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हमारा किताबघर

प्रमोद द्विवेदी बीते पंद्रह अगस्त को हमें (रामप्रस्थ ग्रींस, वैशाली में) एक छोटा-सा पुस्तकालय मिल गया। इसे बनवाने में भास्कर गांधी ने जो योगदान दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। अब बारी किताबदाताओं की थी। पहले दिन ही तकरीबन सौ-दो सौ किताबें आ गर्इं। एक दिलदार रहवासी सेंदिल कुमार पुराना लैपटॉप भेंट कर गए। प्रभात […]

प्रमोद द्विवेदी

बीते पंद्रह अगस्त को हमें (रामप्रस्थ ग्रींस, वैशाली में) एक छोटा-सा पुस्तकालय मिल गया। इसे बनवाने में भास्कर गांधी ने जो योगदान दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। अब बारी किताबदाताओं की थी। पहले दिन ही तकरीबन सौ-दो सौ किताबें आ गर्इं। एक दिलदार रहवासी सेंदिल कुमार पुराना लैपटॉप भेंट कर गए। प्रभात मिश्र ने पंखा लगवा दिया। कारोबारी वीरजी ने अलमारी और कुसर््िायां भिजवा दीं। और इस तरह कारवां चल पड़ा। पड़ोसियों को जैसी किताबें मिलीं, हमारे हवाले करते रहे। जैसे दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, हमने भी गौर नहीं किया कि कैसी किताबें दान में आ रही हैं। अभी तक मामला संख्या दिखाने का जो था! अब इस छोटे-से पुस्तकालय के तीन माह से ऊपर हो गए हैं। इस बीच लेखक शिवकुमार मिश्र, टीवी पत्रकार प्रियदर्शन ने भी किताबों से पुस्तकालय को मालामाल किया है। दिग्गज कथाकार उदय प्रकाश और अथक कलमजीवी सुरेश सलिल ने खूब सारी किताबें देने का वादा किया है। इसकी ख्याति सुन कर कुछ युवा पत्रकारों ने वादा किया है कि वे खुद किताबें जमा करेंगे और पुस्तकालय को दान करेंगे।

अब लोगों की पसंद के अनुसार पुस्तकालय में पत्रिकाएं-अखबार आने लगे हैं और चंद पढ़ने वाले भी। पर पहले ही दिन से मूल सवाल था- रोज कौन बैठेगा यहां? शुरू से हमारा ध्यान उन बुजुर्गों की ओर था, जो पुस्तकालय खुलने के पहले डींग हांकते थे कि आप खुलवाइए तो, हम समय-दान करेंगे। हमने उन्हें पुरउम्मीद होकर याद किया और कहा कि अपनी सहूलियत से वक्त दीजिए। ‘ना’ फिर भी नहीं थी। वक्त इफरात था, सो बोले- ‘बस, अगले हफ्ते से।’ हफ्ता गुजर गया, पर कोई बुजुर्ग या नौकरीमुक्त सज्जन सेवा के वास्ते नहीं आए। जनसेवा से बचने की उनकी दलील भी कमाल की थी। एक बोले- ‘वक्त कहां है जी, नौकरानी आती है। उसे देखना पड़ता है। दूध वाला आता है।’ एक बोले कि पोते-पोती को संभालना पड़ता है। शिक्षा से जुड़े रहे एक साहब ने दिवाली के बाद बैठने का वादा किया था। दिवाली निकल गई। अब वे मुझे देखते ही सरक लेते हैं। जाहिर है, उनका जवाब भी यही होगा कि मेरे जैसे महा मसरूफ आदमी को कहां भिड़ा रहे हो भइया! एक यही नहीं हैं। हमारे मोहल्ले में दर्जनों ऐसे वरिष्ठजन हैं, जो घर में पूरा दिन बिता देते हैं, शाम को मोदी-ज्ञान बघारने-पसारने में पूरा दो घंटा लगाते हैं। पर पुस्तकालय में स्वयंसेवा के लिए उनके पास जरा-सा वक्त नहीं।

बहरहाल, हमें अपना यह किताबघर चलाना है। इसलिए अब भी कुछ स्वयंभू समाजसेवियों से लगातार अपील चल रही है। पर ‘जमीं जुंबद, न जुंबद गुल मुहम्मद’ के अनुयायी ये बुजुर्ग हिलते ही नहींं। फिलहाल मेरे अलावा सुबह एक आत्मप्रेरित वरिष्ठ नागरिक जेसी त्यागी पुस्तकालय में आकर थोड़ा वक्त दे रहे हैं। दफ्तरी व्यस्तता के बावजूद हिमांशु पांडे नियमित पाठक हैं। इसके सफाईसेवी, लाइब्रेरियन या इंतजामकार हमीं हैं। पर सवाल यही है कि पड़ोस में किताबघर देख कर और लोग निकल कर क्यों नहीं आ रहे! क्या वास्तव में उनकी निगाह में पुस्तकालय एक ऐसा अनाकर्षक ठौर है, जहां वक्त गुजारना फालतू का शगल है?

इसका जवाब तलाशना कोई बड़ा काम नहीं है। हम जिस आत्मरत और टकाबाज दुनिया के दीवाने होते जा रहे हैं, उसके जनक भी गुजरे वक्त के यही लोग हैं। भले ही आज की पीढ़ी की मूल्यहीनता पर ये वृहद आख्यान दे दें। पर हकीकत यही है कि इनकी तरफ से भी कोई ऐसी कारगर कोशिश नहीं है कि परहित की पताका फहराती दिख सके। और सबसे अचरज की बात तो यह है कि नौकरी से निजात पा चुके यही खाली, उम्रदराज बंदे आज सबसे व्यस्त प्राणी की तरह दिख रहे हैं। जाहिर है, उनके लिए अपने भले और मजे में ही चैनदारी है।

याद आता है जिस दौर में, जिस शहर (इलाहाबाद) में हमारा लड़कपन बीता, तब किताबें-पत्रिकाएं ही मन बहलाती थीं। किताबें ही रोशनख्याली देती थीं। अच्छा ही हुआ जो टीवी का मर्ज लगने से पहले किताबें मन पर छप चुकी थीं। लोकमान्य तिलक की यह उक्ति मन में बस गई थी कि- किताबें साथ हों तो नर्क में भी रहना पसंद करूंगा…। जाहिर है किताबों का महत्त्व बताने के लिए और नजीरों की जरूरत नहीं है। और यह भी सही है कि जिस दौर में सुरालयों, जुआघरों या विलासी क्लबों की महिमा साजी है, वहां किताबों की दुनिया की सुध लेने वाले लोग अल्पसंख्या में हो गए हैं। इन अल्पसंख्यक लोगों के लिए आनंदपरस्त इंसानी बस्ती के बीच एक किताबघर खोलना कोई कठिन काम नहीं है। कठिन तो है उन लोगों की तलाश करना जो अपनी नामनिहाद व्यस्तता (?) से कुछ समय निकालकर इस ज्ञान मंदिर को दें।

 

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