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नेहरू का नायकत्व

अशोक लाल जनसत्ता 13 नवंबर, 2014: मुझे नहीं पता कि नेहरूजी की छाती कितनी चौड़ी थी! तब हमारे नेता अपनी पहलवानी की डींगें नहीं मारा करते थे। मुझे बस यह मालूम है कि नेहरूजी का सीना बहुत चौड़ा था और उनकी बांहें बहुत लंबी, जिनमें, बकौल कैफी आजमी, दुनियाभर के सारे लोग सिमट आए थे। […]

अशोक लाल

जनसत्ता 13 नवंबर, 2014: मुझे नहीं पता कि नेहरूजी की छाती कितनी चौड़ी थी! तब हमारे नेता अपनी पहलवानी की डींगें नहीं मारा करते थे। मुझे बस यह मालूम है कि नेहरूजी का सीना बहुत चौड़ा था और उनकी बांहें बहुत लंबी, जिनमें, बकौल कैफी आजमी, दुनियाभर के सारे लोग सिमट आए थे। राजनीति, सही और गलत की समझ बचपन में नहीं थी। यह पता था कि हम आजाद देश में रहते हैं। हालांकि छोटे-से कस्बे में हमारे घर की रसोई में ‘सकरे-निखरे’ की बात होती थी। कभी ऊंची-नीची कही जाने वाली जाति का जिक्र नहीं होता था। न हिंदी-उर्दू में फर्क मालूम था, न हिंदू-मुसलमान में। मगर हम उर्दू-संस्कृति के ‘आप’, ‘जी हां’ और ‘शुक्रिया’ के पक्षपाती थे। घर के बाहर कथित ऊंची और निचली जातियों या हिंदू-मुसलमानों में फर्क की बात सुनते थे तो हमसे कहा जाता था कि नेहरूजी सब ठीक कर देंगे। अब जाकर समझा कि हमारी आजाद-खयाली एक तरह से ‘ब्रेन-वाशिंग’ थी। हमारे भ्रम धीरे-धीरे टूट रहे थे। कॉलेज में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हम जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सच पूरे विश्वास से कहते थे। फिर अलग-अलग दशकों में जो मंजर देखने को मिले, मसलन, आपातकाल, 1984, बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और उसकी लहर में उठे दंगे, गुजरात 2002 का जनसंहार- उन सबसे हमारे विश्वास घायल हुए, मगर उम्मीद बनी रही।

मैं अटल बिहारी वाजपेयी को भगवे रंग का ही नेता मानता रहा हूं। उन्होंने तिरंगा सिर्फ सत्ता पाने के लिए ओढ़ा था। लेकिन नेहरूजी की मौत पर उन्होंने कहा था- ‘भारत माता रो रही है, क्योंकि उसका लाड़ला राजकुमार सो गया है! मानवता उदास है, क्योंकि उसका दास और पुजारी हमेशा के लिए विदा हो गया है। पंडितजी के जीवन में हमें वाल्मीकि की कथा की झलक देखने को मिलती है- राम की झलक मिलती है। शख्सियत में ऐसी ताकत, दिमाग की ऐसी झंकार और आजाद-खयाली, अपने रकीब और दुश्मन को दोस्त बना पाने का गुण! वह सज्जनता, वह महानता- शायद भविष्य में कभी देखने को न मिले!’ लेकिन हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक और भाजपा के सदस्य ने कहा कि गोडसे को नेहरू को मारना चाहिए था, न कि गांधी को! ऐसा उन्होंने शायद इसलिए कहा कि आज भी नेहरू का साया ‘हिंदू राष्ट्र’ के आड़े ज्यादा आता है।

देश को कांग्रेस-मुक्त और संघ-युक्त करने के लिए नेहरू की विरासत को किसी तरह इतिहास के मलबे में दफ्न करना जरूरी है। 2002 में अपनी वीरता और छप्पन इंच की छाती के सबूत देने वाले ‘हीरो’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही रही है। उसने नेहरू को अकेला घेरने के लिए इतिहास के गवाह और दो मजबूत हमराहियों- गांधी और पटेल- से अलग करना शुरू किया। विज्ञापन और मीडिया के इस कागजी ‘हीरो’ ने गांधी को एक झाड़ू में तब्दील कर दिया। काश यह ‘हीरो’ उस आईने से धूल हटा सके, जिसमें वह अपनी झूठी छवि को निहारता रहता है। काश, उसमें ऐसी शक्ति आ जाए कि वह अपने ‘सच’ से आमना-सामना करके उनसे प्रयोग कर सके, जैसा गांधी ने किया था, ताकि उसे पता चले कि स्वच्छता के अभियान का पहला कदम है खुद अपनी अंदरूनी सफाई। सफाई से गांधी का मतलब फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू उठाना नहीं था, बल्कि समाज में फैली ऊंच-नीच को हटाना था। वह किसी को ‘म्लेच्छ’ मान कर उसे समाज-निकाला देने के कायदे के खिलाफ लड़ाई थी।

‘हीरो’ को मालूम है कि वह पटेल की कितनी भी बड़ी मूर्ति क्यों न बना दे, पटेल की ऊंचाई नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाले एक साथी से ज्यादा ऊंची नहीं हो सकती। वह चाहे कुछ भी कर ले, लेकिन इतिहास के उस पन्ने को नहीं फाड़ सकता जिसमें लिखा है कि गांधी के हत्यारे परिवार को कुचल देना चाहिए। नेहरू ने उस ‘परिवार’ से न जाने क्यों इंसानियत की उम्मीद की और उसे जिंदा रहने दिया!

बिना हजारों-करोड़ों रुपए खर्च किए, बिना मीडिया को खरीदे, तमीज के घेरों से बाहर और तंजिया संवाद बोले बगैर नेहरू ने अपने तीनों चुनावों में कागजी शेर से कहीं ज्यादा सीटें हासिल कीं। 1949 में जब नेहरूजी पहली बार अमेरिका गए तो हजारों अमेरिकी उनसे बातचीत करने के लिए बेताब रहे। बर्कले विश्वविद्यालय में दस हजार लोगों ने उनका भाषण सुना। 1962 के चुनाव से पहले जेआरडी टाटा ने नेहरूजी को लिखा कि वे चुनाव में स्वतंत्र पार्टी को भी चंदा देना चाहते हैं। नेहरूजी ने कहा कि अगर वे ऐसा करना ठीक समझते हैं तो जरूर करें। वाजपेयी ने कहा था कि ‘नेहरूजी समझौतों से झिझकते नहीं थे, मगर किसी भी दबाव में समझौता नहीं करते थे।’ अगर आज हम विज्ञान और तकनीक में दुनिया से आंखें मिलाने के लिए तैयार हैं या हमारे देश में सीएसआरइ, आइआइटी, आइआइएम, इसरो और बार्क जैसी संस्थाएं हैं तो नेहरू के कारण, गणेश को ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग की मिसाल’ मानने वालों की वजह से नहीं।

नेहरूजी का साया कितना भी महीन क्यों न हो, लोगों की नजरों में वक्त का गुबार क्यों न छा गया हो, जीतेगा ऐतिहासिक सच ही, जो देश के डीएनए का हिस्सा है।

 

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