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साफ सफाई

विजय विद्रोही जनसत्ता 8 अक्तूबर, 2014: मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत गांधी जयंती के दिन की। बहुत कम लोगों को पता है कि आज से सौ साल पहले गांधीजी ने मंदिरों और शहरों में फैली गंदगी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। छह फरवरी, 1916 को गांधीजी बनारस गए थे। मौका था […]

Author October 8, 2014 9:48 AM

विजय विद्रोही

जनसत्ता 8 अक्तूबर, 2014: मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत गांधी जयंती के दिन की। बहुत कम लोगों को पता है कि आज से सौ साल पहले गांधीजी ने मंदिरों और शहरों में फैली गंदगी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। छह फरवरी, 1916 को गांधीजी बनारस गए थे। मौका था काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस का। मंच पर कांग्रेस की नेता एनी बेसेंट, विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय और दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह बैठे हुए थे। तब गांधीजी ने अपने भाषण से सबको चौंका दिया था। उनका कहना था ‘‘…कल मैं बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए गया था… जिन गलियों से मैं जा रहा था उसे देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि अगर कोई अजनबी इस महान मंदिर में अचानक आ जाए तो हिंदुओं के बारे में वह क्या सोचेगा। अगर वह हमारी निंदा करेगा, तो क्या वह गलत होगा? इस मंदिर की जो हालत है क्या वह हमारे चरित्र को नहीं दिखा रही…।’’

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अंगरेज तो चले गए, लेकिन हमारे शहर उसी तरह गंदे हैं, जैसे कि गांधीजी के समय थे। कुछ दिनों पहले बनारस जाना हुआ तो देखा कि काशी साफ-सफाई के लिहाज से सुधरी नहीं है। अलबत्ता यहां के सांसद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से नगर प्रशासन का ध्यान साफ-सफाई की तरफ जरूर गया है, लेकिन अभी बहुत काम होना बाकी है। हो सकता है उस समय महात्मा गांधी ने ये बातें इसलिए कहीं, क्योंकि धार्मिक नगरी की गंदगी उन्हें बर्दाश्त नहीं हुई। फिर चूंकि वे यूरोप और दक्षिण अफ्रीका में रह चुके थे, वहां की साफ-सफाई की संस्कृति से प्रभावित थे, इसलिए काशी की गंदगी उन्हें अखर रही थी। गांधीजी 1916 से पहले 1903 में भी काशी गए थे। तब उनका वैसा नाम नहीं था।

उस समय काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा के बाद उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि ‘‘जिस जगह पर लोग ध्यान और शांति के माहौल की उम्मीद करते हैं, वहां यह बिल्कुल नदारद है। मंदिर पहुंचने पर मेरा सामना सड़े हुए फूलों की दुर्गंध से हुआ। मैंने देखा कि लोगों ने सिक्कों को अपनी भक्ति का जरिया बनाया हुआ है, जिसकी वजह से न केवल संगमरमर के फर्श में दरारें दिखने लगी हैं, बल्कि इन सिक्कों पर धूल के जमने से वहां काफी गंदगी भी दिख रही थी। ईश्वर की तलाश में मैं मंदिर के पूरे परिसर में भटकता रहा, मगर मुझे धूल और गंदगी के सिवाय कुछ नहीं दिखा।’’

बनारस के बाद गांधीजी का संगम नगरी इलाहाबाद जाना हुआ। सत्रह नवंबर 1929 को वे वहां गरीबों के लिए चंदा मांगने गए थे। अपने अभिनंदन समारोह में गांधीजी का कहना था कि ‘‘… मुझे यह जान कर बड़ा धक्का लगा है कि प्रयाग की पवित्र नदियां भी नगरपालिका के गंदे नालों के पानी से अपवित्र की जा रही हैं। इस खबर से मुझे काफी दुख हुआ है। इस प्रकार जिला बोर्ड पवित्र नदियों के पानी को गंदा ही नहीं करता, बल्कि हजारों रुपया नदी में फेंकता है। नालियों के पानी का सही उपयोग किया जा सकता है। पर मुझे आश्चर्य होता है कि जिला बोर्ड ऐसा क्यों नहीं कर पा रहा है। अफसोस की बात है कि आज भी इलाहाबाद की ऐसी ही हालत है।

इसके बाद गांधीजी 31 दिसंबर, 1929 को हरिद्वार गए। वहां की गंदगी देख कर उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था ‘‘…पहली बार जब 1915 में मैं हरिद्वार गया था तब मैं वहां सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी के अध्यक्ष पंडित हृदयनाथ कुंजरू के अधीन एक स्वयंसेवक की तरह गया था। मैं बड़ी-बड़ी आशाएं लगा कर और बड़ी श्रद्धा के साथ हरिद्वार गया था, लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहीं दूसरी ओर इस पवित्र स्थान पर मनुष्य के कामों से मेरे दिल को कुछ भी प्रेरणा नहीं मिली। पहले की तरह आज भी धर्म के नाम पर गंगा मैली की जाती है, अज्ञानी और विवेकशून्य स्त्री-पुरुष गंगातट पर, जहां ईश्वर दर्शन के लिए ध्यान लगा कर बैठना चाहिए, वहां पाखाना-पेशाब करते हैं। इन लोगों का ऐसा करना प्रकृति, आरोग्य और धर्म के नियमों का उल्लंघन करना है।… जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं, उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरह चीजें इस विश्वास में डाली गर्इं कि यह एक पुण्य काम है। मैंने इसका विरोध किया तो जवाब मिला कि यह तो युगों से चली आ रही एक सनातन प्रथा है। इस सबके अलावा मैंने यह भी सुना है कि शहर का गंदा पानी भी आकर नदी में मिलता है, वह एक बड़ा अपराध है।’’
हैरानी की बात है कि महात्मा गांधी ने सौ साल पहले जिसे अपराध कहा, वह आज भी बना हुआ है। उससे न तो गंगा को मुक्ति मिली है और न ही देश के शहरों-कस्बों को। अब जो अभियान शुरू किया गया है, क्या उससे महात्मा गांधी के साफ-सुथरे निर्मल भारत का सपना पूरा होगा।

 

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