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खोई हुई दिशाएं

मधु कांकरिया वह पिछले सप्ताह ही एम्स्टर्डम से मुंबई आई थी, तीन महीने के लिए। पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह डच है। हालांकि उसके हाव-भाव, भाषा और उच्चारण… सब इसकी गवाही दे रहे थे कि वह सात समंदर पार से आई है। वह मुझसे हिंदी में मदद मांगने आई थी। तुम […]

मधु कांकरिया

वह पिछले सप्ताह ही एम्स्टर्डम से मुंबई आई थी, तीन महीने के लिए। पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह डच है। हालांकि उसके हाव-भाव, भाषा और उच्चारण… सब इसकी गवाही दे रहे थे कि वह सात समंदर पार से आई है। वह मुझसे हिंदी में मदद मांगने आई थी। तुम हिंदी क्यों सीखना चाहती हो? यह पूछने पर उसने बताया कि वह मुंबई के चेम्बूर इलाके में स्थित अनाथालय ‘बाल आनंद’ में वहां के अनाथ बच्चों के साथ कुछ दिन बिताने आई है। इसलिए उसका हिंदी जानना जरूरी है। पर ‘बाल आनंद’ ही क्यों, कोलकाता का मदर टेरेसा का ‘निर्मल हाउस’ क्यों नहीं? पूछते हुए मैंने सोचा भी नहीं था कि यह सवाल उसकी आंतरिक सत्ता हिला कर रख देगा!

थोड़ी ठिगनी, हलकी भूरी आंखें और उन्मुख गोरे रंग की प्रणीता की आंखें एकाएक तरल हो गर्इं। प्रसंग बदल उसने मुझे बाल आनंद की तस्वीरें दिखानी शुरू कीं- ‘यह खुशबू है, आधी हेलेन केलर। आधी इसलिए कि यह देख सकती है, लेकिन सुन और बोल नहीं सकती। मुझे देखते ही हाथ हिला कर टॉफी की फरमाइश करती है। यह मयंक है, महाशैतान। देख नहीं सकता, पर इतना चालाक कि मेरे घुसते ही किलकारी मारने लगता है। जाने कैसे उसे पता चल जाता है कि मैं आ गई हूं!’ तस्वीर दिखाते हुए वह थोड़ा सामान्य हो गई थी।

खैर, मैंने भरसक कोशिश की, पर उसके साथ दिक्कत यह थी कि वह ‘र’ और ‘ड़’ एकदम नहीं बोल पाती थी। ‘लड़की’ बोलने में उसकी गर्दन की नसें बुरी तरह खिंच जाती थीं। काफी मशक्कत के बाद वह ‘शुक्रिया’, राजा बेटा की जगह ‘आजा बेटा’, ‘आ जा’, ‘भाग जा’, ‘सो जा’, ‘उठ जा’, ‘नमस्कार’ जैसे चंद शब्दों की पूंजी ही बटोर पाई। चाय के दौरान उसने जो बताया, वह बेहद उदास करने वाला था। पच्चीस वर्ष पहले नागपुर के एक अस्पताल में उसका जन्म हुआ था। जन्म के दस दिन बाद ही उसे एक टोकरी में डाल कर अस्पताल के ‘फाउंडिंग हाउस’ के बाहर रख दिया गया था। यह अवांछित बच्चों के लिए बनाया गया एक कक्ष है। अस्पताल के कर्मचारी ने ही उसका नाम रखा ‘प्रणीता’। छह महीने बाद उसे मुंबई के ‘बाल आनंद’ अनाथालय में भेज दिया गया। वहां से डेढ़ साल बाद हॉलैंड के एक दंपति उसे गोद लेकर हालैंड ले गए।

मैंने पूछा कि तुम्हें कब पता चला कि तुम भारतीय हो, तो उसने संजीदा होकर बताया- ‘कई चीजें बहुत स्पष्ट होती हैं। मेरे मां-बाप, दोनों एकदम सफेद, लंबे-चौड़े। समझ आ रहा था कि ये मेरे असली मां-बाप नहीं हैं। छह-सात साल की होते-होते स्कूल के दोस्त और टीचर तक मुझसे पूछने लगे थे कि क्या मैं पाकिस्तानी या बांग्लादेशी हूं! कुछ समय बाद मेरी मां ने सच्चाई बता दी कि मैं भारतीय हूं। मेरे अभिभावक बहुत अच्छे हैं। ज्यों-ज्यों मैं बड़ी होती गई, मेरी परेशानी बढ़ती गई। कई बार रात में नींद उचट जाती है। मैं यह जानने को बेचैन हो उठती हूं कि मेरी मां कौन है। क्या मजबूरियां थीं, जिनके चलते उन्हें मुझे यों फेंकना पड़ा। मेरे पास बस वे कुछ कागज हैं जो मेरी मां ने मेरे साथ उस टोकरी में नत्थी कर दिए थे। उन्होंने मेरे जन्म के सर्टिफिकेट के साथ यह भी लिखा था कि वे एक कुंवारी मां हैं और इस देश में कुंवारी मां होना सामाजिक कलंक है!’

हमारी मुलाकात जारी रही। वह मुझसे हिंदी सीखने आती। मैं उसके मोबाइल में कैद तस्वीरों को भी देखती। एक तस्वीर में उसके साथ एक सांवली-सी युवती थी। उसने बताया- ‘यह मेरी दोस्त है। यह भी हर साल बाल आनंद में आती है।’ उसे भी कोई फ्रांसीसी दंपति गोद ले गए थे। यह भी शायद अपनी जड़ों को खोजने और बाल आनंद में अपन छुट्टियां बिताने आती है। फिर ऐसी एक-दो लड़कियां उसके मोबाइल से और निकल आर्इं जो उसी की तरह कुछ बन जाने पर पैसे बचा कर भारत आती हैं, अपनी जड़ों को खोजती हैं। अनाथालय में अनाथ बच्चों के साथ एक-दो महीने बिताती हैं और इस धरती पर मातृत्व को बचाने में भर शक्ति अपना योगदान देकर भारी मन से वापस उस पार उड़ जाती हैं।

उसके कंधों पर हाथ रख मैंने एक बार उसे कहा- ‘जीवन में असली महत्त्व है कि आप कहां तक पहुंचे। इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप कहां से निकले! महाभारत में जब कर्ण के कुल का सवाल उठा तो महर्षि वेदव्यास ने दुर्योधन के मुंह से कहलवाया था कि नदियों और ऋषियों के उद्गम नहीं देखे जाते। अपनी जड़ों को लेकर तुम परेशान मत हो प्रणीता।’ उसने कहा- ‘लेकिन बिना जाने कि मैं कौन हूं, मेरी मां कौन थी, मुझे चैन नहीं पड़ता। यह दर्द मेरे सीने में कील की तरह गड़ता रहता है।’ मां शब्द को वह ऐसे बोलती, जैसे मां को छू रही हो।

बहरहाल, तीन महीने गुजर गए। वह एम्स्टर्डम लौट गई। सर्दियों में वह फिर मुंबई आने के बारे में सोच रही है। उसका इ-मेल आया है। मैं उसे लिखना चाहती हूं कि तुम कभी अपनी मां को खोज नहीं पाओगी प्रणीता! जब तक इस समाज में खंडित नैतिकता और झूठी इज्जत का दिखावा मानवीय गरिमा को लहुलूहान करता रहेगा, तुम्हारी जैसी प्रणीता जन्म लेती रहेंगी और आजीवन अपने जन्मदाताओं को खोजती रहेंगी।

 

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