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किताब के चार कदम

पिछले दिनों एक पुस्तक-यात्रा के सिलसिले में उत्तराखंड जाना हुआ। करनाल जनपद से विकास नारायण राय के साथ यात्रा शुरू की तो उत्तराखंड देखने से लेकर वहां के लोगों और लेखकों से मिलने और उन्हें इन किताबों के बारे में बताने को लेकर उत्साह था। लेकिन किताबों की बिक्री को लेकर विशेष आशा या कोई […]

Author March 13, 2015 10:09 AM

पिछले दिनों एक पुस्तक-यात्रा के सिलसिले में उत्तराखंड जाना हुआ। करनाल जनपद से विकास नारायण राय के साथ यात्रा शुरू की तो उत्तराखंड देखने से लेकर वहां के लोगों और लेखकों से मिलने और उन्हें इन किताबों के बारे में बताने को लेकर उत्साह था। लेकिन किताबों की बिक्री को लेकर विशेष आशा या कोई तय लक्ष्य नहीं था। गाड़ी में आठ-दस बंडलों में पचास-साठ अलग-अलग किताबें लेकर ही चले थे। दस दिन की इस यात्रा में नौ-दस जगह बातचीत और पुस्तक-प्रदर्शनी का जिम्मा टिहरी के युवा लेखक त्रेपन सिंह चौहान ने लिया था। इसमें खास यह था कि सभी किताबें हिंदी की थीं।

इन्हीं दिनों एक मित्र ने अपनी एक सौ बारह पृष्ठ की कथा-पुस्तक भिजवाई, जिसका मूल्य तीन सौ रुपए था। किताब कैसी है, यह तो बाद में देखता, लेकिन हाथ में आने पर देखा कि उसमें कागजों से भारी उसकी जिल्द थी। सोचा, इसे कौन खरीदेगा? कई मायनों में ऐसी किताबें इस गरीब देश के पाठकों को मुंह चिढ़ाती लगती हैं। इसमें लेखक-प्रकाशक और पाठक का त्रिकोण शामिल है। मेरा साफ मानना है कि प्रकाशक अगर भिन्न वर्गों के पाठकों को ध्यान में रख कर किताबें चुनें और छापें, तो किताब की कीमत पृष्ठ संख्या से दो-ढाई गुना ज्यादा नहीं रखी जाएगी।

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इससे कौन इनकार करेगा कि किताब का अंतिम लक्ष्य पाठक होता है। एक किताब अपने चार कदम ठीक चल कर ही पाठक तक पहुंच सकती है। पुस्तक संस्कृति को विकसित करने का अर्थ है पुस्तक पढ़ने की संस्कृति का विकास। प्रकाशक क्या छाप रहा है- यह किताब का पहला कदम है। क्या पुस्तक की सामग्री में पाठकों की रुचि होगी या क्या उनमें समाजोपयोगी रुचि पैदा करने की क्षमता है? सच तो यह है कि थोक खरीद के बल पर या लेखकों से पैसा लेकर छपने वाली किताबें आमतौर पर पाठकों को पूरी तरह नजरंदाज करती हैं। ऐसे में प्रकाशक द्वारा किताबें न बिकने और न पढ़े जाने की शिकायत बेमानी हो जाती है।

किताब का ‘प्रोडक्शन’ यानी किताब कैसी बन कर तैयार हुई है, यह भी पाठक की रुचि बनाती-बिगाड़ती है। यह किताब का दूसरा कदम है। किताब की साज-सज्जा आकर्षक होने के साथ महंगी भी हो, यह कतई जरूरी नहीं। यहां हिंद पॉकेट बुक्स और राजकमल पेपरबैक्स की किताबें याद आती हैं, जिन्होंने एक समय पाठकों की दुनिया में अपनी धूम मचा दी थी।

तब सारी किताबें पेपरबैक्स में ही दिखती थीं- चालीस पेज की विश्व साहित्य या लघुकथा की किताबों से लेकर आठ सौ पृष्ठ के उपन्यास ‘राम राज्य’ तक। पेपरबैक पुस्तक का सीधा संबंध किताब की कीमत से है। साधारण पाठक की जेब और जरूरत के मुताबिक किताब की कीमत इसका तीसरा कदम है। सवाल है कि जब सौ पृष्ठों की किताब पैंतीस-चालीस रुपए में छप कर तैयार हो जाती है, तो उसकी कीमत दो या ढाई सौ रुपए रखने की क्या तुक है? यह तो आम पाठकों को लाचार बनाने और थोक खरीद की ‘अटैची संस्कृति’ को बढ़ावा देने वाली बात है! क्या पुस्तक-प्रकाशन में लागत मूल्य से डेढ़ या दो गुना कीमत रखने का कोई नियम पाठक-हित में नहीं बनना चाहिए?

बहरहाल, दस दिन की यात्रा में कुल साठ हजार रुपए की किताबें बिकना इसलिए भी हैरानी की बात थी कि किताबें कम कीमत की थीं- मोटे तौर पर दो-ढाई पृष्ठ के पीछे एक रुपया। लेकिन इस यात्रा ने हमें कई सवालों के जवाब दे दिए।

एक यह कि पाठक को पढ़ने के अवसर जुटाना लेखक और प्रकाशक दोनों की जिम्मेवारी है। किताब का चौथा कदम पाठक तक किताब पहुंचाना है, जिससे लेखक और प्रकाशक- अक्सर दोनों ही बचते हैं। दोनों मिल कर अपनी किताबों के साथ समाज के बीच जाएं, लोगों से रूबरू हों और अपनी किताबों के बारे में बताएं। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले पाठकों को कैसे मालूम हो कि इधर कौन-सी किताबें छपी हैं और उनमें क्या है?

पाठकों के बीच जाने से ही पाठक-वर्ग का दायरा बढ़ेगा। इस बीच मंच से किताबों की चर्चा के बाद बुक-स्टॉल पर खड़े होकर किताबों की जानकारी देने के तरीके में ताजगी और ताकत- दोनों का अहसास हुआ। इसका पाठकों पर असर होना लाजमी था। कई जगह स्टॉल के लिए सही या पूरी जगह या मेजें न मिलना आम बात थी। इसके बावजूद दस दिन में इतनी किताबों का बिकना पुस्तक-संस्कृति पर नए सिरे से सोचने को मजबूर करता है। क्या पढ़ने की संस्कृति के प्रसार के लिए ऐसी योजनाबद्ध पुस्तक-यात्राएं संभव नहीं?

अशोक भाटिया

 

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