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मेरे तीन डर

राजकिशोर जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: एक भेद की बात बताना चाहता हूं, हालांकि बात फैल गई, तब भी मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। दरअसल, भेद की बातें वही होती हैं, जिन्हें सब जानते हैं। भेद की बात का दूसरा नियम यह है कि किसी को बताने के बाद उससे कहिए कि किसी और को मत […]

Author November 12, 2014 1:08 PM

राजकिशोर

जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: एक भेद की बात बताना चाहता हूं, हालांकि बात फैल गई, तब भी मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। दरअसल, भेद की बातें वही होती हैं, जिन्हें सब जानते हैं। भेद की बात का दूसरा नियम यह है कि किसी को बताने के बाद उससे कहिए कि किसी और को मत बताइगा, तो अगले दिन वह बात पूरे शहर में फैल जाएगी। स्त्रियों के बारे में यह एक प्रचलित धारणा है कि उनके पेट में पानी नहीं पचता, इसलिए उन्हें कोई भेद की बात बतानी नहीं चाहिए। इससे मैं सहमत नहीं हूं। मेरी धारणा है कि स्त्रियों के पेट में इतनी और इतनी तरह की सच्चाइयां पड़ी रहती हैं कि वे सामने आ जाएं, तो शरीफ शब्द का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा।

भेद की बात यह है कि धरती पर मैं तीन चीजों से डरता हूं। इनमें पहली चीज है रफ्तार। हर तेजी से भागती हुई चीज मुझे डराती है। हर क्षण ऐसा लगता है कि दुर्घटना हो जाएगी। अगर उस तेज गति से भागने वाली चीज में मैं बैठा हुआ हूं, तो डर के मारे कांपता रहता हूं। विमान में बैठता हूं, तो यह दहशत कभी मेरा साथ नहीं छोड़ती कि विमान कभी भी गिर सकता है। रेलगाड़ी कभी भी किसी और रेलगाड़ी से टकरा सकती है।

यह सच है कि सड़क या हवाई दुर्घटनाएं कुल यात्राओं का एक प्रतिशत भी नहीं हैं- सामान्यतया कोई टकराता नहीं है, सब कुछ सुरक्षित रहता है, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि उस अभागे एक प्रतिशत से भी कम में मैं नहीं होऊंगा? मैं मृत्यु से नहीं डरता, पर फालतू में हुई मौत को दुर्घटना नहीं, हत्या मानता हूं। जब दुर्घटनाओं के पैटर्न को देखते हुए हम अनुमान कर सकते हैं कि अगले साल कम से कम इतने व्यक्तियों की मृत्यु हो सकती है, तो हम क्यों नहीं ऐसा कार्यक्रम बनाते कि इन संभावित मौतों को रोका जा सके? जरूर सभी यह जानते हैं कि स्पीड पर आधारित सभ्यता में दुर्घटना अपरिहार्य है।

दरअसल, इतनी रफ्तार के लिए आदमी बना ही नहीं है। आदिम अवस्था में कोई भाग मिल्खा भाग नहीं था- चीते या हिरन की रफ्तार मिल जाए, यही बहुत है। बाद में आविष्कार पर आविष्कार करते हुए हमने पैरों की शक्ति को विदा कर दिया और उड़नछू के साधनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हम प्रकृति का विस्तार कर सकते हैं- मसलन डंडा लेकर हाथ की लंबाई बढ़ा सकते हैं और दूरबीन से उससे ज्यादा दूर तक देख सकते हैं, जितना प्रकृति चाहती है कि हम देखें। लेकिन मनुष्य सृष्टि की तरह अनंत या सीमाहीन नहीं है। इसलिए हमें अपनी चादर से बाहर पैर नहीं फैलाना चाहिए। नहीं तो कुछ न कुछ बुरा अवश्य होगा। अपनी सीमा में नहीं रह कर कोई भी चीज मानवता का शत्रु हो जाती है।

कुत्तों से डर के बारे में क्या कहूं। आज तक किसी कुत्ते ने मुझे काटा नहीं है, लेकिन ऐसा कोई नियम नहीं है कि जो अब तक घटित नहीं हुआ है, वह आगे भी नहीं होगा। मैं कुत्ते से बचा रहा हूं, पर मैं ऐसे कई व्यक्तियों को जानता हूं, जिन्हें दो बार कुत्ता काट चुका है। कुत्ता हमारे मुहल्ले का हो, हमें जानता हो, दुम हिलाते हुए मेरे पास आना चाहता हो, तब भी मैं डर के मारे कांपने लगता हूं। मुझे दुनिया के किसी भी कुत्ते पर विश्वास नहीं है। कुत्ते की वफादारी के किस्से सुन कर मेरी आंखों में पानी नहीं, खून में उबाल आने लगता है। पालतू कुत्ता यानी परिवार के तीन-चार सदस्यों से लगाव और बाकी दुनिया से दुश्मनी। वफादारी एक अच्छा गुण है, पर वफादारी का मतलब यह नहीं है कि आप जिसके प्रति वफादार हैं, उसे छोड़ कर सारी दुनिया को शत्रु समझने लगें।

और अब पुलिस। भारत में कोई चीज सबसे ज्यादा रहस्यमय और एकदम खुली हुई है, तो वह है पुलिस। पुलिस क्या करती है और क्या-क्या कर सकती है, इसका बहुत नगण्य हिस्सा ही हम जानते हैं। किशोरावस्था तक मैं पुलिस से बिलकुल नहीं डरता था। उन दिनों मैं समाजवादी साहित्य बहुत पढ़ा करता था। लेकिन जब पुलिस की कू्ररता के एक से एक किस्से पढ़ने और सुनने को मिले, तभी से कोई भी पुलिसमैन मेरी तरफ आता है, मेरी तरफ देखता या मेरे साथ चलता है, तो किसी अनाम डर से भर जाता हूं। पुलिस डंडा पहले चलाती और संवाद बाद में करती है। पुलिस से मेरा डर खत्म हो जाए, अगर पुलिस को किसी ऐसी संस्था के प्रति उत्तरदायी बना दिया जाए, जो सरकार की मातहत न हो। अभी पुलिस उतनी ही स्वतंत्र है जितने अपराधी। दोनों में फर्क बस यह है कि अपराधी की शिकायत पुलिस से की जा सकती है, मगर पुलिस अपराध करे, तो उसके खिलाफ शिकायत कहीं भी नहीं की जा सकती।

 

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