खासकर गंजे लोगों की इस स्थायी और सदाबहार चिंता को ध्यान में रखते हुए अब बाल उगाने, लगाने और सहलाने वाली बहुत-सी कंपनियां बाजार में उतर गई हैं। वे सभी गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने के लिए एक तरह से छटपटा रही हैं! उनसे कुछ लोगों का गंजापन देखा नहीं जा रहा! लेकिन लोग हैं कि उन्हें अपने सिर पर हाथ ही नहीं धरने दे रहे और उनका सारा धंधा चौपट कर दे रहे हैं। इन कंपनियों का बस चले तो गुस्से में सारे गंजों के भी बाल नोच लें, लेकिन संकट यही है कि बहुत सारे लोगों के सिर पर बिल्कुल ही बाल नहीं है और बाल लगवाने के लिए वे तैयार नहीं हैं!

अब बाजार में एक नई कंपनी आ गई है। वह गिन कर बाल बेच रही है। पचहत्तर हजार रुपए में तीन हजार बाल। यानी लगभग ढाई सौ रुपए का एक बाल। यों कंपनी ने यह नहीं बताया है कि बाल किससे उतार कर आपको लगाए जा रहे हैं और कि ढाई सौ रुपए के एक बाल की औसतन लंबाई क्या होगी। वारंटी और गारंटी के बारे में भी वे चीनी कंपनियों की तरह खामोश हैं। यों, जिसके सिर पर लाखों बाल हों उनके लिए यह गणित बेकार है, लेकिन जिसके सिर पर एक भी बाल न हो या गिने-चुने बाल हों, उनके लिए एक-एक बाल की कीमत मायने रखती है। यों भी, यह कंपनी बाल खरीदने की नहीं, बाल बेचने की बात कर रही है।

जरा सोचिए, गंजे लोगों के कितने अच्छे दिन आ गए। जेब में जहां ढाई सौ रुपए आए, बाल क्लीनिक के आगे लगी कतार में जाकर खड़े हो जाएंगे कि यहां कान के ऊपर या बार्इं तरफ या दार्इं तरफ एक लंबा-सा बाल टांक दो! हो सकता है, एक-एक बाल लगवाने के इच्छुक गंजों की लंबी कतारें देख कर कंपनी खुश होने के बजाय यह शर्त ही रख दे कि कम से कम दस बाल लगवाने वाले ही कतार में खड़े रहें और बाकी कतार छोड़ कर चले जाएं और तभी कतार में वापस आएं जब उनकी जेब में दस बाल लगवाने लायक पैसे हों।

पुराना मुहावरा है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जब एक-एक बाल के दिन आएंगे तो नया बाजार विकसित होगा। बाल-ऋण मिलना शुरू हो जाएगा, आसान दरों पर। जब एक-एक बाल की कीमत चुकाई जाएगी तो उनकी देखभाल भी जरूरी हो जाएगी। तय है बाजार में बाल बीमा कंपनियां भी आ जाएंगी जो ‘शर्तें लागू’ का बड़ा-सा बोर्ड लगा कर एक-एक बाल का बीमा करेंगी। बाजार में इस नए उत्पाद के आने से भाषा भी समृद्ध होगी ही। नए मुहावरे बनेंगे और पुराने मुहावरे नए अर्थ ग्रहण करेंगे। पहले मुहावरा था- ‘अंधा क्या चाहे, दो आंखें’, अब नया मुहावरा बनेगा- ‘गंजा क्या चाहे, दो बाल।’ अब बाल खरीद कर लगवाने वाला आदमी आंधी, तूफान, झगड़े फसाद या कोई भी संकट आने पर सबसे पहले अपने बाल बचाएगा। अब यही कहेगा- ‘बाल है तो जहान है!’ अब लोग किसी गंजे की हैसियत बताते समय कहा करेंगे- ‘उसकी दस हजार बाल खरीदने की हैसियत है! उसे छोटा-मोटा मत समझें!’

मेरे एक चाचा गंजे हैं और विग लगाते हैं और उसे लेकर बड़े सतर्क रहते हैं। एक दिन एक छोटे टेबल पर चढ़े दीवार पर कील ठोंक रहे थे। संतुलन बिगड़ा और धड़ाम से नीचे आ गिरे। गफलत में विग भी अलग हुई और पहनी हुई लुंगी भी। कहने की जरूरत नहीं कि पहले उन्होंने विग ही संभाली थी। अब वे भी शान से बाल लगवा सकते हैं। तय है कि आने वाले दिनों में गिन कर बाल खरीदने वाले भी अपनी दुकानें खोलेंगे ही। मुझे तो उन्हीं का इंतजार है। जब भी पैसों की जरूरत हुई, एटीएम जाने के बजाय वहीं जाके कतार में लग जाएंगे!

 

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