किस्सा अड्डे का

गोपेश्वर सिंह अथश्री अड्डा पुराण। आने को फेसबुक पर आ तो गया हूं, लेकिन मेरे मन का संशय अब भी मिटा नहीं है। मुझे अब तक लगता रहा कि यह समय की बर्बादी है। अनेक मित्र इसके फायदे गिनाते रहे, मुझे फेसबुक पर आने के लिए ललकारते रहे। ऐसा नहीं कि फेसबुक पर हिंदी दुनिया […]

गोपेश्वर सिंह

अथश्री अड्डा पुराण। आने को फेसबुक पर आ तो गया हूं, लेकिन मेरे मन का संशय अब भी मिटा नहीं है। मुझे अब तक लगता रहा कि यह समय की बर्बादी है। अनेक मित्र इसके फायदे गिनाते रहे, मुझे फेसबुक पर आने के लिए ललकारते रहे। ऐसा नहीं कि फेसबुक पर हिंदी दुनिया की गतिविधियों से मैं अनजान था। मित्र अपने अकाउंट के जरिए हिंदी दुनिया की सक्रियताओं से परिचय तो कराते ही रहते थे। एक दिन मन में यह विचार आया कि अलग रह कर ही मैं कौन-सा तीर मार रहा हूं और पूरी तरह उससे अलग भी कहां हूं! सो आ गया… लेकिन संशय बना हुआ है।

अपने को टटोलता हूं और अपने अतीत को देखता हूं तो पाता हूं कि मैं जन्मना अड्डेबाज हूं। जब गांव में था- प्रारंभ से इंटर की पढ़ाई तक- तो किताबी पढ़ाई और घर-गृहस्थी के काम से फुरसत पाते ही हम अड्डेबाजी में जुट जाते थे। अड्डेबाजी कभी अलाव के पास जमती तो कभी तालाब किनारे, कभी बगीचे में जमती तो कभी किसी पीपल, बरगद, नीम या पाकड़ के वृक्ष तले। अड्डे मौसम, परिस्थिति और समय के हिसाब से बदलते रहते। अड्डेबाजी में हमउम्र साथी तो होते ही, थोड़े छोटे-बड़े भी होते। इसमें सभी जातियों के लड़के होते।

अड्डों पर हमारा मुख्य काम गप लड़ाना था। यों हम कभी-कभी ककड़ी-अमरूद चुराने, नाच-नाटक देखने और मछली पकड़ने के सार्थक काम भी चोरी-चोरी करते थे! जितनी छोटी हमारी दुनिया थी- भौतिक रूप में या जानकारी के स्तर पर, हमारी बहसों का दायरा उतना छोटा नहीं था। हम दुनिया के बहुतेरे विषयों पर सुने-सुनाए आधारों पर घंटों बतियाते। उन बहसों का कोई सिर-पैर नहीं होता था। कभी-कभी हम लड़ते भी। लेकिन एक-दो दिन के अबोले के बाद हम फिर अड््डे पर होते।
जब उच्च शिक्षा के लिए मुझे मुजफ्फरपुर, पटना और बनारस में बारी-बारी से रहना पड़ा तो चाय की दुकानें और कॉफी हाउस हमारे अड्डे बने। शहरी अड्डेबाजी की मूल प्रकृति भी गांव वाली ही थी, लेकिन यहां गप के विषय मुख्यत: साहित्य और राजनीति हो गए। साहित्य, राजनीति की किताबें हम खूब पढ़ते और अड्डे पर खूब लड़ते। हर कोई अपने को अधिक मौलिक, ज्ञानी, क्रांतिकारी और रेडिकल तथा दूसरे को उसी जोश से प्रतिक्रांतिकारी, अपढ़, कमपढ़ और दकियानूस साबित करता। कभी-कभी हम दिन-दिन भर अड्डे पर जमे रहते। इन बहसों में कई बार हम खाना भी भूल जाते या छोड़ देते और चाय पी-पीकर लड़ते रहते। इस कारण कई बार हमारी तबीयत खराब हो जाती।

पटना का कॉफी हाउस बंद हुआ तो हम बहुत परेशान हुए। उसे फिर खुलवाने के लिए हमने सरकार से बहुत बार मांग की। सफल नहीं हुए तो दूसरे अड्डे तलाशने में महीनों लगे रहे, पर बेकार। लेकिन हम अड्डेबाजों के घरवाले बहुत खुश हुए। अड्डेबाजी का हमारा समय घर पर जो बीतने लगा था। उन्हें क्या पता था कि अपने मयकदे को खोकर हमने क्या-क्या खोया है! आप यकीन नहीं करेंगे कि अड्डे के अभाव में मैं डिप्रेशन के साथ कई रोगों का शिकार हो गया। जीवन की मस्ती कम हो गई। पढ़ना भी कम हो गया। पटना छोड़ कर हैदराबाद गया, मन वहां भी नहीं जमा तो चार साल बाद ही वहां से भाग कर दिल्ली आ गया। यहां सबकुछ है लेकिन कोई अड्डा नहीं है। सभी व्यस्त हैं, भागे जा रहे हैं। न जाने कहां। मैं भी भाग रहा हूं। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। पिछले नौ साल से अड््डे की खोज में हूं। जैसे अड््डे गांव-कस्बे, मुजफ्फरपुर, पटना और बनारस में थे। लेकिन जनता हूं कि गया वक्तकभी वापस नहीं आता। फिर भी ‘दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुरसत के रात-दिन…’

मुझे बनाने में मेरे घर-परिवार, गुरुजनों की जितनी भूमिका है, उससे बड़ी भूमिका बुद्ध, विवेकानंद, मार्क्स, गांधी, जयप्रकाश, लोहिया आदि की है। इन सब महानों से मेरी पहली ‘मुलाकात’ अड्डों पर ही हुई। धर्मनिरपेक्षता और जाति निरपेक्षता का पहला संस्कार अड््डों पर ही मिला। समाजवाद, क्रांति की पहली वर्णमाला वहीं सीखी। दुनिया बदली या न बदली, बदलने का सपना मैंने वहीं से देखना शुरू किया। जब से वे जीवंत अड्डे छूटे, लगता है मेरे भीतर की इन सारी चीजों में धीरे-धीरे निष्क्रियता का जंग लग रहा है और मेरे भीतर एक कायर जगह बना रहा है।

मैं इस उम्मीद के साथ फेसबुक पर आया हूं कि यह नए जमाने का नया अड्डा है। कवि-मित्र अरुण कमल से आज सुबह फोन पर बात हुई तो उन्होंने इस नए अड्डे के लिए दो नाम सुझाए- एक, काशी का अस्सी, और दूसरा, चित्रकूट घाट। मैं भी अपनी ओर से दो नाम प्रस्तावित करता हूं- एक, मित्र बैठका, और दूसरा, बातां री फुलवाड़ी। मेरा संशय यह है कि यह माध्यम अड््डे का विकल्प है या नहीं, जो सोच कर मैं इस पर आया हूं!

 

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