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दुनिया मेरे आगेः परिवार की संवेदना

संयुक्त परिवार में सदस्यों का एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारियों के कर्तव्यबोध का अहसास बखूबी होता है। घर में बुजुर्गों के प्रति आदर और सम्मान का भाव दृष्टिगोचर होता है। परिवार के जरूरी निर्णय में बड़े बुजुर्गों से सलाह-मशविरा करने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है। परिवार के सभी सदस्य उनकी इज्जत करते हैं और उन्हें कोफ्त में रोटी तोड़ने वाला भी नहीं माना जाता है।

Author Published on: January 29, 2020 2:43 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (pixabay.com)

कुंदन कुमार

समाज के निर्माण की नींव व्यक्ति है। व्यक्ति ही वह आधार है, जिस पर समाज की संरचना टिकी हुई है। इसलिए मानवीय स्वभाव भी सामाजिक परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है। पश्चिम के इतिहास में मानव स्वभाव का प्रथम अध्ययन यूनानियों द्वारा किया गया और उन्होंने ही सबसे पहले यह स्थापित किया कि मनुष्य समाज में रह कर अपना विकास कर सकता है। मनुष्य की विकास अवस्थाओं में समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान है। समाज में ही मानव का समाजीकरण होता है और समाज द्वारा मनुष्यों को मानवीय गुणों की शिक्षा या फिर अपराधी वृत्तियां मिलती हैं। मनुष्य और समाज के संबंधों को स्पष्ट करते हुए अरस्तू ने कहा था कि ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।’

सभी धर्मों, संप्रदायों, जाति और वर्गों के लोग समाज के अभिन्न हिस्से हैं। समाज में लोग एक दूसरे से भावनात्मक लगाव महसूस करते हैं और एक दूसरे के क्रियाकलापों से प्रभावित होकर उनके अच्छे व्यवहारों और सामाजिक गुणों का अनुसरण करते हैं। परिवार समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है। कुछ समाजशास्त्रियों ने परिवार को संयुक्त और एकल परिवार के रूप में वर्गीकृत किया है। संयुक्त परिवार में सभी लोग एक साथ रहते हैं। एक ही रसोई का बना खाना खाते हैं और उनकी एक सामान्य संपत्ति होती है। दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और भाई-बहन, सभी एक साथ संयुक्त रूप से आपस में सुख-दुख बांटते हैं। सभी भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़े होते हैं और परिवार के किसी सदस्य के व्यक्तिगत दुख को आपस में बांट कर उसके निदान का सामूहिक प्रयास करते हैं।

एक करीबी मित्र बचपन से संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा। समय आने पर उसकी शादी हुई और अगले पांच वर्षों के भीतर वह दो बच्चों का पिता बन गया। जब उसे अपने परिवार के भरण-पोषण की चिंता सताने लगी तो वह जीविकोपार्जन के लिए घर से दूर परदेश चला गया, लेकिन परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं भूला। जब भी वह घर आता तो अपने सभी परिचितों से मुलाकात करता और अपने बच्चों के साथ अपने ही परिवार के अन्य बच्चों के लिए खिलौना, मिठाई और कपड़े लाता! दुखद यह था कि एक सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। उसके परिवार और बच्चों पर मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा। चूंकि वह संयुक्त परिवार से था, इसलिए उसके माता-पिता और अन्य भाइयों ने उसकी पत्नी का खयाल रखा और उसके बच्चों की परवरिश की। अगर संयुक्त परिवार की जगह उसके परिवार का स्वरूप एकल होता तो फिर उसकी पत्नी के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी होतीं।

संयुक्त परिवार में सदस्यों का एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारियों के कर्तव्यबोध का अहसास बखूबी होता है। घर में बुजुर्गों के प्रति आदर और सम्मान का भाव दृष्टिगोचर होता है। परिवार के जरूरी निर्णय में बड़े बुजुर्गों से सलाह-मशविरा करने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है। परिवार के सभी सदस्य उनकी इज्जत करते हैं और उन्हें कोफ्त में रोटी तोड़ने वाला भी नहीं माना जाता है। दरअसल, संयुक्त परिवार में बुजुर्गों का किरदार एक चौकीदार का होता है।
यों भी जिस परिवार में दादा-दादी रहते हैं, उसमें बच्चे बहुत जीवंत होते हैं। मैं अपने बचपन में हमेशा अपनी दादी की ममता के आंचल के साए में रहता था। चूंकि हमारा परिवार संयुक्त था, इसलिए हम सभी भाई-बहन आपस में एक साथ बैठ कर पढ़ते थे।

जैसे ही पढ़ाई खत्म होती थी, हम लोग दादी की गोद में चले जाते थे और उनसे कहानियां सुनने की जिद करते थे। दादी बड़े चाव से हमें कहानियां सुनाती थीं, जिसमें राजा-महाराजाओं की लौकिक कहानियों से लेकर चोर-डाकू की दुर्दांत कहानियां शामिल होती थी। पशु-पक्षियों की रोचक कहानियां सुन कर कभी-कभी मेरा बाल मन यह कल्पना करने लगता था कि अगर मैं भी बंदर होता तो कितना मजा आता या फिर अगर मैं पक्षी होता तो उड़ कर स्कूल चला जाता। एकल परिवार में वांछित प्यार नहीं मिल पाने की वजह से बच्चों का मानसिक विकास व्यापक स्तर पर नहीं हो पाता है। कई बार वे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और अपना अकेलापन दूर करने के लिए इंटरनेट या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के प्रभाव में बचपन में ही आ जाते हैं जो उनके बचपन की सुंदरता को धीरे-धीरे लील जाता है।

आज के भौतिकवादी युग और उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारे पारिवारिक स्वरूप पर गहरा चोट किया है। आधुनिकता की चकाचौंध में संयुक्त परिवार एकल परिवार में परिवर्तित होता जा रहा है, जिसका प्रभाव लोगों की जीवनशैली में दिख रहा है। भारत में प्राचीन काल के किसी संदर्भ में वृद्ध आश्रम का उल्लेख शायद नहीं रहा होगा। एकल परिवार के अस्तित्व में आने की वजह से आए दिन भारत में वृद्ध आश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिस मां-बाप ने लाख दुश्वारियों का सामना करते हुए हमें समाज में अपना महत्त्वपूर्ण किरदार अदा करने लायक बनाया, वृद्ध और असहाय होने पर उन्हें परिवार और अपनों से दूर परेशानियों का सामना करने के लिए वृद्ध आश्रम में छोड़ आना कहां तक सही है?

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